सबद
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हाशिया...

ज़रूरी नहीं कि हर बार मूर्खताएं हास्यास्पद और इसलिए उपेक्षणीय भी हों। असद जैदी जैसे कवि और उनकी कविताओं के साथ किया जा रहा सलूक दरअसल एक शरारतपूर्ण सोच और वयस्क मूर्खता की उपज है, इसलिए इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। इतना स्पष्ट है कि उनकी कविता को समझने-बूझने की सलाहियत ऐसे लोगों में न के बराबर है जो खुद को अन्यथा कविता-प्रेमी और प्रथमतः साम्प्रदायिकता का विरोधी भी मानते हैं। उनके ऐसे दावों की पोल तभी खुल जाती है जब वे कविता और कवि के प्रति अपने उदगार प्रकट कर रहे होते हैं। दूसरे, सारे हो-हल्ले में कविता में ज़ज्ब उस तकलीफ को अनसुना कर दिया गया जिसकी ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था। १८५७ वाली कविता का हवाला देकर बारहा कहा गया है कि इसमें हमारे पूज्य साहित्यकारों को कटघरे में खड़ा किया गया है ( मैं अब भी नहीं कहूँगा कि गरियाया गया है ! )। हिन्दी का हर सजग पाठक जानता है कि उसके विकास में इन साहित्यकारों का कितना बडा योग है। लेकिन जहाँ ये वेध्य हैं, वहाँ इनकी व्याज स्तुति क्यों कर ? आप उस प्रधानमन्त्री के बारे में एक लम्हा सोचिए, '' जो आज़ादी की हर लड़ाई पर/ शर्मिंदा है और माफ़ी मांगता है पूरी दुनिया में/ जो एक बेहतर गुलामी के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए कुछ भी/ कुरबान करने को तैयार है''। शोचनीय यह नुक्ता है, वह नहीं जिसकी ओर इशारा करके इतनी हाय-तौबा मचाई जा रही है। जिनके मालूमात कम हैं वे पता कर लें असद की पहले की कविताओं को पढ़कर, वे आज नहीं, शुरू से ही अहो-अहो वाली शाबाश कविता नहीं लिखते। उनकी कविताएं विचलित करती है, समझ की रूढियों पर सवाल खड़े करती है, उन पर लिखने में बहुतों को दुविधा-असुविधा होती है और इन्हीं चन्द वजहों से उनकी और उनकी कविताओं की अनिवार्यता बनी रहती है। यह अनिवार्यता जो हिन्दी को पिछले तीसेक वर्षों से सुलभ है उसे किसी उन्माद में लांछित करने से पहले उसके महत्व को समझने की एक विनम्र चेष्टा तो करें।

5 comments:

आपसे पूरी तरह सहमत अनुराग भाई! इस बेपढ़े हिन्दी समाज में न समझ है न सहिष्णुता.

बहुत क्षोभ है मेरे भीतर भी!


अनुराग जी...आप की इस आवाज के साथ मैं भी अपनी आवाज मिला रहा हूँ...हमें कोई अधिकार नहीं किसी की कविता को ओछे ढंग से प्रस्तुत करने का...
अनुराग जी...आप की इस आवाज के साथ मैं भी अपनी आवाज मिला रहा हूँ...हमें कोई अधिकार नहीं किसी की कविता को ओछे ढंग से प्रस्तुत करने का...लेकिन.....
हों जो दो चार शराबी तो तौबा करलें
कौम की कौम है डूबी हुई मयखाने में
नीरज
नीरज


aapne bilkul sahi ishara kiya hai.asadji pr utpataang likhkr we unka ya unki kavita ka to kya nuksaan krenge,apne bare me zarur batate chal rahe hain ki unki soch kitni ghatiya hai.


आपसे पूरी-पूरी सहमति है .

मेरी प्रतिक्रिया यह है :

लगभग दो साल से कविता का एक ब्लॉग चलाने और उसमें अब तक चौबीस-पच्चीस हज़ार हिट्स के बावजूद,मोहल्ला पर असद जैदी की कविताओं पर अधिकांश टिप्पणियों का स्वर देखकर मुझे यह लगने लगा है कि ब्लॉग कविताओं के लिए -- गम्भीर कविताओं के लिए -- उचित स्थान नहीं है . अब मुझे इस पर विचार करना होगा कि 'अनहद नाद' को नेट पर जारी रहना चाहिए या नहीं .

जहां तक समीक्षकों की राय का सवाल है,अन्य कवियों की तरह असद जैदी की कविता के बारे में समीक्षक अपनी-अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं. पर एक कवि की कविता के पास जाने के लिए जिस आधारभूत संवेदनशीलता और अभिधा की ऊपरी परत खुरचकर अर्थ के संधान की जिस पैनी दृष्टि की ज़रूरत होती है उसका अभाव एक औसत समीक्षक को कविता के हत्यारे समीक्षक में तब्दील कर सकता है .

कृष्ण कल्पित के समझदारी भरे प्रतिवाद के बाद अब बहुत कुछ कहने-लिखने की आवश्यकता नहीं रह जाती . सिवाय इसके कि हमें एक-दूसरे के दुखों और बेचैनियों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की ताकत मिले .

असद जैदी की कविता समझने के पहले हमें उनकी बेचैनी को समझना होगा . जो उस बेचैनी को समझेगा वही उनकी कविता को ठीक-ठीक समझ पाएगा .

नेट-चैट के इस माध्यम से जुड़े लोगों के पास क्या इतना समय और धीरज है ?

शोधार्थीजन कहां हैं ?


anurag ji aap ki soch aur khoj dono hi ki me kayal hoon aap sach aur sahi sochte hai
saader
rachana


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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