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सेवेंटीएमएम : 2


संसद
और सिनेमा

विनोद अनुपम

सिनेमा और संसद में कोई सीधा सरोकार नहीं रहने के बावजूद दोनों के स्वभाव में आश्चर्यजनक समानता देखी जा सकती है। आजादी के बाद शुरूआती दौर में जब संसद अपनी जनता के प्रति जवाबदेह थी, तो सिनेमा भी उसी तेवर के साथ सामने आ रहा था। एक तरफ संसद में नेहरू और पटेल थे तो दूसरी तरफ राजकपूर और वी. शांताराम। दोनों के समानुपातिक तेवर पर गौर इसी से किया जा सकता है कि बाद के दिनों में जैसे-जैसे संसद ने जन सरोकारों से अपना मुंह फेरना शुरू किया, सिनेमा भी आम जनता से दूर होती चली गई। अब दोनों के इस समानुपातिक संबंध का विश्लेषण तो अपनी जगह है , लेकिन दोनों के संबंधों में जो घालमेल हुआ वह शायद इस संबंध की नियति थी।

गौरतलब है कि जब तक दोनों जनता के प्रति जवाबदेह रहे, अपनी-अपनी पहचान के साथ संतुष्ट ही नहीं, बल्कि उसकी बेहतरी में भी जुटे रहे। लेकिन जैसे-जैसे संसद और सिनेमा जनता से दूर होते गए उनकी आपसी निकटता बढ़ती चली गई। आज हिन्दी सिनेमा में ऐसे कलाकारों को ढूँढना मुश्किल है जो सांसद, भूतपूर्व सांसद या फिर संसद के भावी उम्मीदवार के रूप में नहीं गिने जा सकते। उसी तरह ऐसे सांसद ढूँढना कठिन है जो सिनेमा के माध्यम से अपनी छवि निखारने की कोशिश में नहीं जुटे हैं। लालू प्रसाद तो इस माध्यम के पुराने खिलंदड़े रहे हैं। अमर सिंह और उमर अब्दुल्लाह की पैठ के बारे में हर कोई जनता है।

सवाल
यह नहीं कि कौन और कितने लोग सिनेमा में आ रहे हैं या सिनेमा से जा रहे हैं। सवाल है ऐसा क्यों ? क्यों गोविंदा या धर्मेन्द्र को लगता है कि वे अभिनय से से ज़्यादा बेहतर राजनीति कर सकते हैं ? क्यों लालू प्रसाद को बड़े-छोटे परदे अपनी जनता के प्रति प्रतिबद्धता से ज्यादा जरूरी लगने लगते हैं ? वास्तव में आज कलाकारों को भरोसा ही नहीं कि वे जिस कला की सेवा में लगे हैं वह एक बेहतर समाज की अनिवार्यता भी है। उन्होंने अपने कला-माध्यम को ही ऐसा बना छोड़ा है जिसमें अब किसी राजकपूर और गुरूदत्त की गुंजाइश नहीं। उधर राजनीतिज्ञों ने अपनी दुनिया इतनी गंदी कर ली है कि अब उन्हें अपनी ही राजनीतिक पहचान से खीझ होती है। सिनेमा के परदे पर दिखना और बाहर सिने-कलाकारों की फौज खड़ी कर जनता के बीच अपनी साख बचाने की उनकी कोशिश कितनी अश्लील है, इसका शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं। कुछ माह बाद जब चुनावी समय शुरू होगा, नेता-अभिनेता का एक विशाल और बेमेल गठजोड़ आप देखेंगे ही !

4 comments:

बढ़िया तुलना की है।


thoda aur wishleshan apekshit rh gaya.


अपनी साख बचाने की उनकी कोशिश कितनी अश्लील है, इसका शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं।
yh 100 fesadi sach baat hai.filmon ke bhitar-bahar wimarsh ki gunjaish vinodji ne banai hai yh dekh kar achha laga.


विनोद दा आपकी कल्पनाशीलता का जवाब नहीं । आमतौर पर मैं अनुराग के ब्लॉग पर जाकर आपका और यतीन्द्र का लेख पढ़ लेता हूं । दोनों को पढ़ना अच्छा लगता है । अनुराग भी अपने ब्लॉग को लेकर संजीदा है । लगे रहो भाइयो


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