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एक ज़रूरी कविता : एमानुएल ओर्तीज़


( कम ही सही, हमारे कला-अनुभव में ऐसे दुर्लभ क्षण आते हैं जब कोई कलाकृति हमारे आस्वाद के ढंग को ही नहीं, विचार-क्षमता और मूल्य-निर्णय के विवेक को भी गहरे प्रभावित करती है। यह ज़्यादा कहना होगा कि वह इन्हें आमूल बदल भी देती है, लेकिन उसका कुल असर हम पर इतना ज़रूर छूटता है कि हम सामने के समय और यथार्थ को उसकी जटिलता और समग्रता में देखने-समझने के हामी हो जाते हैं। ऐसा करने के लिए वह कुछ कमतर कला होना भी शायद खुशी-खुशी मंज़ूर कर लेती है और भाषा और शिल्प की बहुधा अनुलंघ्य चौहद्दी के परे बड़ी सहजता से चली जाती है। कला के इस ज़ोखिम से पेंटिंग में एक दफा पिकासो के हाथों गुएर्निका संभव हुई थी, कविता में ऐसी ही कृति एमानुएल ओर्तीज़ ने संभव की। गुएर्निका की प्रतिकृति ऊपर है, ओर्तीज़ की कविता आगे। इस कविता का प्रशंसनीय हिन्दी अनुवाद हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ कवि असद जैदी ने किया जिसे पहल ने कोई साल भर पहले छापा था। यह कविता सबद पर आए, ऐसा मंगलेशजी चाहते थे। इस बाबत असदजी से आग्रह करने पर इस लंबी कविता की पीडीएफ़ फाइल मिल गई। ज्ञानरंजनजी से हमने इसे पुनर्प्रकाशित करने की इजाज़त मांगी जो उन्होंने हमें खुशी-खुशी दे दी। इन सबके प्रति हार्दिक आभार के साथ अब कविता की संगत कीजिए। )


कवितापाठ से पहले एक लम्हे का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, क़ैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए

और अगर आप इज़ाजत दें तो

एक पूरे दिन का मौन
हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज़
इस्त्राइली फ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ

दो महीने का मौन दक्षिण अफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहाँ मौत बरसी
चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन विएतनाम के लाखों मुर्दों के लिए --
कि विएतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है --
एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे -- और ज़रा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन
कोलम्बिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए और ज़बान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ।

एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए
जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
४५ सेकिंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे ४५ लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

एक सदी का मौन

यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए
जिनकी ज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तों में --
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?
जबकि हम बेआवाज़ हैं
हमारे मुँहों से खींच ली गई हैं ज़बानें
हमारी आखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज़ न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।

क्योंकि यह कविता ९/११ के बारे में नहीं है
यह ९/१० के बारे में है
यह ९/९ के बारे में है
९/८ और ९/७ के बारे में है
यह कविता १४९२ के बारे में है।*

यह कविता उन चीज़ों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।
और अगर यह कविता ९/११ के बारे में है, तो फिर :
यह सितम्बर ९, १९७१ के चीले देश के बारे में है,
यह सितम्बर १२, १९७७ दक्षिण अफ़्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह १३ सितम्बर १९७१ और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।

यह कविता सोमालिया, सितम्बर १४, १९९२ के बारे में है।

यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।
यह कविता उन ११० कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं, ११० कहानियाँ
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
बिना निशान की क़ब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पम्प
बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न
डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल ** की खिड़की पर ईंट मारो,
और वहां के मज़दूरोंका खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन ***
फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़ ****
डेटन की विराट १३-घंटे वाली सेल के दिन *****
या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों
और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।

( ११ सितम्बर, २००२ )

फ़ुट नोट :
* १४९२ के साल कोलम्बस अमरीकी महाद्वीप पर उतरा था।
** टैको बैल : अमरीका की एक बड़ी फास्ट फ़ूड चेन है।
*** ''सुपर बॉल'' सन्डे : अमरीकी फुटबॉल की राष्ट्रीय चैम्पियनशिप के फाइनल का दिन।
इस दिन अमरीका में गैर-सरकारी तौर पर राष्ट्रीय छुट्टी हो जाती है।
**** फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई : अमरीका का ''स्वतंत्रता दिवस'' और राष्ट्रीय छुट्टी का दिन।
जुलाई १७७६ को अमरीका में ,''डिक्लरेशन ऑफ इंडीपेंडेंस'' पारित किया गया था।
***** डेटन : मिनिओपोलिस नामक अमरीकी शहर का मशहूर डिपार्टमेंटल स्टोर।

कवि की पत्री : एमानुएल ओर्तीज़ मेक्सिको-पुएर्तो रीको मूल के युवा अमरीकी कवि हैं। वह एक कवि-संगठनकर्ता हैं और आदि-अमरीकी बाशिन्दों, विभिन्न प्रवासी समुदायों और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय कई प्रगतिशील संगठनों से जुड़े हैं।

10 comments:

अद्भुत……कविता से गुजरने के बाद सचमुच एक लंबे मौन की जरूरत पड़ गई है……आगे कुछ बोलना संभव नहीं है……सदियों बाद शायद ऐसी कविताएं संभव होती हैं……अनुवाद भी अद्भुत है…


kuchh kavitaaon ki tarif karne ke liye shobd nahin hote hain, unko padh kar khamoshi si chha jati hai!!!!
anuwad bhi lajawab hai!!!!


aapne theek hi likha, yh sachmuch ek bahut zaroori kavita hai.aise bahut se sandarbh jo shayad ab itihaas ki kitabon men bhi theek-theek nhi ujagar kiye jate,is kavita ne us pr poori taqat se roshni fenki.sahitya inhi maynon men to itihaas se ek kadam aage nikal saka hai. ortiz ki yh kavita padhane ke liye bahut bahut shukriya.asad zaidi ne iska anuwaad aisa kiya hai ki khin lga hi nhi ki hm doosri bhasha ki kavita padh rhe hain.bahut si ghatnaon ki fehrisht men 6 december aur gujrat ka bhi jikr kitna mauzu hota.pr wh sab kavita men na hokar bhi yahan kitna yaad aa rha hai!


kavita ko padh ker aisa laga mano din bhar mai hone vali dor dhoop,shor sharabe,tanav,jaddo jahad ke vajah se jo maun, jo vichar kshmata hum se koso dur chali gaee thi,usne achanak hi kahin zahan mai dastak di.tez raftar zindagi mai kadam mano ruk se gaye,shayad ye maun hi hai...


हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन।


झकझोरती हुई खामोशी...चीख-चीख कर कुछ कहती खामोशी...खामोश ना रहने का संदेश देती खामोशी


ek minute ka maun nuclear deal se pahle bhi.


kvi ka vartman samay se jura rahana bhut jaruri hai. yh kvita usi yugbodh ki tasvir khichti hai


kavita puri duniya ke dard ko to awwaz deti hi. lekin bhart ki lakho lakh log jo sarkari aur prayojit atankbad ke sikar ho gaye, unki bat kon karega. PAASH nei to aam admi ki nirasha ko awaaz dete huye likha hi tha, "sabse khatank hota he sapno ka mar jana", is niras aadmi ko kon awaaz dega.


sahi kaha bhaiya....humne woh dukh nahi dekhe jo puraane logo ne dekhe hain...



--aastha


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