Sunday, July 20, 2008

एक कवि एक कविता : 3 : श्रीकांत वर्मा

( यह सबद के लिए युवा कवि-लेखक यतीन्द्र मिश्र की कविता पर श्रृंखलाबद्ध लिखी जा रही टिप्पणियों की तीसरी कड़ी है। उनके अध्यवसाय और पाठकीय प्रतिक्रियाओं से यह लगता है कि कविता कुछ और पास अपने आई है। प्रस्तुत टिप्पणी हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा की कविता, ''कलिंग'' पर है जिसका अर्थाशय मननीय है। कविता संलग्न है। इसे हम राजकमल प्रकाशन से छपे कवि की प्रतिनिधि कविताओं से साभार दे रहे हैं। अगली टिप्पणी रघुवीर सहाय की कविता, ''तोड़ो'' पर होगी। )

कलिंग का कव्याभिप्राय

यतीन्द्र मिश्र

सम्राट अशोक के ऐतिहासिक चरित्र के बहाने ‘कलिंग’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविता में श्रीकान्त वर्मा, समाज में मौजूद मनुष्य की असहायता, लाचारी, दर्प और मोहभंग को अत्यन्त बेधक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। यह सर्वविदित है कि अशोक के साम्राज्य विस्तार की लोलुपता का अन्त कलिंग युद्ध के उपरान्त ही माना जाता है, जब अनगिनत हताहतों व शवों को देखकर उसका हृदय परिवर्तन होता है।

इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यहाँ कविता में ध्यान देने वाली बात यह है कि कलिंग युद्ध की विभीषिका से उपजे आत्मचिन्तन से किस प्रकार अशोक जैसा सम्राट जूझ रहा है। कविता की मात्र तेरह संक्षिप्त पंक्तियों के माध्यम से मनुष्य के अन्दर चल रहे नैतिक युद्ध के समानान्तर बाहर हो रहे राजनैतिक युद्ध के विलोम को बहुत निर्लिप्तता के साथ यहाँ प्रश्नांकित किया गया है। ‘कलिंग’ का कथानक एक बड़े कथा-प्रवाह की तरह इस बात को भी रचने में पूर्णतया सक्षम रहा है कि दरअसल सम्राट के लिए जो युद्ध उसकी सेना लड़ रही थी, वह उनका ऐसा अभियान था, जिसमें किसी प्रकार की क्षोभ, पीड़ा, छटपटाहट या पश्चाताप नहीं है। यह समकालीन अर्थों में भी एक व्यंग्य से कम नहीं कि किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के इशारे पर लड़ने वाली उसकी अनुशासित सेना या कार्यकारिणी न सिर्फ अपने विजय अभियान के बाद विजेता की तरह मदमस्त चलती है, बल्कि बेहद नृशंस ढंग से हारी हुई जनता की चीखों पर हँसते-हँसते दोहरी हुई जाती है।

श्रीकान्त वर्मा की यह कविता इन्हीं सन्दर्भों में अपने काव्याभिप्राय के स्तर पर उत्कर्ष पाती है, जब युद्ध की विभीषिका का परिणाम रचते हुए वे स्वयं के भीतर चलने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण, जोखिम भरे और निर्णायक युद्ध की भी प्रतिश्रुति रच देते हैं। इस कविता में अशोक का प्रतीक मात्र एक विजेता के प्रतीक या किसी सम्राट की महत्त्वाकाँक्षा का प्रतीक न बनकर, मनुष्य की सामान्य व सहज अन्तःप्रक्रियाओं का विस्तार बन जाता है, जहाँ इस बात की गुंजाइश भी छिपी मिलती है कि किस तरह एक व्यक्ति अपने स्वान्वेषण द्वारा समानानुभूति (एम्पैथी) हासिल करता है।

‘कलिंग’ मनुष्य के आत्मद्रोह को रेखांकित करने वाली मानवीय स्वातंत्र्य के प्रश्न की एक आदर्श कविता है। इस अर्थ में यह एक बड़ी कविता है कि वह अपने कथ्य व शिल्प दोनों में ही नैतिकता के प्रश्न को सर्वोपरि मानती है। अपनी धीमी लय में शुरू होने के बावजूद कलिंग एक शोर करती हुई मार्मिक कविता बन पड़ती है, जिसकी शिनाख़्त उसकी पहली पंक्ति से ही शुरू हो जाती है, जब कविता में यह स्थिति बनाई जाती है कि सिर्फ अशोक लौट रहा है। अशोक का यह लौटना, सच्चे अर्थों में मनुष्यता की राह पर लौटना है, जिसका अन्त इन सबसे सुन्दर पंक्तियों में होता है- केवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं।

कविता की ऊँचाई यहाँ आकर स्पष्ट शब्दों में व्यक्त हुई है कि सारे नैतिक-अनैतिक प्रश्नों से लड़कर, दुनिया के तमाम भूभाग पर अपना कब्जा जमाने की कयावद और सब प्रकार के ऐश्वर्य जुटाकर उसके सर्वोच्च शिखर पर बैठने के बाद भी एक मनुष्य अपने अन्दर की आवाज़ से कभी जीत नहीं सकता है। जिस तरह तमाम प्रपंचों से गुजरकर अशोक अहिंसा व सत्य के मार्ग पर आगे जाता है, उसी तरह यह कविता इतिहास के गलियारों से निकलकर राजसी सेना के कोलाहल एवं पागलपन की हद तक पहुँच चुकी सैनिकों की खिलखिलाहट के रास्तों को पार करके नैतिकता के पक्ष में जाकर समाप्त होती है।

श्रीकांत वर्मा की कविता

कलिंग

केवल अशोक लौट रहा है
और सब
कलिंग का पता पूछ रहे हैं

केवल अशोक सिर झुकाये हुए है
और सब
विजेता की तरह चल रहे हैं

केवल
अशोक के कानों में चीख
गूँज रही है
और सब
हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं

केवल
अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं
केवल अशोक
लड़ रहा था।

7 comments:

परमजीत बाली said...

वर्मा जी की कविता बहुत पसंद आई।

sanjay patel said...

वाक़ई अनुराग भाई यतीन्द्रजी के पूर्वावलोकन से कविता की देह को छू रहे हैं ऐसा अहसास मिल गया है.
यतीन्द्र भाई से बात हो तो मेरा अभिवादन भी सम्मिलित कर लीजियेगा.

Manisha said...

han sahi kaha. jab bhi ham galat kam kar rahe hote hain to kisi or ko malum ho ya na lekin hamari aatma ko zarur malum hota hai.vo hame ek baar zarur kehti hai. school time me king ashoka or kalinga padha tha..aaj school ki yaad bhi taza ho gai..

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा इस प्रस्तुति को पढ़ कर. आभार.

aalekh said...

jitni achhi kavita utna hi saargarbhit vishleshan.yatindrji kavitaon pr achha likh rahen hain.

शायदा said...

अच्‍छा लगा, कविता और टिप्‍पणी दोनों को पढ़ना।

vidya said...

maine yatindrji ke vishleshan se kavita ka marm aur nikat se jaan paya.