Tuesday, July 15, 2008

कवि की संगत कविता के साथ : 3 : असद जैदी


( यह स्वाभाविक ही था कि एक अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक और पारदर्शी माध्यम में जब कविता के साथ वहशियाना सुलूक किया गया, इसके लिए व्यापक चिंता प्रकट की गई। इससे और किसी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए या नहीं, माध्यम -- जिसे हम-आप ब्लॉग कहते हैं -- ज़रूर दूषित हुआ। इसके आदी और इसके लिए फिक्रमंद लोगों ने फिर भी रचनाशीलता को ही महत्वपूर्ण जाना, उन अनर्गल प्रलापों को नहीं जिससे यह दूषण प्रायोजित हुआ। यही वजह है कि असद जैदी ने लाखों के बोल सहने के बावजूद अपनी नई कविताएं हमें भेजी। हमारे आग्रह पर वक्तव्य भी लिखा। हम ''कवि की संगत कविता के साथ'' शीर्षक इस स्तम्भ की तीसरी प्रस्तुति में उनकी एक पुरानी पर सर्वथा प्रासंगिक कविता, ''संस्कार'' भी दे रहे हैं। इस कविता की कभी कवि मंगलेश डबराल ने बहुत सटीक व्यख्या की थी। हम यहाँ उसका संपादित अंश दे रहे हैं। मंगलेश जी ने अपने अनुभव-सत्य को हमें कविता के पक्ष में इस्तेमाल करने की इजाज़त दी। हम उनके शुक्रगुजार हैं। उम्मीद है यह प्रस्तुति उस धुंध को कुछ हद तक छांटने में कारगर साबित होगी जो दृश्य पर बेजा फैलती गई है। )

आत्मकथ्य

कविता महज़ एक शरणस्थल नहीं

मेरी उम्र के लोग एक ऐसे वक्त से गुजर रहे हैं जिसमें फिसलन और खराबी तो बहुत है पर सहारा देने वाली चीजें पहले से कम हो गई लगती हैं। यह स्वाभाविक है कि इन हालात में कविता एक तरह की उम्मीद और सहारे की तरह दिखाई दे। पर यही सूरते हाल इस बात की भी मांग करती है कि हम अपनी कविता को होशमंदी का बदल या विकल्प न मानने लगें। कविता महज़ एक शरणस्थल या पसंदीदा मकाम ही नहीं, एक ज़िम्मेदारी और चुनौती की भी जगह है : यह जानना उन लोगों के लिए तो ज़रूरी है ही जो कला की स्वायत्तता और प्रकारांतर से काल-निरपेक्षता में आस्था रखते हैं, उन लोगों के लिए भी यह कम ज़रूरी नहीं है जो कला को सामाजिक और परिवर्तनकारी कर्म और नागरिक कर्तव्य से जोड़ते हैं, क्योंकि महज़ वैचारिक प्रतिबद्धता या अपनी कला-दर्शन सम्बन्धी मान्यताएं दर्ज कर लेने से कलाकर्म रचनात्मक कर्म नहीं बन जाता। आज कविता लिख लेना आसान है पर कविता को जानना, उसका अच्छा पाठक और साथी होना, ज़्यादा ध्यान और मेहनतका काम है। यह काम ऐसा है जो बहुत से कविओं से भी नहीं किया जाता। कविता हर दौर की तरह आज भी 'टोटल एंगेजमेंट' की मांग करती है। कोई भी रचनात्मक काम और सच्चा कलाकर्म हमें मुश्किल और आसान, सीधे और पेचीदा, व्यक्ति और समष्टि, समाजोन्मुखता और समाज-निरपेक्षता के बीच चयन का मौका नहीं देता -- जिस वक्त जो कुछ हमारे चारों तरफ़ और सामने और पीछे है उससे रु-ब-रु हुए बिना, सारे के सारे जंजाल से उलझे बिना, कोई चारा नहीं। जो यह समझते हैं कि वे चुन सकते हैं और अपने हिसाब से रचना कर सकते हैं, दरअसल निर्जीव चीजों का अम्बार लगा रहे होते हैं। कला और कला-नुमा के इस फर्क को गहराई से जानना और समझना ही अहले-नज़र या सहृदय होने की निशानी है।


कविताएं

शल्यचिकित्सा
( विष्णु खरे के लिए )

एक नास्तिक जो अधेड़ भी है और कविहृदय भी
अभी शल्यचिकित्सा के बाद अस्पताल में पड़ा है
उसे अभी अस्पताल के ख़र्च का अन्दाज़ा नहीं
उसकी पत्नी ने कर डाले हैं कई दूरगामी फ़ैसले
तकलीफ़ और खुमार के दरम्यान पड़ा हुआ
सोचता है वह डॉक्टर सहाय की वजह से नहीं ज़िन्दा है
उसे ज़िन्दा रखे हुए है एक बनफ़्शे का फूल

नाक से लगी नली हटी देखकर उधर से गुजरती हुई नर्स कहती है
अरे इसे क्यों निकाल दिया
एक और नर्स आकर नली को वापस जोड़ जाती है
बोलती है दुबारा ऐसा न करना
बरामदे में स्टूल पर बैठी बेटी दौड़कर आती है : क्या हुआ पापा
और उसका सर सहलाती है

तुम्हें क्या बताऊँ मुल्क पर अपराधी गिरोह छा गए हैं छोटी
और उम्मीद की दहलीज़ है एक उम्र दूर

और ग्रहों पर ज़िन्दगी होती तो पता नहीं कैसी होती बसर
नक्षत्रों की दुनिया ख़ुद से रहती है अनजान
अंत में ब्रह्माण्ड का भी कुछ नहीं बचेगा
वे काले सुराख़ भी ख़त्म हो जाएंगे बस रहेगी एक बुदबुद
जैसे कि धरती पर कभी थी सांय सांय

क्या मालूम मेरी घड़ी कब से बिगड़ी पड़ी है
अगर किसी तरह चलती भी है तो ग़लत वक्त बतलाती है
एक उम्र आती है जब समय का भान दूसरे लोगों की चाल-ढाल से
चेहरे-मोहरे देखकर उनकी बातें सुनकर होने लगता है
घड़ी से और धूप-छाँहसे नहीं अपने ही शरीर से बातें करते हुए
नर-नारी जानने लगते हैं अपना वक़्त

कितनी चीज़ें हैं जो दिखाई देती हैं पर हैं नहीं
उन तारों की तरह जो कभी के गायब हो चुके हैं
पर उनकी झिलमिलाहट पहुँचती है आज तक
सन १९८९ ईस्वी धरती पर क्या कर गया
पर फ़िलहाल उधर धूल ही धूल दिखाई देती है रोशनी नहीं
विचार कितने दिन बाद चमकने लगते हैं खो जाने के बाद
और लुप्त हो चुकी व्यवस्थाएं क्या किवाड़ बंद करके
लुप्त प्रजातियों की तरह
लुप्त होने के कारोबार में लग जाती हैं

अपनी माँ से पूछो अब आगे का क्या प्लान है
यहाँ से कब मुझे छुड़ाकर ले जाएगी

अरे
तुम्हें पता है मैं परसों जैसे मर ही गया था
उन्होंने मुझसे मेरे सारे कपड़े उतरवा लिए
जब मैं अपना बनियान और अंडरवियर उतार रहा था
तो लगता था मुझे अपने बच्चों से अलग किया जा रहा है
अब पता नहीं मैं कहाँ जा पडूँगा
नरक तो कोई जगह है नहीं और यह जो महबूब वतन है अपना
ऐसे ही धधका करेगा मेरे बिना।


असील घराना

आल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम में
कई उस्तादों और पंडितों को बिठाकर
विज्ञ संगीतज्ञ रोशनलाल सक्सेना चर्चा चलाए हुए थे
पता नहीं क्यों हर कोई उन्हें डॉक्टर साहब कह रहा था
बात घरानों, शैलियों और बारीकियों की थी
नमूने के तौर पर कुछ टुकड़े भी सुनाए जा रहे थे

इतने गायकों के बीच दबे से खामोश बैठे एकमात्र वादक
दुबले पतले सारंगीनवाज़ उस्ताद ममदू खां
कभी कभी झटके से सर हिला देते थे

सबसे बाद में रोशनलाल जी का रुख़
उनकी तरफ़ हुआ

कई बार खँखारकर सीने में अच्छी तरह साँस भरकर
ममदू खां बोले : अर्ज़ है कि बुज़ुर्ग क्या क्या नहीं दे गए
अजी हम तो किसी पासंग में नहीं ठहरते
अब अपने घराने का क्या बताएं --- बस एक ही खूबी है अपन के यहाँ
कि घराना हमारा बिल्कुल असील है

अब कुछ खामोशी छाई होगी तो वह रेडियो की खरखराहट और
सारंगी की आवाज़ में दब गई
फिर रोशनलाल की शुक्रिया अदायगी भी ठीक से सुनाई न दी

'' हा हा हा ! क्या बात कर डाली ममदू खां साहब ने !''
वाकया
सुनकर बोले उस्ताद विलायत खां
'' अंगूठाटेक हैं पर दिल की दौलत से नवाज़ा है परवरदिगार ने
कम बोलते हैं ममदू पर आह, क्या बात कही ! ज़रा गौर कीजिए
उनके सीधेपन और ईमान पर :
इसी के ज़ोर पर तो वह बजा लेते हैं ऐसी मज़े की सारंगी !''


संस्कार

बीच के किसी स्टेशन पर
दोने में पूड़ी-साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होता है
पेट की मरोड़ की तरह
और फिर छिपाकर फेंक देते हैं कहीं कोने में
अपना दोना।

सोचते
हैं : मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही दरवाज़े से निकलकर नहीं चला आया था।


संस्कार पर मंगलेश डबराल

इस कविता का 'नायक' -- अगर उसे माना जाए तो -- समाज के हाशिये का एक निवासी है। गरीब, दलित या फिर अल्पसंख्यक। कवि के मुस्लिम नाम के कारण यह माना जा सकता है कि यह एक 'अल्पसंख्यक स्थिति' की कविता है। उसका अकेला होना, बीच में होना, साग-पूड़ी खाना, रोना, उसे छिपाना और इस तरह ख़ुद के छिपने की कोशिश करना उसकी 'अल्पसंख्यक अवस्थिति' के कुछ मार्मिक लक्षण हैं। लेकिन सबसे ज़्यादा तकलीफदेह प्रमाण उसकी अन्तिम पंक्तियों में है जहाँ वह अपने अस्तित्व की विडंबनाओं को एक प्रच्छन्न क्रोध के साथ एक नैतिक अस्वीकार में बदल देता है। और तभी इस देश में विकृत-बुद्धि सांप्रदायिक हिन्दूवादियों की ओर से मुसलमानों के प्रति गढे गए और प्रचारित 'स्टीरियोटाइप्स' और पूर्वग्रहों की एक फिल्म ही दिमाग में घूम जाती है जिनमें से एक यह भी है कि मुसलमान माँ के पेट नहीं, किसी दूसरे रास्ते से पैदा हुए हैं। ऐसे मनुष्य-विरोधी, अश्लील और अपमानजनक पूर्वग्रहों का प्रतिरोध कबीर के पदों में बहुत प्रखरता से मौजूद है -- '' जे तू हिंदू का जाया / आन बात तें क्यों न आया / जे तू तुर्कन का जाया / अन्दर खत्तन क्यों न कराया''। असद जैदी की कविता एक निरावेग-सी भाषा में ऐसी भ्रांतियों- दुष्प्रचारों के इतिहास की भी याद दिलाती हुई उनका एक शालीन प्रतिरोध उपस्थिति करती है। यही उसकी महानता है, यही उसकी सच्ची जनवादिता है। हम लिखने-पढ़ने वाले लोगों में से अधिसंख्य शायद कई बार अपने को ऐसी 'अल्पसंख्यक स्थिति' में पाते होंगे और अपनी दुरावस्था या अपमान का आंतरिक रुदन या रघुवीर सहाय के शब्दों में 'एक दर्जा नीचे रहने का दर्द' छिपाते हुए ऐसा सोचते होंगे कि हमें भी सभी मनुष्यों की तरह माँओं ने जन्म दिया है।

8 comments:

Sunder Chand Thakur said...

असद जी का शुक्रिया कि वे हमारे लिए ऐसी कवितायें लिख रहें हैं उन्हें बताना चाहूँगा कि पिछले दिनों जो हमले उन पर हुए हैं उन्होंने हमारी भी ऑंखें खोल दी हैं हमारे भीतर जो कुछ मर रहा था अचानक इस सबने उसे झकझोरकर जिला दिया है और हम ख़ुद को बहुत नया ताजादम और ज्यादा समझदार महसूस करने लगे हैं हम आप पर हमला करने वालों के भी शुक्रगुजार हैं कि उनके कारण ही हमें मालूम चला कि हिन्दी कविता में ऐसा भी हो सकता है सोचिये अगर हम इस जानकारी से महरूम रह जाते तो क्या हमारे शब्दों में कोई आग आ पाती और हमारा लिखा हुआ सबकुछ कितना नकली होता

Ek ziddi dhun said...

हर दौर में अच्छे कवि के हिस्से में अक्सर संताप ही आए हैं. ऐसे अच्छे कवि पर हो रहे हमले कवि की प्रमाणिकता ही साबित करते हैं. हम पर जो गुज़री, हम जानते हैं, पर जो कवि पर गुज़रती है, कौन समझेगा?

aalekh said...

log bade naraz ho rhe the ki asadji kavitayen kyon hatwana chahte hain.unhone to aage badhkar kavitayen di apni.aur kavitayen gawaah hai ki we kitne shaandaar kavi hain.kisne likha hai aisa : अब पता नहीं मैं कहाँ जा पडूँगा
नरक तो कोई जगह है नहीं और यह जो महबूब वतन है अपना
ऐसे ही धधका करेगा मेरे बिना। aur yh bhi :
मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही दरवाज़े से निकलकर नहीं चला आया था। sochiye,kya-kya nhi kha moorkhon ne unke bare me.

प्रियंकर said...

हाशिए पर धकेल दिए गए देश के औसत नागरिक के दुख और तकलीफ़ें क्या हैं कवि गण हमें बताते रहे हैं और बताते रहेंगे,पर उन तकलीफ़ों का एक निरावेग-सी दिखती भाषा में जैसा बयान असद जैदी कर पाए हैं वैसा रघुवीर सहाय के बाद बहुत कम कवि कर सके हैं .

असद जैदी रघुवीर सहाय की परम्परा के अनूठे कवि हैं .

ravindra said...

वे मेरे शब्दों की ताक में बैठे हैं
जहां सुना नहीं उनका गलत अर्थ लिया और
मुझे मारा...
रघुवीर सहाय

अपने प्रिय कवि असद जैदी (और वे मेरे प्रिय कवि न होते तब भी) और उनकी कविताअों के साथ इन दिनों जो कुछ भी बरताव किया जा रहा है, वह कूढ़मगजी कहकर कतई टाला नहीं जा सकता। इसका एक सिरा बहुत पीछे जाकर जुड़ता है तो दूसरा सिरा धधकते वर्तमान से गुजर कर इस प्यारे और न्यारे वतन (कृपया इसे अतीत का गौरवगान न समझें) को आशंकाग्रस्त भविष्य से नत्थी कर देता है। असल दहशत इसी में छिपी रहती है और डोमा उस्ताद से लेकर मोदी उस्ताद तक सब इसी ताक में बैठे रहते हैं कि कब गलत अर्थ लिया जाए और मारा जाए। मिलान कुंदेरा की यह बात हमारे वतन के लिए हमेशा अर्थवान और मौजूं रहेगी कि देशों को नष्ट करने के लिए सबसे पहले उनकी स्मृति को नष्ट किया जाता है। मैं यहां ब्यौरे और जानकारी का अंबार नहीं लगाना चाहता लेकिन हम जानते हैं कि किस तरह से एक खास विचारधारा के योजनाबद्ध रणनीतिक और मैदानी कौशल से कैसे इतिहास को बदलने की बदनीयत पाली गई है। यह बदनीयत हमारे देश-समाज के जाने-अनजाने और सुदूर कोनों-अंतरों में किस बर्बरता से तोड़फोड़ और आतंक मचाती रही है, जग जाहिर है।
असदजी की कविताअों का जो कुपाठ किया जा रहा है उसके पीछे यही मानसिकता सक्रिय है। इसी मानसिकता के अलग-अलग मुखौटे और रूप तमाम जगहों पर यहां से वहां तक बिखरे पड़े हैं। ये जब-तब किसी फिल्म, किसी पेंटिंग, किसी खास दिन के खिलाफ सामने आते रहे हैं। और ऐसे लोग कितने कम हैं और वे लगातार अकेले होते जा रहे हैं जो कह सकें या बता सकें कि ये जो फिसलन और खराबी है उसमें सहारा देने वाली चीजें पहले से कितनी कम होती जा रही हैं।
अनुरागजी, सारे शोर को अनसुना करते हुए असदजी की इस मार्मिक अपील को बहुत धैर्य से सुने जाने की जरूरत है कि कविता को जानना, उसका अच्छा पाठक और साथी होना, ज्यादा ध्यान और मेहनत का काम है। मुझे लगता है कि कुछ लोग उनकी कविता को समझने की बात तो दूर उसकी बगल में आत्मीयता के साथ बैठने के बजाय मुंह में राम बगल में छुरी लेकर बैठे हैं। पाकिस्तानी शायर अफजाल अहमद के शब्दों का सहारा लेकर और उसे थोड़ा सा बदलकर कहूं तो असदजी की कविता शहर के शोर और दिल की खामोशियों से मिलकर बनी इस वतन की वर्तमान मौसिकी है। और इस मौसिकी में देश के एक धैर्यवान नागरिक की करुणा के वजन के शब्द हैं। इसमें उसका दुःख झरता हुआ सुना जा सकता है। और यह दुःख उस नागरिक का दुःख नहीं है जो सिर्फ तिरंगा फहराना ही (वह भी सिर्फ धोनी की जीत या सचिन-सहवाग की सेंचुरी पर) असल राष्ट्रभक्ति समझता है। यह दुःख उस नागरिक का दुःख है जो भारतीय इतिहास के एक बहुत ही महत्वपूर्ण सिलसिले को याद करते हुए और अपने धधकते वर्तमान के साथ एक आलोचनात्मक रिश्ते बनाता है। असदजी की बेहतरीन कविता सामान की तलाश के इस अंश पर गौर फरमाएं कि किस कदर यह कवि करुणा को एक संयत और विवेकवान प्रतिरोध में बदलता देता है।
यह उस सिलसिले की याद जिसे
जिला रहे हैं अब 150 साल बाद आत्‍महत्‍या करते हुए
इस ज़मीन के किसान और बुनकर
जिन्‍हें बलवाई भी कहना मुश्किल है
और जो चले जा रहे हैं राष्‍ट्रीय विकास और
राष्‍ट्रीय भुखमरी के सूचकांकों की ख़ुराक बनते हुए
विशेष आर्थिक क्षेत्रों से निकल कर
सामूहिक क़ब्रों और मरघटों की तरफ़
एक उदास, मटमैले और अराजक जुलूस की तरह
किसने कर दिया है उन्‍हें इतना अकेला?
इतिहास की एक चमकदार घटना की पृष्ठभूमि में यह कविता भूला-बिसरा दिए गए सच्चे राष्ट्रप्रेम की कविता है। और मुझे कहने दीजिए यह राष्ट्रप्रेम बिना एक आलोचनात्मक संबंध के संभव नहीं। इस कविता में एक पंक्ति आती है-कुछ अपनी बताअो। ये पंक्ति इतनी ताकतवर है और आप यदि कविता के अच्छे पाठक हैं तो आप महसूस करेंगे कि इस छोटी सी मारक पंक्ति (और यह पंक्ति किस कदर सपाटबयानी का भ्रम भी पैदा करती है) में कितनी सारी ध्वनियां और शोर पैदा करती है जिसे सुनकर आप इस मेहबूब वतन के हाहाकार से रूबरू होते हैं और जान पाते हैं उन लड़ाइयों को जो आज बहुत पास की हैं। यह आलोचनात्मक संबंध जितना अपने देश और उसके सूरते-हाल से है उतना कवि का अपने से भी है। हालांकि मैं अब तक उनका नया कविता संग्रह न तो देख पाया हूं और न ही पढ़ पाया हूं लेकिन इधर उनकी जो कविताएं कौन नहीं जानता, इस्लामाबाद, हिंदू सांसद, पूरब दिशा, पानी और सबद पर प्रकाशित शल्यचिकित्सा तथा असील घराना भी असद जैदी की अन्य कविताअों की तरह ऐसी कविताएं हैं जो किसी चलताऊ और लोकप्रिय किस्म की भावुकता में स्खलित नहीं होती और न ही किसी तनावहीनता में अखंड रोती-बिलखती हैं बल्कि अपने को भरसक संयत रखते हुए ये कविताएं एक अर्थ में सशक्त प्रतिरोध की कविताएं हैं जो हमें अपनी ही चिरफाड़ करने का, सुदूर और निकट के इतिहास के पानी में अपनी ही बिगड़ती शक्ल को देखने का मौका मुहैया कराती है। और सबसे बड़ी खासियत यह है कि असदजी यह सब, पाठकों को उत्तेजित किए बिना, उत्तेजित हुए बिना संभव करते हैं। उनकी कविताअों में गुस्सा है लेकिन विवेक का पल्लू नहीं छोड़ता, करुणा है लेकिन हर कहीं दिशाहीन बहती नहीं। समकालीन हिंदी कविता की तमाम तरह की लोकप्रिय और बहुप्रशंसित मुद्राअों और लटके-झटकों से अलग ये उनके वे काव्य गुण हैं जो उन्हें सबसे अनूठा बनाते हैं। हिंदी की बहुत सारी पिलपिली और लिजलिजी कविताअों के बरक्स उनकी ये कविताएं सच्ची करुणा, अवसाद और गुस्से की कविताएं हैं। ये सचमुच असील घराने की कविताएं हैं जो न केवल अपनी शल्यचिकित्सा करती है बल्कि हमारी और हमारा देश की भी और इसी की पीड़ादायी और त्रासद प्रक्रिया से गुजरकर अपने मेहबूब वतन पर बार-बार कुर्बान होती है। यह जानकार की कि यह वतन उसके बिना भी धधका करेगा।
अनुरागजी, असदजी के साथ जो कुछ हो रहा है, उससे मैं बहुत व्यथित हूं और अपनी पूरी ताकत से इसका विरोध करता हूं और आपको बधाई कि आपने उनका मार्मिक आत्मकथ्य और कुछ और बेहतरीन कविताएं पढवाईं। उन्हीं की कविता पंक्तियां का इस्तेमाल करते हुए एक अपील करना चाहता हूं कि दोस्तों-
जरा गौर कीजिए
उनके सीधेपन और ईमान परः
इसी के जोर पर तो वह लिख लेते हैं ऐसी मजे की कविताएं

रवींद्र व्यास, इंदौर

Geet Chaturvedi said...

असद की कविताओं के साथ जो व्‍यवहार किया गया, वह ग़लत और दुर्भाग्‍यपूर्ण है. अच्‍छी कविताओं को ग़लत तरीक़े से डीकोड करके, अर्थ का अनर्थ कर देना इन दिनों ख़ासा चल रहा है. असद का यह संग्रह कुछ दिनों पहले पढ़ा था, यह बीते बरसों का सबसे महत्‍वपूर्ण संग्रह है, इसमें कोई शक नहीं. प्रियंकर जी की बात सही है, रघुवीर के बाद बहुत कम कवि ऐसी कविता लिख पाए हैं.

ब्‍लॉग्‍स में अपना आना बहुत अनियमित है और ऐसे साजि़श भरे विवाद देखकर लगता है- ये कौन-सा दयार है...

vandana said...

shalychikitsa or aseel gharana hin nhi, mere liye sanskaar or us pr mangleshji ki tipanni v naie thi.baki haliya wad-wiwad ne asadji se parichay gahrane men hi bhumika nibhai.ravindrji ne upar thek ishara kiya hai,asad kavita ke aseel ghrane se aate hain.baki kavi ka kya mazhab,kaisi dendari!

vidya said...

aapki madhyam aur kavi ko lekar chinta,asad ji ka waktawy aur kavitayen tatha us pr mangleshji ki tipanni se bahut kuch spasht hua.wh ghrinit prachaar bhi jo pichle dino zoron pr rha,uska yh sabse rachnatmak pratiwad hai.