Monday, July 07, 2008

अनकहा कुछ : 2 : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

( यह प्रभात रंजन के स्तंभ की दूसरी प्रस्तुति है। शुरुआत उन्होंने ने शेक्सपिअर से की थी। हेमिंग्वे पर उनका लिखना हालाँकि अवसरानुकूल है, यह तथ्य है कि हम हेमिंग्वे जैसे लेखकों के होने-लिखने-बीतने के बावजूद हमारी स्मृति और समय में उसके संग-साथ के बारे में हर पल कुछ-न-कुछ जानने -महसूसने की कोशिश करते हैं। प्रभात की कोशिश में हमारा साझा यहाँ इसी तरह से है। )

मिस्टर परफेक्शनिस्ट : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

प्रभात रंजन

जुलाई का महीना विश्व के दो महान लेखकों के जन्म का महीना है -- फ्रांज काफ्का और अर्नेस्ट हेमिंग्वे। हेमिंग्वे के जीवन के संदर्भ में जुलाई का विशेष महत्त्व है। 21 जुलाई को जन्मे हेमिंग्वे ने इसी महीने की 2 तारीख को आत्महत्या कर ली थी। प्रसंगवश, काफ्का का जन्म 3 जुलाई को हुआ था। दोनों लेखकों में एक समानता और ढूँढी जा सकती है। वह यह कि बीसवीं शताब्दी के साहित्य पर इनका युगांतकारी प्रभाव पड़ा। हेमिंग्वे ने लिखा है कि जीवन के बारे में लिखने से पहले आपको उसे जीना अवश्य चाहिए। यही कारण है उनका लेखन और जीवन दोनों विविधतापूर्ण रहा।

1917 में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ाई में उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। उनके डॉक्टर पिता चाहते थे कि हेमिंग्वे उच्च शिक्षा प्राप्त करें, मगर हेमिंग्वे ने जीवन की पाठषाला को शिक्षा के लिए अधिक माकूल पाया। उन्होंने एक लोकप्रिय समाचारपत्र में संवाददाता के रूप में काम करना आरंभ किया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हेमिंग्वे ने बड़ी कोशिश की कि उन्हें सैनिक के रूप में युद्ध में शामिल होने का मौका मिल जाए। उनकी आंखें कमजोर थीं, इसलिए सैनिक बनने की उनकी हसरत तो पूरी नहीं हो पाई, मगर इस युद्ध को करीब से देख पाने की उनकी इच्छा जरूर पूरी हुई। रेडक्रास संस्था को इस युद्ध में एम्बुलेंस चलाने के लिए बड़े पैमाने पर ड्राइवरों की ज़रूरत पड़ी और ड्राइवर के रूप में युद्ध से जुड़ने का उनको मौका मिल गया।

युद्ध के दौरान वे बुरी तरह घायल हुए। एक नर्स की सुश्रुषा से उनकी जान बची। उससे उनको प्यार भी हुआ। यह उनका पहला असफल प्यार था। हेमिंग्वे के अत्यंत प्रसिद्ध उपन्यास फेयरवेल टु आर्म्स को समझने के लिए उनके इस जीवन-संदर्भ को समझना आवश्यक है। एम्बुलेंस चालक और नर्स की इस प्रेमकथा के विषय में कहा जाता है कि युद्ध और प्रेम को आधार बनाकर अमेरिका में जितने उपन्यास लिखे गए हैं, इसका स्थान उनमें अन्यतम है। आज भी युद्ध को संदर्भ बनाकर लिखे गए उपन्यासों के प्रसंग में इस उपन्यास का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसके प्रकाशन के समय हेमिंग्वे की उम्र महज 27 साल थी। वैसे इस उपन्यास के प्रकाशन के पूर्व द सन ऑल्सो राइजेज नामक उपन्यास के प्रकाशन के साथ हेमिंग्वे अमेरिका में नई पीढ़ी के संभवनाषील उपन्यासकार के रूप में अपनी पहचान दर्ज करवा चुके थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जवान होने वाली पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के साथ साहित्य में लॉस्ट जेनरेशन का मुहावरा प्रचलित हुआ। लॉस्ट जेनरेशन यानी वह पीढ़ी जिसके सपने और उम्मीदें युद्ध की भेंट चढ़ गए।

युद्ध हेमिंग्वे के लिए जीवन भर आकर्षण का कारण बना रहा। स्पेन का गृहयुद्ध पत्रकार के रूप में उन्होंने बहुत करीब से देखा। चीन पर जापान के अतिक्रमण की घटना के वे गवाह बने। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्होंने बतौर एम्बुलेंस ड्राइवर हिस्सा लिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध की वीभिषिका को उन्होंने वार कॉरसपौंडेंट के रूप में कवर किया। स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान हेमिंग्वे वहां चार बार गए। गृहयुद्ध के अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने फॉर हूम द बेल टौल्स जैसा उपन्यास लिखा। कुछ आलोचक इसे उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं। द ओल्ड मैन एंड सी के बाद हेमिंग्वे का यह सबसे अधिक बिकने वाला उपन्यास है। स्पेन की बुलफाइटिंग को केंद्र में रखकर उन्होंने डेथ इन द आफ्टरनून नामक उपन्यास लिखा जिसके बारे में यह कहा जाता है कि बुलफाइटिंग पर अंग्रेजी भाषा में लिखी गई यह सर्वश्रेष्ठ कृति है।

हेमिंग्वे का औब्शेसन केवल युद्ध तक ही सीमित नहीं था। वे शिकार-यात्राओं के हद दर्जा शौकीन थे। अफ्रीका के जंगलों में की गई शिकार-यात्राओं को आधार बनाकर जब उन्होंने ग्रीन हिल्स ऑफ़ अफ्रीका नामक उपन्यास लिखा तो उसकी भूमिका में दर्ज करना न भूले कि इस उपन्यास की घटनाएं और पात्र काल्पनिक नहीं हैं। उनकी कई कहानियों में जंगल के जीवन का चित्रण है। ताउम्र हेमिंग्वे एक ऐसे लेखक की मिसाल बने रहे, सक्रियता जिसके जीवन का महत्वपूर्ण आयाम थी। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा जिसका जीवन में उन्होंने अनुभव न किया हो। मछली का शिकार हेमिंग्वे के जीवन का सबसे बड़ा खब्त था। कहते हैं कि क्यूबा में हवाना शहर के सीमांत पर एकांत में उन्होंने इसलिए घर बनवाया था ताकि मछली का षिकार करने में किसी तरह की बाधा न आए। प्रसंगवश, हेमिंग्वे का सबसे लोकप्रिय उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी माना जाता है। इसी उपन्यास के प्रकाशन के बाद उनको साहित्य का नोबेल पुरस्कार (1954) मिला। उपन्यास में एक मछुआरे के अदम्य साहस और जिजीविषा की कहानी कही गई है।

हेमिंग्वे के उपन्यासों की छाया में अक्सर उनकी कहानियों की चर्चा कम होती है। लेकिन एक प्रसिद्ध अमेरिकी आलोचक का मानना है कि अगर हेमिंग्वे ने इतने जबर्दस्त उपन्यास न भी लिखे होते तो भी अपनी कहानियों की बदौलत साहित्य में उनको हमेशा याद किया जाता। वास्तव में हेमिंग्वे की कहानी कला ने दुनिया भर के लेखकों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया। द किलर्स, द शॉर्ट हैप्पी लाइफ ऑफ़ फ्रांसिस मैकंबर, ए क्लीन वेल लाइटेड प्लेस, हिल्स लाइक वाइट एलिफैंट, द स्नो ऑफ़ किलिमंजारो जैसी उनकी प्रसिद्ध कहानियों की विशेष शैली को बाद में आलोचकों ने हिडेन फैक्ट की संज्ञा दी। इस शैली में कहानी में अक्सर उस बात की कोई चर्चा नहीं होती, कहानी जिस घटना के बारे में होती है। कहा जाता है कि हेमिंग्वे की सर्वश्रेष्ठ कहानियां वे हैं जिनमें मानीखेज चुप्पियां हैं।

अपने जीते-जी हेमिंग्वे एक मिथकीय व्यक्तित्व बन चुके थे। मगर अपार लोकप्रियता और सफलता के बावजूद वे अवसाद और निराशा के मरीज बन गए। जीवन को लेकर उनके मानक बहुत उंचे थे। जीवन भर वे किसी और बेहतर जीवन की तलाश करते रहे। उनके एक जीवनीकार ने लिखा है कि वे एक साथ सब कुछ पा लेना चाहते थे और उसी क्षण उनकी इच्छा कुछ भी न पाने की होती थी। उन्होंने चार विवाह किए, असंख्य प्रेम किए और मरने के बाद अपने गुप्त जीवन की अनेक किंवदंतियां छोड़ गए। उनके साहित्य की तरह ही उनके जीवन के प्रति भी पाठकों का आज तक आकर्षण बना हुआ है। हेमिंग्वे के बारे में कहा जाता है कि वे अपने लेखन में आला दर्जे के परफेक्शनिस्ट थे। जीवन में भी इसी पूर्णता की तलाश उन्हें थी।शायद अपने मानकों के आधार पर उस पूर्णता को न पा सकने के कारण ही उन्होंने आत्महत्या का मार्ग चुना। अपने जीवन और साहित्य से पूर्णता की उम्मीद रखने वाले हेमिंग्वे मृत्यु को भी पूर्णता में पाना चाहते थे।

कहते हैं कि 2 जुलाई 1961 को कनपटी में गोली मारकर आत्महत्या करने से पहले पहले करीब एक साल तक उन्होंने कनपटी में खाली पिस्तौल सटाकर गोली चलाने का अभ्यास किया था। मृत्यु के करीब 50 सालों के बाद भी हेमिंग्वे के लेखन और उनके जीवन के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। इंटरनेट के दौर में हेमिंग्वे के चाहने वालों ने हेमिंग्वे डॉट कॉम बनाया। हर हफ्ते करीब 12 हजार लोग इस वेबसाइट पर हेमिंग्वे के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के उद्देश्य से आते हैं। यह हेमिंग्वे की लोकप्रियता का प्रमाण है और उस प्रभाव का भी जिसके कारण उनकी गणना बीसवीं षताब्दी के महानतम लेखक-व्यक्तित्वों में की जाती है। वे एक ऐसे लेखक थे जिनके लिए जीवन ही साहित्य था।

11 comments:

रूपसिंह चन्देल said...

हेमिंग्वे पर प्रभात रंजन का आलेख महत्वपूर्ण है. अन्य महान लेखकों पर भी सामग्री देते रहेगें.

चन्देल

anita said...

its v v intersting information abt.hemingve....thanx prabhat ji for such fantasic article ...
hope we will get such articles about others writers also.
regards
anita

पीयूष दईया said...

प्रिय प्रभात जी,
हेमिग्वे के जीवन व लेखन पर आपने सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। बांध लेने वाली रोचक पठनीयता। गद्य के आस्वाद को गहरा व अन्तरंग बनाती।
लेखन के बारे में हेमिग्वे के विचार सम्भवतः हर लेखक के लिए प्रासंगिक व अर्थवान है। जीवन में साहित्य और लेखन में परफेक्शनिज्म पर आपका निजी सोच क्या है? यह जानने की गहरी जिज्ञासा है। क्या आप थोड़ा समय निकाल कर हम पाठकों से अपने विचारों का साझा कर सकेंगे ?
पीयूष दईया

rashmi said...

ek bare rachnakar ke bare me jankariyo ki kashish hamesha bani rahti hai.....dhanyabad is kashish ko puri karne ke liye....sadhubad.

namita said...

hemingve ke bare mein padhkar achha laga!! is tarah ke aur articles ke intezar rahega!!!!
great efforts i must say!!!!!

aalekh said...

prabhat ranjan ne hemingway ke bare men bahut achha likha hai.hmne hemingway ko old men and the sea se jana tha.unke khabt wagairah ke bare men nahi jante the.aisi rochak aur gyanwardhak lekhan se do-chaar krate rhen.

Anonymous said...

I am delighted with the kind of hot and happing is taking place on web space by you people. I really appreciate for such a great contribution being done in Hindi literature. Keep it up and up. Thanks! - BrainWash

ajay said...

prabhat ranjan ne bahut rochak lekh likha hai.ankha kuch me aur kai lekhakon ke bare me anjani baten janne ko milengi,aisi aasha hai.

bhashkar said...

हेमिंग्वे एक मिथकीय व्यक्तित्व बन चुके थे। yahi comment unke bare me sochne ko kaheta hai, ye article patne ke bad padhkar mein jaror हेमिंग्वे ko padhogan. is striya article ke liye aur hindi ke content ko inrich karne ke liye prabhatji ko dhanybad.

katyayani said...

Prabhat Ji! aapka ye lekh khubsurat hai...
Khubsurat isliye ki ye badi sarlta se Hamingve ki tasweer dimag mein banata hai...
aur isse bhi mahatvapurn, jo ki aapki taarif se juda hai... ye Hamingve ko padne ko majboor karta hai...

aadarsh jatt said...

nice story.!