Wednesday, July 09, 2008

कला का आलोक : 2 : हकु शाह


( पिछले पन्नों में आपने कला का आलोक स्तंभ के तहत चित्रकार हकु शाह से पीयूष दईया की बातचीत पर आधारित गद्य पढ़ा है। पेश है उसकी एक और कड़ी। कहना न होगा कि हकु शाह ने यहाँ एक मामूली स्त्री के गैरमामूली कला-उद्यम पर जो कहा है वह साधारण की महिमा की प्रतिष्ठा के अलावा दूसरों के कला-कर्म में विनम्र पैठ और उसके महत्व-स्थापन की ओर स्वयं उनके और प्रकारांतर से पीयूष के उद्यम का भी अप्रतिम नमूना है। ऊपर हकु शाह की एक चित्रकृति लगी है। )

धूळि

सन् 1964 के आसपास जब मेरा बच्चा--पार्थिव--बहुत छोटा था तब एक औरत खिलौनों की एक टोकरी अपने सिर पर उठाए उन्हें बेचने अहमदाबाद की गलियों में घूमती थी। हमारे घर आती थी। वह मिट्टी और काग़ज़ से बनी डुगडुगी को बजाते हुए आती थी। सभी पहचान जाते थे कि खिलौना बेचने वाली आई है। उसके खिलौनों में घंटी , घोड़ा , पालना , खटिया , हाथी वग़ैरह मुख्य होते थे जिन्हें वह मिट्टी से बनाती थी और सफे़द चूने या मिट्टी में भिगो कर फिर हल्के बैंगनी व लाल ,नीले व पीले जैसे कच्चे रंगों से उन्हें अलंकृत करती थी। वह जब अपने उजले खिलौने लेकर आती थी तब लोग इन खिलौनों को पांच-दस पैसे में या चपाती के बदले खरीदते थे। उसके आते ही सारे बच्चे इकठ्ठा हो जाते थे। ''डमक डमक'' की आवाज़ आते ही पूरा मोहल्ला जान जाता था कि वह अपने खिलौने लेकर आ रही है--उसका नाम बहुत अच्छा था--धूळि। धूळि का अर्थ है--धूल , डस्ट। धूळि के लिए धूल--मिट्टी--ही देवता थी।

धूळि का मझोला कद क़रीब पांच फीट दो इंच का रहा होगा। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें बहुत उजली व चमकदार थी। उम्र क़रीब बाइस-तेइस की रही होगी। अपने चिथडा-से घाघरा-चुन्नी पहने वह बहुत सुंदर लगती थी। रंग गेहुंआ व नाक-नक्श बहुत अच्छे व हल्का तीखापन लिए थे--मेहनतकश थी वह। स्वभाव से वह वाचाल नहीं थी--ऐसा नहीं होता था कि वह अपने दुख-सुख का पिटारा खोल कर बैठ जाती हो और गप्प लगाने लगती हो। उन दिनों धूळि के अलावा कुछ और लोग भी इसी तरह के खिलौने लेकर आते हों , ऐसा खयाल नहीं पड़ता। वह आती थी, किसी फेरीवाले की तरह ऊंचे स्वर में नहीं बल्कि अपने ड्रमनुमा खिलौने--डुगडुगी-- को बजाते हुए। उसके साथ उसका क़रीब डेढ़-दो साल का बच्चा भी आता था। बहुत सालों तक वह आती रही। हमारी बातों से प्रेरणा लेते हुए बीच बीच में उसने विभिन्न प्रकार के मां-बच्चा और पनिहारिन भी बनाए और फिर वह इन्हें ख़ूब बनाने लगी थी। मुझे इनमें धूळि को देखना बहुत पसंद था। ऐसे धीरे-धीरे उसके खिलौनों के प्रकार भी बढ़ते चले गए।

खिलौनों के आकार लम्बाई में पांच-छः इंच और चैड़ाई में तीन-चार इंच के होते थे। उसने जो रूप बनाए उसमें तकनीक , विधि व रचना-सामग्री तथा सरल-सादा हुनर का कमाल मुख्य था। इन खिलौनों को बनाए आज लगभग चालीस साल हो गए हैं लेकिन फिर भी--कच्ची मिट्टी से बने हुए होने के बावजूद--ये सलामत हैं; हालांकि ये बच्चों द्वारा खेलने व तोड़ने व इससे आनन्द लेने के लिए ही बने थे। इन खिलौनों की पूरी गढ़त में अद्भुत कल्पनाशीलता व गहरी समझ-बूझ है। किसी भी महान आधुनिक शिल्प के बरक्स इन्हें रखा जा सकता है।

इन खिलौनों के रंग अद्भुत दिखते थे और उनकी रूपाकृति--रूप के भीतर रूप जैसे हेनरी मूर के मूर्तिशिल्प और यह खिलौना। क्या आपको नहीं लगता कि चंडीगढ़ के ला कार्बुज्ये के हाथ और यह खिलौना साथ में रखे जा सकते हैं ? और टेराकोटा के वे हाथ जिन्हें आदि-वासी लोग देव को अर्पित करते हैं ? धूळि के खिलौने उतने ही आला दर्जे के हैं जितनी की ये कृतियां।

धूळि की मां भी ये खिलौने बनाती थी या नहीं, मैं नहीं जानता। हो सकता है कोई स्त्री किसी गांव में हमेशा ऐसे खिलौने बना रही हो... वह एक गरीब समुदाय,''वाघरी'' की थी। मूलतः वह मेहसाणा के पास लोलाड नामक गांव में रहती थी। यहां आने पर वह इधर अहमदाबाद में एक जगह है--ढोर बाजार , उधर वह अपने पति के साथ एक झोंपड़ा बनाकर रहती थी--साल के उन दिनों के लिए जब वह फसल कटने के बाद गांव से यहां खिलौने बेचने आती थी। बारिश के बाद जब मेलों के दिन आते हैं क्योंकि तब खेतों में काम ख़त्म हो जाता था। साल में एक बार धूळि का फेरा पड़ने पर कुछ समय तक चलता था--वह बच्चों की छुट्टियों वाले दिन ज़्यादा आती थी ताकि उसके खिलौने ज़्यादा बिक सकें। सुबह क़रीब दस-ग्यारह बजे के आसपास उसका फेरा लगता था। उसका पति टिन के डिब्बे बनाता व मरम्मत करता था। कभी कभी वह आता था--अपनी खास आवाज़ के संग ही : डाबडा बनवा लो , डाबडा बनवा लो : की पुकार सुनाई पड़ जाती थी। धूळि और उसके पति को मैंने कभी साथ आते जाते नहीं देखा--वह अलग गलियों में जाता था, धूळि अलग मोहल्लों में।

इन खिलौनों को मैंने अपने दफ्तर की मेज़ के ऊपर भी रख रखा था। वहां इन खिलौनों को देखकर चार्ल्स इम्स ने इन्हें बहुत पसंद किया व सराहा था। इसी तरह एक दिन स्टेला क्रमरिश जब हमारे घर पर थीं तब उन्हें भी ये खिलौने इतने पसंद आए कि उन्होंने इन खिलौनों को,''अननोन इंडिया'' नामक प्रदर्शनी में रखना चाहा। इस प्रर्दशनी का क्यूरेटर मैं था। स्टेला की इच्छा थी कि धूळि,''विवाह'' पर एकाग्र खिलौने बना दे, जो फिर धूळि ने बहुत सुंदर तरह से बनाए--ये खिलौने आज भी फिलेल्डेल्फिया संग्रहालय में हैं। यह बात बहुत सहज तरह से बनी थी। धूळि ने,''विवाह-श्रृंखला'' पर एकाग्र बीस-पच्चीस खिलौने बनाए। उसके मन में शायद उन खिलौनों के अमेरिका--परदेस--जाने से भी ज़्यादा हमारे प्रति अहोभाव था। यह खयाल करके मुझे बहुत अच्छा लगता व संतोष होता था कि धूळि के खिलौने एक बड़ी प्रदर्शनी में हिस्सेदारी करने वाले हैं। मेरी इस ख़ुशी में ही वह अपनी ख़ुशी देख रही थी। उसका आनन्द इन खिलौनों को बनाने का और उन्हें हमें भेंट देने में छिपा था। हालांकि इन खिलौनों के लिए उसे पर्याप्त राशि दी गई थी लेकिन वहां केन्द्र में रूपया नहीं बल्कि अपनी रचनात्मकता का साझा व प्रेम था।

धूळि अलग अलग मौसमों में हमारे घर आती रही लेकिन फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया--मुझे नहीं मालूम क्यों--वह नहीं आ रही थी। उसका पति , अपने बच्चे के साथ, हमारे यहां कभी कभी धूळि का समाचार लेकर आता था। कुछ देर बैठता , चाय-पानी पी कर चला जाता। एक दिन अचानक वह आया और हमें एक बड़ी राखी देते हुए कहा कि यह राखी धूळि ने अपने भाई--यानी मेरे लिए--भेजी है। यह सचमुच एक मार्मिक संबंध बन गया था। हमने राखी रख ली, कुछ उपहार भेजा।

धूळि के बनाए खिलौने कच्ची मिट्टी के थे। धूळि के खिलौने देखकर लगता है मानो ये परम्परा का एक भाग हैं। भारत में गुजरात राज्य के मेहसाणा गांव की एक औरत --जिन्हें हम पिछड़ा मानते हैं--वह खिलौने बनाती है। न मालूम कैसे उसने सीखा होगा। दो बातें फिर भी स्पष्ट है--एक यह कि धूळि को इन्हें बनाने में रस आता होगा। दूसरा यह कि यह खिलौने उसकी आजीविका का साधन रहे , जिन्हें वह बेचती थी। सारे भारत में अगर देखें, खिलौने बहुत अलग अलग प्रकार से बनते रहे हैं जिनमें मिट्टी , स्क्रैप व स्थानीय साधन-सामग्री से बनने वाले खिलौने सम्भवतः सबसे ज़्यादा हैं। धूळि के बनाए खिलौनों में मुझे शिल्प-सा आनन्द आता था। इन खिलौनों में क्या जान है यह बता पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है लेकिन इन से मिट्टी की पहचान , धूळि का उससे लगाव , इन्हें बनाने की रीत/ढंग , और यह कि बच्चों का मन उनमें रमता था।

बतौर कलाकार जो बात खास तौर से मेरा ध्यानाकर्षण करती है वह है मिट्टी का लचीलापन और रंगों का पहनावा व आकृतियों की बनावट। ये खिलौने मुझे उस संस्कृति का हिस्सा लगते हैं जो, ''सिग्नेचर की अवधारणा'' से दूषित नहीं है। आजीविका का साधन होने के बावजूद ये तथाकथित बाज़ार के बजाय साझे की भावना से प्रेरित हैं। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बजाय अपनी रूचि के अनुसार चीजें बनाने की रचनात्मकता से ओतप्रोत हैं। भारत में ऐसे कई सौ कलाकार आज भी विद्यमान होंगे। मैंने कच्छ में भी ऐसे ही खिलौने बनाने वाले देखे थे। कभी एक फ़िल्म भी बनाई थी--''स्क्रैप''। यहां वे लोग तोता ही बनाते थे , कुछ और नहीं। उन तोतों में भी धूळि के खिलौनों जैसी ही जान थी। इन खिलौनों की गुणवत्ता के कारण बहुत से हैं: अपना खेत--अपनी मिट्टी से लगाव, बच्चे, जीवन के ही एक भाग के रूप में कला, सादगी--सहजता, अन्तर्दृष्टि, बनाने की रीत व तकनीक संग उसकी आवडत साझा और इनमें से निकलते हुए कला-संस्कार जिन्हें असल में मैं हरेक मानव में एक नैसर्गिक वृत्ति के रूप में देखता हूं।

जन से मेरा नाभिनाल संबंध रहा है। मेरे लिए सबसे बड़ा है जन। यह सच है कि पूरा का पूरा एक बड़ा मनुष्य तक अन्ततः पानी की एक बूंद जितना ही होगा लेकिन जन में जो शक्ति है वह अमाप है। आप कहेंगे कि उसके भी दो हाथ है लेकिन नहीं , वह असंख्य हाथों से बना है। मेरे लिए यह इतना विराट हो जाता है कि अवर्णनीय है।समाज में , जीवन में जो बदलाव आ रहे हैं उन्हें भी ये बहुत ही सहज तरह से स्वीकार कर अपने साथ ले लेते हैं। इस बदलाव को अपने कला-संस्कार से जोड़ते हैं। एक तरह से ये एक बच्चे की बाल-सहजता जैसी बात है। लेकिन परिवर्तन निरन्तर बहता हुआ पानी है।

9 comments:

vikalp said...

Haku shah ne dhuli mein jo khubiya talash li. yeh ek kalakar ke parkhi nazar aur nek niyat ka parinam tha ki Dhuli ke kritritva duniya ko samne aaya.kyonki Na jane kitni aesi Dhuli aaj bhi hamare samaj mein hai jise So called kalakar ne dekha, parkha magar Uski kala ko appriciate karne ki himmat nahi dikhai. kahir Haku Shah aur Dhuli dono shradha ke patra hai. inhe naman kijiye

namita said...

ajj pata nahi kitni dhuli ki chhavi dhumil hoti jaa rahi hai, unke vishay mein to koi likhta bhi nahi hai. achhe kalakar aur achhe insan hi inke bare mein soch sakte hain....

aalekh said...

haku shah ka banaya chitr aur wyakt vicharon ko padh-dekh kr yh baat mukammal hoti hai ki we jitne bade kalakaar hain utne hi bade insaan bhi.unhone dhutti jaise kalakaar ke bhitar jo kala-darshan kiye aur uska mahtwa samjhaya wh apne aap men ek bhut badi misaal hai.maine kala ka aalok ki phli prastuti bhi dekhi.ab piysh aur haku samvad ko kitab ki shakl men dekhne-padhne ki iksha aur balwati ho gai hai.

vandana said...

yh achha hua ki sabad pr haku shah ka kuch aur bhi samne aaya.dhuthi ko unki parkhi nigah se jan na ek anubhaw hai.sabme,aur isme aam aadmi aur kalakaar dono shamil hain,na to aisa vision hota hai na hi use vyakt krne ki udarta.

ajay said...

durlabh samagri,durlabh lekhan aur sabse durlabh haku shah ki sahirdayta!

prabhatranjan said...

piyushji ne bahut achha likha hai.ashha hai aage bhi jaldi hi parhne ko milega. bahut achha gadya hai.
prabhat

shraddha said...

ek film hai "do ankhe barah haath" is lekh ki shuruat padhte hi us film ki yaad aa gayi.

bhashkar said...

धूळि ke bahane mujhe bhi apne bachpan ki yaad taza ho gai. kisi धूळि ko to meine nahi dekha, par mitti ke khilono se khela jaror hun. haku sha ki jobani ko piyushji ne bhut sundar tarike likha he, patte same laga ki mano ek film humre samne chal rahi hai. jeeven mei hum apne pass ki bhut simple chizo ko importance nahi dete hai, lekin yado ke jarokhe mei dekhne par yahi sab sabse khas hota hai. piyushji apko dhanywad, ki apne sah sahab ko naye tarike hammare samne pess kiya. is swamead ko patkar muj jaisa sadharn reader bhi koch der rokta hai, jo mere liye bhut badi baat hai.

lalit said...

वाकई बचपन याद आ गया। मैं भी इन खिलौनों से खेला हूं। वो जो डुगडुगी या डमरु टाइप खिलौना होता था उस पर लगे सफेद कागज पर उंगली से होली वाले गुलाबी रंग से आड़ी तिरछी तीन या चार लाइनें खिंची होती थीं। मैं अकसर उस पर रंग या पैन से कोई कलाकारी करता था ताकि खुद को अच्छा कलाकार समझता रहूं। तब ड्रॉइंग का जबरदस्त शौक होता था। तो उस डमरु के नीचे सरकंडा होता था जिसे दोनों हाथों के बीच रखकर मसलते थे तो कपड़े के सिरों पर चिपकी मिट्टी की डली कागज से टकराकर आवाज पैदा करती थी। एक घोड़े जैसा दिखने वाला खिलौना होता था। दरअसल वह सीटी थी। घोड़े के मुंह को जब मुंह में रखकर फूंक मारते थे तो जोर की सीटी तो बजती ही थी उस खिलौने को पकाने के लिए इस्तेमाल घासफूस की राख मुंह में घुस जाती थी। फिर उसे धोते थे। जब घोड़ा टूट जाता था तो उसका सीटी वाला हिस्सा ज्यों का त्यों काम करता था। बाकी के खिलौने ज्यादातर लड़कियां लेती थीं। हमारे फेवरिट यही थे। हूबहू धूळी जैसी दिखने वाली एक औरत ही सिर पर टोकरा रखकर उन्हें बेचने आती थी। उसकी गोद में बच्चा भी होता था। मैं ज्यादातर बीस पचीस पैसे में वो खिलौना खरीदता था। कई बार रोटी देकर भी खरीदा। इस आलेख को पढ़ते वक्त उन्हीं गलियों में थोड़ा घूम आया जहां वो खिलौने वाली खिलौने ल्यो खिलौने की आवाज़ लगाती थी। सही है कि तब शायद उन खिलौनों की इतनी अहमियत नहीं लगती थी जितनी अब लगती है। अब कोई ऎसे खिलौने बेचने भी नहीं आता। और शायद अब बच्चों को ये पसंद भी ना आएं। शायद ही आएं क्योंकि अब तो उनके पापा उन्हे बाज़ार से धांय धांय की आवाज़ करने वाली स्टेनगन या लंबी चौड़ी रेलगाड़ी या नंबर गेम या फिर आवाज़ निकालकर एबीसी सिखाने वाला पियानो लाकर दे देते हैं। वैसे भी ज्यादातर मम्मियां मिट्टी मुंह में लेने से मना करती हैं। कभी कभी सोचता हूं जिसने ऎसी मिट्टी को मुंह नहीं लगाया वो भला कैसे किसी धूळि के बारे में सोच सकेगा।