Posts

Showing posts from July, 2008

बधाई : निशांत

Image
( कविता के लिए वर्ष २००८ का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कारयुवा कवि निशांत को दिया जाएगा। किसी एक कविता को आधार बना कर दिए जाने वाले इस पुरस्कार के लिए समकालीन भारतीय साहित्य के जुलाई-अगस्त २००७ के अंक में प्रकाशित उनकी कविता, ''अट्ठाइस साल की उम्र में '' को चुना गया है। इस वर्ष के निर्णायक नामवर सिंह थे। निशांत और उनकी कविता के बारे में उनका यह कथन उल्लेखनीय है कि बड़बोलेपन से बचते हुए यह कवि अपने आस-पास के जीवन से सीधे साक्षात्कार करता है। आगे यह कि काव्य-भाषा पर भी कवि का अच्छा अधिकार है। निशांत की कविताएं पत्र -पत्रिकाओं में एक लंबे अरसे से आ रही हैं। पहले वे अपने घरु नाम मिठाईलाल से कविताएं लिखते थे। बाद में इसे कवि-आलोचक अशोक वाजपेई के सुझाव पर बदल दिया और निशांत नाम से कविता करने लगे। वैसे उनका पढू नाम विजय कुमार साव है। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, '' जवान होते हुए लड़के का कुबूलनामा '' भारतीय ज्ञानपीठ की युवा पुरस्कार योजना के तहत शीघ्र प्रकाश्य है। हमें खुशी है कि उन्होंने हमारे आग्रह पर पुरस्कृत कविता के साथ-साथ दो नई कविताएं भी सबद पर …

दूर देश में हिन्दी

Image
हालांकि हिन्दी का सृजन-संसार दूसरी भाषाओँ में अनुवादों के जरिए व्यक्त-विन्यस्त होता रहा है, हमारे तईं अक्सर बॉलीवुड फिल्मों के आनंद-महोत्सव के लिए भी जानी जाने वाली डच नगरी एम्सटरडम से जब हिन्दी कविताओं का कोई संचयन आए तो सुखद अचरज होना स्वाभाविक ही है। ik zag de stad ( इक ज़ाग दि स्ताद ) यानी मैंने शहर को देखा नामक इस संचयन में शहर पर केंद्रित आधुनिक हिन्दी कविता के पंद्रह कविओं की अट्ठाईस कविताएं शामिल हैं। संचयन को संभव किया एम्सटरडम स्थित इंडिया इंस्टीट्यूट के हिन्दी प्रेमी-प्राध्यापक डिक प्लुकरऔर समाजशास्त्री लोदवैक ब्रुंटने। प्लुकर और ब्रुंट वर्षों से भारत आते रहे हैं और उन्होंने भारतीय कविता और समाज का बहुत गहराई से अध्ययन किया है। उनकी इस अध्ययनशीलता को हिन्दी के वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे का भी संबल मिला जिन्होंने न सिर्फ़ उन्हें अनेकों हिन्दी कविओं की कविताएं उपलब्ध कराई, बल्कि उन कविताओं के जटिल अनुवाद और चयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। त्रिलोचन से लेकर कात्यायनी तक की चयनित कविताओं में गांव और शहर के बीच का जीवन, उसका वैविध्य और तनाव तरह-तरह से व्यक्त हुआ है। शहर का …

सृजन- संवाद : गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़

Image
( किसी ऐसी पुस्तक को जिसे पढ़ने-पाने की चाह मन में वर्षों से दबी हो, अगर अचानक मिल जाए तो उस मिलन की खुशी और पठन के रोमांच को शब्दों में बयां करने की असफल कोशिश करने की बजाय यह ज़रूरी लगा कि उसके कुछ हिस्से आपके सामने लाए जाएं। दिलचस्प यह है कि विश्व के महानतम कथाकारों में शुमार गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ से उनके अंतरंग पत्रकार मित्र प्लीनियो आपूलेयो मेन्दोज़ा का''फ़्रैगरेन्स ऑफ़ गुआवा'' नामक पुस्तकाकार इस अनूठे संवाद ने, जिसमें मारकेज़ के कथा-लेखन की पटभूमि और जीवन के कई अजाने पहलू शामिल हैं, उनके उपन्यासों जितना ही न सिर्फ़ ख्याति अर्जित की, बल्कि इसे उस लेखन से उपजे विभ्रम और महत्व को समझने में गाइड-बुक जैसी अहमियत भी मिली। हमें अशोक पांडे का आभारी होना चाहिए जिन्होंने इस गुम होती किताब को हिन्दी में स्पैनिश से सीधा और पूरा अनूदित करने का महत उद्यम किया। इस अनुवाद के कई अंश पत्रिकाओं में पहले छप चुके हैं। सबद पर इसका आना उनके स्नेह का ही परिचायक है, काम तो उनका हम सब जानते-सराहते हैं ही। ये अनुवाद पुस्तकाकार शीघ्र ही संवाद प्रकाशन से छप कर आएंगे। )

पहला वाक्य किताब की प्…

एक कवि एक कविता : 3 : श्रीकांत वर्मा

Image
( यह सबद के लिए युवा कवि-लेखक यतीन्द्र मिश्र की कविता पर श्रृंखलाबद्ध लिखी जा रही टिप्पणियों की तीसरी कड़ी है। उनके अध्यवसाय और पाठकीय प्रतिक्रियाओं से यह लगता है कि कविता कुछ और पास अपने आई है। प्रस्तुत टिप्पणी हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा की कविता, ''कलिंग'' पर है जिसका अर्थाशय मननीय है। कविता संलग्न है। इसे हम राजकमल प्रकाशन से छपे कवि की प्रतिनिधि कविताओं से साभार दे रहे हैं। अगली टिप्पणी रघुवीर सहाय की कविता, ''तोड़ो'' पर होगी। )

कलिंग का कव्याभिप्राययतीन्द्र मिश्रसम्राट अशोक के ऐतिहासिक चरित्र के बहाने ‘कलिंग’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविता में श्रीकान्त वर्मा, समाज में मौजूद मनुष्य की असहायता, लाचारी, दर्प और मोहभंग को अत्यन्त बेधक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। यह सर्वविदित है कि अशोक के साम्राज्य विस्तार की लोलुपता का अन्त कलिंग युद्ध के उपरान्त ही माना जाता है, जब अनगिनत हताहतों व शवों को देखकर उसका हृदय परिवर्तन होता है। इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यहाँ कविता में ध्यान देने वाली बात यह है कि कलिंग युद्ध की विभीषिका से उपजे आत्मचिन्तन से किस …

सबद विशेष : कुंवर और अपूर्व नारायण

Image
यह अपूर्व अंकन

हिन्दी के किसी महत्वपूर्ण कवि की कविताओं का ऐसा द्वैभाषिक चयन पहली बार पुस्तकाकार सामने आया है। यह गौर तलब है कि अंग्रेजी, जिसके माध्यम से विश्व-साहित्य, फिर चाहे वह किसी भी भाषा में क्यों न रचा गया हो, दुनिया भर के साहित्य-प्रेमियों को सुलभ होता रहा है। हिन्दी ने अपने खैरख्वाहों के अहमन्न्य दावों के बावजूद यह दुर्भाग्य ही अर्जित किया है कि उसके हिस्से विश्व-पटल पर ऐसी सहज-उपलब्धता न आने पाए। बहरहाल, इस दुर्भाग्य पर मर्सिया पढ़ने से बेहतर है फिलहाल अपूर्व के इस अपूर्व अंकन की चर्चा की जाए।

अपूर्व नारायण, जो इन १०० कविताओं के अनुवादक और चयनकर्ता भी हैं, ने ''नो अदर वर्ल्ड'' नाम के इस चयन के लिए उन कविताओं को छोड़ने का लोभ-संवरण किया है जिससे कुंवरजी की हिन्दी में परिचित कवि-छवि गढ़ी गई है। ''आत्मजयी'' और ''वाजश्रवा के बहाने'' सरीखे उनकी कीर्ति का आधार माने जाने वाले प्रबंध-काव्य तक को इसमें शामिल नहीं किया गया है। इससे पहले जो प्रातिनिधिक चयन आए वे निश्चय ही इतने सावधान नहीं थे। इस प्रकार से कविताओं का चयन करते हुए अपूर्व ने …

कवि की संगत कविता के साथ : 3 : असद जैदी

Image
( यह स्वाभाविक ही था कि एक अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक और पारदर्शी माध्यम में जब कविता के साथ वहशियाना सुलूक किया गया, इसके लिए व्यापक चिंता प्रकट की गई। इससे और किसी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए या नहीं, माध्यम -- जिसे हम-आप ब्लॉग कहते हैं -- ज़रूर दूषित हुआ। इसके आदी और इसके लिए फिक्रमंद लोगों ने फिर भी रचनाशीलता को ही महत्वपूर्ण जाना, उन अनर्गल प्रलापों को नहीं जिससे यह दूषण प्रायोजित हुआ। यही वजह है कि असद जैदीने लाखों के बोल सहने के बावजूद अपनी नई कविताएं हमें भेजी। हमारे आग्रह पर वक्तव्य भी लिखा। हम ''कवि की संगत कविता के साथ'' शीर्षक इस स्तम्भ की तीसरी प्रस्तुति में उनकी एक पुरानी पर सर्वथा प्रासंगिक कविता, ''संस्कार'' भी दे रहे हैं। इस कविता की कभी कवि मंगलेश डबराल ने बहुत सटीक व्यख्या की थी। हम यहाँ उसका संपादित अंश दे रहे हैं। मंगलेश जी ने अपने अनुभव-सत्य को हमें कविता के पक्ष में इस्तेमाल करने की इजाज़त दी। हम उनके शुक्रगुजार हैं। उम्मीद है यह प्रस्तुति उस धुंध को कुछ हद तक छांटने में कारगर साबित होगी जो दृश्य पर बेजा फैलती गई है। )

आत्मकथ्य

कवित…

स्वगत : व्योमेश शुक्ल

Image
( व्योमेशशुक्लने यह वक्तव्य १३ जुलाई को पांचवें अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कारग्रहण करने के अवसर पर दिया है। यह एक अवसरानुकूल दिया जाने वाला वक्तव्य न होकर कई मायनों में इधर की युवा रचनाशीलता और उस पर पड़नेवाले अनेकानेक परिवेशगत दबावों और चुनौतियों का सैद्धांतिक विवेचन है। उम्मीद है यह उस रचनाशीलता का संबल बनेगा जिसके हम हिमायती और रहबर हैं। व्योमेश ने सबद को पहलेपहल यह वक्तव्य छापने दिया, उनका आभार। वक्तव्य आंशिक संपादनों से गुजरा है। एक बार पुनः हम व्योमेश को उनकी इस आरंभिक पर महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बधाई देते हैं।)

इस दौर में स्मृति और अनुभव की सर्वाधिक क्षति हुई है

व्योमेश शुक्ल

मैं जनता हूँ कि यह मेरी ज़िन्दगी का एक बेहद ज़रूरी मौका है, जो थोड़े से आगामी समय में संपन्न होकर मेरी स्मृति में बार-बार और आपकी स्मृति में कभी-कभी इसी शक्ल में, कभी शक्ल बदलकर लौटा करेगा। लेकिन इस अवसर पर कुछ पुराने सवाल, कुछ आदिम संशय फिर से मेरे सामने हैं ; मसलन मैं कौन हूँ -- यह सवाल सुदूर बचपन से मेरा पीछा कर रहा है ; और भी ऐसे कई सवाल हैं -- मसलन कविता क्या होती है, कोई कविता क्यों लिखता है, हम जिस समय और स…

हाशिया...

ज़रूरी नहीं कि हर बार मूर्खताएं हास्यास्पद और इसलिए उपेक्षणीय भी हों। असद जैदी जैसे कवि और उनकी कविताओं के साथ किया जा रहा सलूक दरअसल एक शरारतपूर्ण सोच और वयस्क मूर्खता की उपज है, इसलिए इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। इतना स्पष्ट है कि उनकी कविता को समझने-बूझने की सलाहियत ऐसे लोगों में न के बराबर है जो खुद को अन्यथा कविता-प्रेमी और प्रथमतः साम्प्रदायिकता का विरोधी भी मानते हैं। उनके ऐसे दावों की पोल तभी खुल जाती है जब वे कविता और कवि के प्रति अपने उदगार प्रकट कर रहे होते हैं। दूसरे, सारे हो-हल्ले में कविता में ज़ज्ब उस तकलीफ को अनसुना कर दिया गया जिसकी ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था। १८५७ वाली कविता का हवाला देकर बारहा कहा गया है कि इसमें हमारे पूज्य साहित्यकारों को कटघरे में खड़ा किया गया है ( मैं अब भी नहीं कहूँगा कि गरियाया गया है ! )। हिन्दी का हर सजग पाठक जानता है कि उसके विकास में इन साहित्यकारों का कितना बडा योग है। लेकिन जहाँ ये वेध्य हैं, वहाँ इनकी व्याज स्तुति क्यों कर ? आप उस प्रधानमन्त्री के बारे में एक लम्हा सोचिए, '' जो आज़ादी की हर लड़ाई पर/ शर्म…

सेवेंटीएमएम : 2

Image
संसद और सिनेमा
विनोद अनुपमसिनेमा और संसद में कोई सीधा सरोकार नहीं रहने के बावजूद दोनों के स्वभाव में आश्चर्यजनक समानता देखी जा सकती है। आजादी के बाद शुरूआती दौर में जब संसद अपनी जनता के प्रति जवाबदेह थी, तो सिनेमा भी उसी तेवर के साथ सामने आ रहा था। एक तरफ संसद में नेहरू और पटेल थे तो दूसरी तरफ राजकपूर और वी. शांताराम। दोनों के समानुपातिक तेवर पर गौर इसी से किया जा सकता है कि बाद के दिनों में जैसे-जैसे संसद ने जन सरोकारों से अपना मुंह फेरना शुरू किया, सिनेमा भी आम जनता से दूर होती चली गई। अब दोनों के इस समानुपातिक संबंध का विश्लेषण तो अपनी जगह है , लेकिन दोनों के संबंधों में जो घालमेल हुआ वह शायद इस संबंध की नियति थी।

गौरतलब है कि जब तक दोनों जनता के प्रति जवाबदेह रहे, अपनी-अपनी पहचान के साथ संतुष्ट ही नहीं, बल्कि उसकी बेहतरी में भी जुटे रहे। लेकिन जैसे-जैसे संसद और सिनेमा जनता से दूर होते गए उनकी आपसी निकटता बढ़ती चली गई। आज हिन्दी सिनेमा में ऐसे कलाकारों को ढूँढना मुश्किल है जो सांसद, भूतपूर्व सांसद या फिर संसद के भावी उम्मीदवार के रूप में नहीं गिने जा सकते। उसी तरह ऐसे सांसद ढूँढना कठ…

कला का आलोक : 2 : हकु शाह

Image
( पिछले पन्नों में आपने कला का आलोक स्तंभ के तहत चित्रकार हकु शाहसे पीयूष दईयाकी बातचीत पर आधारित गद्य पढ़ा है। पेश है उसकी एक और कड़ी। कहना न होगा कि हकु शाह ने यहाँ एक मामूली स्त्री के गैरमामूली कला-उद्यम पर जो कहा है वह साधारण की महिमा की प्रतिष्ठा के अलावा दूसरों के कला-कर्म में विनम्र पैठ और उसके महत्व-स्थापन की ओर स्वयं उनके और प्रकारांतर से पीयूष के उद्यम का भी अप्रतिम नमूना है। ऊपर हकु शाह की एक चित्रकृति लगी है। )

धूळि

सन् 1964 के आसपास जब मेरा बच्चा--पार्थिव--बहुत छोटा था तब एक औरत खिलौनों की एक टोकरी अपने सिर पर उठाए उन्हें बेचने अहमदाबाद की गलियों में घूमती थी। हमारे घर आती थी। वह मिट्टी और काग़ज़ से बनी डुगडुगी को बजाते हुए आती थी। सभी पहचान जाते थे कि खिलौना बेचने वाली आई है। उसके खिलौनों में घंटी , घोड़ा , पालना , खटिया , हाथी वग़ैरह मुख्य होते थे जिन्हें वह मिट्टी से बनाती थी और सफे़द चूने या मिट्टी में भिगो कर फिर हल्के बैंगनी व लाल ,नीले व पीले जैसे कच्चे रंगों से उन्हें अलंकृत करती थी। वह जब अपने उजले खिलौने लेकर आती थी तब लोग इन खिलौनों को पांच-दस पैसे में या चपाती के ब…

अनकहा कुछ : 2 : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

Image
( यह प्रभात रंजन के स्तंभ की दूसरी प्रस्तुति है।शुरुआत उन्होंने ने शेक्सपिअर से की थी। हेमिंग्वे पर उनका लिखना हालाँकि अवसरानुकूल है, यह तथ्य है कि हम हेमिंग्वे जैसे लेखकों के होने-लिखने-बीतने के बावजूद हमारी स्मृति और समय में उसके संग-साथ के बारे में हर पल कुछ-न-कुछ जानने -महसूसने की कोशिश करते हैं। प्रभात की कोशिश में हमारा साझा यहाँ इसी तरह से है। )

मिस्टर परफेक्शनिस्ट : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

प्रभात रंजन

जुलाई का महीना विश्व के दो महान लेखकों के जन्म का महीना है -- फ्रांज काफ्का और अर्नेस्ट हेमिंग्वे। हेमिंग्वे के जीवन के संदर्भ में जुलाई का विशेष महत्त्व है। 21 जुलाई को जन्मे हेमिंग्वे ने इसी महीने की 2 तारीख को आत्महत्या कर ली थी। प्रसंगवश, काफ्का का जन्म 3 जुलाई को हुआ था। दोनों लेखकों में एक समानता और ढूँढी जा सकती है। वह यह कि बीसवीं शताब्दी के साहित्य पर इनका युगांतकारी प्रभाव पड़ा। हेमिंग्वे ने लिखा है कि जीवन के बारे में लिखने से पहले आपको उसे जीना अवश्य चाहिए। यही कारण है उनका लेखन और जीवन दोनों विविधतापूर्ण रहा।

1917 में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ाई में उन्होंने क…

एक ज़रूरी कविता : एमानुएल ओर्तीज़

Image
( कम ही सही, हमारे कला-अनुभव में ऐसे दुर्लभ क्षण आते हैं जब कोई कलाकृति हमारे आस्वाद के ढंग को ही नहीं, विचार-क्षमता और मूल्य-निर्णय के विवेक को भी गहरे प्रभावित करती है। यह ज़्यादा कहना होगा कि वह इन्हें आमूल बदल भी देती है, लेकिन उसका कुल असर हम पर इतना ज़रूर छूटता है कि हम सामने के समय और यथार्थ को उसकी जटिलता और समग्रता में देखने-समझने के हामी हो जाते हैं। ऐसा करने के लिए वह कुछ कमतर कला होना भी शायद खुशी-खुशी मंज़ूर कर लेती है और भाषा और शिल्प की बहुधा अनुलंघ्य चौहद्दी के परे बड़ी सहजता से चली जाती है। कला के इस ज़ोखिम से पेंटिंग में एक दफा पिकासोके हाथों गुएर्निका संभव हुई थी, कविता में ऐसी ही कृति एमानुएलओर्तीज़ ने संभव की। गुएर्निका की प्रतिकृति ऊपर है, ओर्तीज़ की कविता आगे। इस कविता का प्रशंसनीय हिन्दी अनुवाद हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ कवि असद जैदी ने किया जिसे पहल ने कोई साल भर पहले छापा था। यह कविता सबद पर आए, ऐसा मंगलेशजी चाहते थे। इस बाबत असदजी से आग्रह करने पर इस लंबी कविता की पीडीएफ़ फाइल मिल गई। ज्ञानरंजनजी से हमने इसे पुनर्प्रकाशित करने की इजाज़त मांगी जो उन्होंने हमें खुशी-…

बधाई : व्योमेश

Image
( पुरस्कार यों तो हर बार विवाद का विषय बन जाते हैं, युवा कविओं को मिलनेवाला,''अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार'' जब इस बार बनारस के व्योमेश शुक्लको देने की घोषणा हुई तो प्रायः सबने इस निर्णय को खुले मन से सराहा। व्योमेश जैसे कविओं के साथ हिन्दी कविता एक जटिल और लगातार अजनबी होते समय को बहुत संवेदनशीलता से ज़ज्ब और व्यक्त कर रही है। हमारे आग्रह पर उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं भेजी। हम उनके आभारी हैं और उनके सुदीर्घ कृति जीवन की कामना करते हैं। )

यह भी संभव
मैं आठ से ग्यारह साल का था और मेरी शादी नहीं हुई थी चिढ़ाने और डराने के लिए बाइस साल का बदनाम हट्टाकट्टा श्याम सुंदर सामने आकर गाने लगता था--''जिसकी बीबी मोटी उसका भी बड़ा नाम है'' मैं मोटा नहीं था अम्मा स्वस्थ थीं यानी इस कूटभाषा में बीबी का मतलब माँ था
मुझे सुनाने के लिए बार बार इसे तब गाया गया
धुनों और उपमाओं का इस्तेमाल इस तरह भी संभव है
****
आर्केस्ट्रा
पतली गली है लोहे का सामान बनता है बनाने वाले दृढ़ ताली निश्चित लय में ठोंकते हैं हथौड़ी की उंगली लोहे का ताल धड़कनों की तरह आदत है समय को यह समय का संगीत ह…