Tuesday, June 17, 2008

कवि की संगत कविता के साथ : चंद्रकांत देवताले

( अपनी कविता में एक जगह चंद्रकांत देवताले ने कहा है,'' आग हर चीज़ में बताई गई थी / पानी-पत्थर-अन्न / और घोड़ों तक में / अग्नि का वास बताया गया था / मनुष्यों में तो आग होती ही और होनी ही थी / पर आज आग का पता नहीं चल रहा है / जीवित आत्माएं बुझी हुई राख या भूसे की तरह नाटक देख रही हैं ''। उनके भीतर की आग और गुस्सा ७३ की वय में भी कमा-थमा नहीं है। उन्होंने इधर फिर दुहराया है,''मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा / कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा / और मैंने उन लोगों पर यकीन नहीं किया / जो घृणित युद्ध में शामिल हैं / और सुभाषितों से रौंद रहे हैं / अजन्मी और नन्हीं खुशियों को''। यूं तो हिन्दी की गुस्सैल कविता और बड़े बोल बोलने वाले कवियों की एक लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है, पर देवताले और उनकी कविता इन सबसे इसलिए भिन्न है क्योंकि वहाँ यह गुस्सा अनर्जित या बलात, किसी नाटकीय मुद्रा के बतौर नहीं आया है। दूसरी बात यह कि अकविता के प्रभाव में लेखन की शुरुआत करने के बावजूद उनकी कविताओं का भूगोल क्रमशः विस्तृत होता गया है और वह वहाँ तक पहुँच सकी है जहाँ तकलीफ/ गुस्से को एक सार्थक काव्य मर्म मिलता है। परिवार और प्रेम के परिसर में उसकी उपस्थिति, ''माँ पर नहीं लिख सकता कविता'' या ''स्त्री के साथ'' जैसी क्लैसिक कविता के रूप में दर्ज है। उनके पास आग के बारे में अभी कुछ और कहने को है। यह हमने तब जाना जब सबद के लिए उनसे नई कविताओं के साथ आत्मकथ्य भी लिख भेजने का आग्रह किया। हमें प्रसन्नता है कि उन्होंने नए माध्यम के पाठकों का सम्मान करते हुए हमारे लिए यह लिखना-भेजना मंज़ूर किया। हम कवि की संगत कविता के साथ नामक यह स्तंभ उन्हीं की रचनाओं से शुरू कर रहे हैं। )

आत्मकथ्य

एक लम्बी चीख की तरह...

यहाँ डाकुओं के मरणोत्तर स्मारक /हत्यारों के जीते जी अभिनंदन /पाखण्ड का रंगीन उत्सव /और भूख बेबसी के बारे में / धूर्त चेहरों के बेशर्म उदगार /...फिर भी यहाँ बुद्धिजीवी खोपडियों में /अक्सर चलती धुंधली अटकलबाज़ियाँ /कला की खोपड़ी में तैरती ठंडी आज़ादी /कि पता नहीं कैसी गूंगी परछाइयाँ /डरते-घबराते-शरमाते हैं /चीख से - चीखने से - चीखते रहने से / शायद आड़े आ जाती है /बटन टूट जाने के भय की भद्रता....
लगभग दो दशक पूर्व लिखी कविता,''गुंटर ग्रास को पत्र'' की ये पंक्तियाँ आज देश-दुर्दशा की और भयावह स्थितियों में धंस गई हैं। करोड़ों लोगों की तकलीफ और धरती के घावों से विमुख होकर कोई भी संवेदनशील कवि भाषा के ज़खीरे में हाथ नहीं डाल सकता। मुल्कव्यापी अन्याय - पाखण्ड, झूठ और फरेबों भरा सत्ता पर काबिजों का आचरण इस समय के लेखक की सबसे बड़ी चिंता होगी। जनता को इस तरह गुमराह किया जा रहा है दसों दिशाओं से कि लगता है यह जनता विहीन जनतंत्र है। आतंक बाहर-भीतर और इतनी असुरक्षा-दहशतगर्दी। प्रतिरोध और मुकाबला करने के लिए राजनीति और विश्व-पूँजी के बाज़ार में मुश्किल से जगह। रफ़्तार में साँस भर वक्त और भाषा भी निढाल होती हुई। चुनौती भरा बुलडोज़र समय। जो देवतुल्य आकाशगंगावासी होंगे, वे ही कहेंगे इसे अखबारी यथार्थ। अब लेखक-कवि उस जगह हैं तो भीतर तक देखते हैं। अपनी-अपनी बेचैनी और अनुभव-भाषा सम्पदा के बूते उनकी आवाज़ सिर उठाती है। निजी और सार्वजनिक में फांक नहीं बचती।

जब सौ जासूस मरते होंगे, एक कवि पैदा होता है। मेरे जैसे के भीतर तो कविता का कारखाना कभी बंद नहीं होता। न अवकाश, न हड़ताल। मैं पूरे वक्त का कवि हूँ। संकोची इसे बड़बोलापन समझेंगे तो मुझे कोई आपत्ति न होगी। इसका यह मतलब नहीं है कि कविताओं का ढेर लगता हूँ। उत्पाद वाला कारखाना नहीं यह। कविताएं बेहद उधेड़बुन और हड़बड़ी में आती हैं। कविता लिखते हुए मैं घिरा हुआ महसूस करता हूँ। उस मुसाफिर कि तरह जो यादों, सपनों और अपने यथार्थ के ज़ख्मों का असबाब लिए प्लैटफॉर्म छोड़ चुकी ट्रेन पकड़ने दौड़ता है और जैसे-तैसे सवार हो जाता है।

सबकुछ को बार-बार कहना, जबकि उजागर है वह चिथड़ा-चिथड़ा होकर चमकते हुए इस महोत्सव में, अजीब लगता है। जैसे अपने जीवनानुभवों की नदी को कविता की नाव में लाद कर ले जाना कठिन है, वैसे ही है यह। पर यह भी लेखक की नियति है। निस्सहाय गवाही देते ख़ुद को भी गुनाहगार की तरह देखता हूँ। सुनता हूँ अपने को उत्सवों-गुणगान-कीर्तन के बोगदे में एक लम्बी चीख की तरह...

दो कविताएं

आग

पैदा हुआ जिस आग से
खा जाएगी एक दिन वही मुझको
आग का स्वाद ही तो
कविता, प्रेम, जीवन-संघर्ष समूचा
और मृत्यु का प्रवेश द्वार भी जिस पर लिखा -
''मना है रोते हुए प्रवेश करना''

मैं एक साथ चाकू और फूल आग का
आग की रौशनी और गंध में
चमकता-महकता- विहँसता हुआ

याद हैं मुझे कई पुरखे हमारे
जो ताज़िन्दगी बन कर रहे
सुलगती उम्मीदों के प्रवक्ता
मौजूद हैं वे आज भी
कविताओं के थपेड़ों में
आग के स्मारकों की तरह

इन पर लुढ़कता लपटों का पसीना
फेंकता रहता है सवालों की चिंगारियाँ
ज़िन्दा लोगों की तरफ़

तुम्हारी आँखें

ज्वार से लबालब समुद्र जैसी तुम्हारी आँखें
मुझे देख रही हैं
और जैसे झील में टपकती है ओस की बूँदें
तुम्हारे चेहरे की परछाई मुझमें प्रतिक्षण

और यह सिलसिला थमता ही नहीं

न तो दिन खत्म होता है न रात
होंठों पर चमकती रहती है बिजली
पर बारिश शुरू नहीं होती

मेरी नींद में सूर्य - चंद्रमा जैसी परिक्रमा करती
तुम्हारी आँखें
मेरी देह को कभी कन्दरा, कभी तहखाना, कभी संग्रहालय
तो कभी धूप-चाँदनी की हवाओं में उड़ती
पारदर्शी नाव बना देती है

मेरे सपने पहले उतरते हैं तुम्हारी आंखों में
और मैं अपने होने की असह्यता से दबा
उन्हें देख पाता हूँ जागने के बाद

मरुथल के कानों में नदियाँ फुसफुसाती हैं
और समुद्र के थपेड़ों में
झाग हो जाती है मरुथल की आत्मा

पृथ्वी के उस तरफ़ से एकटक देखती तुम्हारी आँखें
मेरे साथ कुछ ऐसे ही करिश्मे करती हैं
कभी-कभी चमकती हैं तलवार की तरह मेरे भीतर
और मेरी यादाश्त के सफों में दबे असंख्य मोरपंख
उदास हवाओं के सन्नाटे में
फडफडाते परिंदों की तरह छा जाते हैं
उस आसमान पर जो सिर्फ़ मेरा है

17 comments:

Geet Chaturvedi said...

वाह. आज का दिन बना दिया.

katyayani said...

Devtale Ji ki AAG ki laptoon ne aaj k thande din ko garmi di...
Aanand aa gaya............

sanjay patel said...

रघुवीर सहाय,मुक्तिबोध और शमशेर के बाद का जो समय है उसमें आदरणीय चंद्रकांत देवताले को पढ़ना कविता के नये रूपकों से रूबरू होना है.आपको साधुवाद इन शब्द चित्रों का स्पर्श देने के लिये अनुराग भाई.

योगेंद्र कृष्णा said...

स्तंभ की शानदार शुरुआत के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं।

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

devatale jee ne hmesha kee trh mrm ko chhuva.

Asad said...

Dear Anurag,

Devtale ji ka vaktavya aur kavitaen parhkar khushi hui, par parichayatmak tippani men apne do aise vakya likhe hain jinka koi auchitya ya mauqa mujhe nazar nahin aya ("यूं तो हिन्दी की गुस्सैल कविता और बड़े बोल बोलने वाले कवियों की एक लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है, पर देवताले और उनकी कविता इन सबसे इसलिए भिन्न है क्योंकि वहाँ वह अनर्जित या बलात, किसी नाटकीय मुद्रा के बतौर नहीं आया है। दूसरी बात यह कि अकविता के प्रभाव में लेखन की शुरुआत करने के बावजूद उनकी कविताओं का भूगोल क्रमशः विस्तृत होता गया है और वह वहाँ तक पहुँच सकी है जहाँ तकलीफ/ गुस्से को एक सार्थक काव्य मर्म मिलता है।") Devtale ji ka mahatv aur unke kam ki sarthakta apni dalil khud hai; use rekhankit karne ke liye "ghussail aur barbole" kaviyon ki peshi karvana muqadme ko kamzor karna hai! Akavita vali bat bhi kuchh thik hai aur kuchh ghalat: samkalin kavita aur kavyabodh ke vikas men akavita ki aitihasik bhumika rahi hai, par ham log kabhi akavita ko lekar "ritual condemnation" ki had se bahar nahin nikalte.

गिरिराज किराडू/Giriraj Kiradoo said...

प्रिय अनुराग,

असद (मेरे ख्याल से ज़ैदी) की बात से एक दो नुक्ते और भी निकलते हैं. एक, लगभग हर किसी का महत्व जताने के लिए हमें उसके बरक्स एक पूरी परम्परा/प्रवृति,या दौर, यहाँ तक कि एक पूरे आन्दोलन/पर्यावरण, जो बाज दफ़ा आधुनिकता या प्रगतिशीलता या छायावाद या रूपवाद जितना विस्तृत और असमावेशी होता है, को एक ब्लर्ब या एक पूर्व-टिपण्णी या एक 'समीक्षा' में ध्वस्त (मैं १९९२ ने जिसे एक सर्वथा भिन्न संकेतक बना दिया, उसी ध्वनि ध्वस्त को यहाँ लाने की कोशिश कर रहा हूँ) करना होता है. यह महत्व-पूर्णता के अश्वमेध की अनिवार्य हिंसा/क्षति है.

दूसरा नुक्ता हिन्दी में संपादकीय पूर्व-टिप्पणियों के गद्य का मिजाज़ है. ख़ुद इससे, आजकल, रोज़ दो-चार हो रहा हूँ.

उम्मीद है आग के आख्यान को सिर्फ़ एक अभिव्यक्ति 'विहँसता' ने जिस पढत के लिए खोल दिया है, उस तरफ़ भी निग़ाह जायेगी.

असद जैसे टिप्पणीकार तुम्हारी पत्रिका तक आते रहें.

prabhatranjan said...

aapne jaane anjane akavita ka prasang devtaleji ke sandarbh me uthaya hai.chaliye isi bahane akavita ki yaad to aayi. asdji ne akavita ke aitihasik sandarbh ki baat bahut sahi uthayi hai. mai unse puri tarah sahmat hoon.aakhir srikant verma jaise kavi bhi usise nikalkar aaye. vichardhara ke shor me akavita ko bhool hi gaye.
devtaleji ki kaviton ke liye badhai. prabhat

ravindra said...

हिंदी कविता में तकलीफ और गुस्से को सार्थक काव्य मर्म कहां नहीं मिला है? आपकी टिप्पणी आपका नुकसान उतना नहीं करती जितना समकालीन हिंदी कविता का। पूरी हिंदी कविता तकलीफ, गुस्से की कविता है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, असदजी ने आपकी इस टिप्पणी पर सवाल किए हैं उनकी ही कविताअों पर गौर फरमाएंगे तो जान जाएंगे कि वहां किस कदर घना गुस्सा और तकलीफ है। चंद्रकांत देवतालेजी की कविता के बहाने आपकी टिप्पणी तो समकालीन हिंदी कविता के साथ ज्यादती है।
रवींद्र व्यास, इंदौर

Ashok Pande said...

एक प्रिय कवि को यहां प्रस्तुत करने का आभार भाई अनुराग.

अकविता को लेकर जिस 'रिचुअल कन्डैम्नेशन' की हद बांध दिये जा चुकने की बात असद जी करते हैं, उस से मुझे पूरा इत्तेफ़ाक़ है.

Tushar Dhawal Singh said...

ek kavi jo apne parivesh ko uske simte sandarbh aur uske vyapak judao ko shiddat se samajhta hai aur jo uske vartman swaroop se na khush hai, zahir hai usme gussa aur bechaini hogi hi. yahi bechaini jab pighale lave ki trah behti hai to apne aantarik uthan mein ek lay aur ek aaweg ke saath bahti hai. kabhi usme ek rhetoric paida ho jata hai to kabhi aisi abhivyakti jo disturb karti rahti hai. yah kavi karm ka sahaj prawah hota hai. jab aisi rachnayen samne aati hain to prayah ek faishion ke tahat uski nakal meim aur bhi rachnayen samne aati hain jinki apni ek lambi fehrist hoti hai. mere khayal mein anurag ki tippani akavita ya kisi kavya andolan ki 'ritual condemnation' nahi ho kar us faishon ke tahat apni goti chamkane ki jugat mein lage 'lesser mortals' par tippani thi. ab Devtale ji ki inhi kavitaon par gaur karen to payenge ki kaise ek rachna apne mool roop mein ek sahaj prawah mein mukammal hoti hai. kahin bhi kisi bhi tarah ke prayas ka koi bhi indication' nahi hai. sab sahaj hai. chahe lekhan ho ya uska pathan. meri nazar mein yahi kavita ki sarthakta bhi hai. zaroorat hai ki apne parhe aur gune ko atmsaat kar apni anubhootiyon mein dhal jaane den aur jab yah ghol kabhi kisi weg par sawar ho kar umade to isey apna aakar khud tay kar lene den. Asad Ji ki kavitaon mein bhi aisa prawah mujhe aksar nazar aata hai. hamen jabran kavita likhne se bachna chahiye. mudda shayad yahi tha magar bahas chid gayi. lekin yah bara shubh sanket hai ki aisi bahas chid rahi hai. is se sahitya ka kosh aur bi vrihat hoga. Asad Ji, Giriraj Ji , Prabhat Ji aap logon se hamen kaafi ummeed hai. aap sabon ka yahan hona pau fatne sa hai. bahut bahut badhayee.
Tushar Dhawal

Rajeev Ranjan said...

dear anurag..
devtale jee ki behtrin kavitayen aapke jariye padhane ko mili... dhanywad...
aur behatrin prastuti ke liye badhai....
rajeev ranjan giri

Pooja said...

devtale ji ki kvitaon ko padhna adbhut ...anurag ji bahut bdhai aapko..

kahana hai kuch aur said...

kya baat hai, devatleji ko padna, baar-baar padna aur har baar naya anubhav jeena. bahut acha laga phir padkar, thanks Anurag

Anonymous said...

he is one of the most prominent voices of our poetry.

leena malhotra said...

unki kavitayen bemisal hain.. devtale ji ko padhna sukhad hai..

Kanchan Lata Jaiswal said...

बेहतरीन कविताएं.....