Monday, June 30, 2008

कोठार से बीज : 2 : त्रिलोचन

( यह दुखद है कि हमें अपने दिवंगत मूर्धन्य जयंतियों पर याद आते हैं । यों तो हम डग-डग पर उनकी उन्हीं चंद बातों को कोट करते हुए बखूबी, 'यशवर्धन बज़रिये नाम-जाप' की परम्परा को पुष्ट करने की अपनी निर्ल्लज कोशिशों में लगे रहते हैं, हमने कभी यह परवाह नहीं की कि उनका लिखा कहाँ और किस हालत में है। ' कोठार से बीज' नामक स्तंभ की शुरुआत शमशेर के गद्य से की थी। कहना न होगा कि उनकी वह गद्य पुस्तक एक बार छप कर प्रकाशकों के लिए कम से कम किसी मसरफ का न रही। शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन सरीखे ऐसे कई कवि-लेखक हैं जिनकी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों को पाठकों की आगामी पीढ़ियों के लिए सच पूछिए तो जमींदोज किया जा रहा है। इस बार, ''कोठार से बीज'' में त्रिलोचन जी की ऐसी दो लुप्तप्राय पुस्तकों से ही कुछ शब्द। पहली पुस्तक, ''अरघान ''नामक कविता संग्रह है जिसे यात्री प्रकाशन ने १९९४ में छापा था। कविता उसी से ली गई है। दूसरी पुस्तक त्रिलोचन जी की १९५० में लिखी गई डायरी है जिसे बहुत बाद में इलाहाबाद से किसी साहित्यवाणी नाम के प्रकाशक ने ,''रोजनामचा'' नाम से छापा था। इनका क्या महत्व है, ये आप ही बतलाएंगी।)

क्या-क्या नहीं चाहिए

कल तुम्हारी प्रतीक्षा थी।

सोच बैठा, कौन जाने लहर मन में उठे और यों ही चली आओ।
बात कुछ ऐसी है कि कल अंतहीन शून्य मन में भर गया था।
नाड़ी सुस्त हो गई थी। बाहर भी भीतर का शून्य घिरा देखता था।
ऐसे में हारा मन तुम्हारी शरण जा पहुँचा। पल-भर भी मैंने यह नहीं
सोचा, मेरी जैसी दशा तुम्हारी भी हो सकती है। खुशियों की लहरें आ
जाती हैं और चली जाती हैं और हम पड़े रह जाते हैं।

आज ज़रा चिंता के समुद्र से सर बाहर निकला है और तुम्हें देख
कर आवाज़ जो हृदय से उठी उसे अक्षरों में रख रहा हूँ। तुम्हें भी ज्ञात
हो जाए कि मैं सदा-सर्वदा प्रसन्न नहीं रहता और यह जान सको कि
तुमने एक जीवित हृदय का स्पर्श किया है, ऐसे हृदय का जो देश काल के
प्रभाव लेता है, बिल्कुल जड़ नहीं है। मेरे इस हृदय को अच्छी तरह जान लो
और फिर जैसा तुम्हें जान पड़े वैसा करो।

प्यार, घृणा, उदासीनता, सहानुभूति ....मुझे क्या-क्या नहीं चाहिए ।

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रोज़नामचे में एक रोज़

पौने पाँच पर जगा। नामवर, केदार के साथ गोविन्द लौज से गंगा की ओर गया। राजदेव सिंह का अंडरवियर नामवर को नहाने के लिए लिया। स्नान हुआ। बालेश्वर और तुलसी नारायण सिंह के साथ लगभग आधी गंगा तैरा। वास पर आसन और व्यायाम किया। नामवर ने भी व्यायाम किया। यहाँ से वे लोग उदयप्रताप कॉलेज के लिए चले। उन्हें शम्भुनाथ के यहाँ भी रुकना था। मैंने विद्यापीठ पर नौ पर पहुँचने की बात दी। ठीक समय पर पहुँचा। शरबत पिया। साहित्य पर बात। शम्भुनाथ की पत्नी थीं। नामवर ने किवाड़ बंद किया। शायद मैं ही एक मात्र वह जन था जिससे इस सुरक्षा की आवश्यकता थी। बातों में शम्भुनाथ को परदा पसंद नहीं। फिर उनकी पत्नी को ही शायद पसंद हो। उनकी पसंद इस बात से होती है कि बिना बुर्का ओढे, ओहार डाले एक बार साहित्य सहकार के द्वारदेश तक गई थीं और शहर में यह आना-जाना होता ही रहता है। मगर सुरक्षा का यह दिखावा हमारी दुमुही सभ्यता है।

केदार और नामवर के साथ स्टेशन के दूसरी ओर पुल से होकर साइकिल लिए पैदल गया। एक्का करके नामवर केदार चले। उन दोनों में मज़ाक होता रहा। ग्यारह पर प्राचीन छात्र भवन। सत्तू मांग कर खाया गया। आम की चटनी। दिन में नामवर सोए। केदार छः में गए और मैंने धर्मवीर भरती का प्रगतिवाद, हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्य के साथी देखा। दोनों पुस्तकों को संतोषजनक पाया। कॉलरिज की बायोग्रैफिया लिटरेरिया देखी। लेने का निश्चय किया। चार बजे नामवर को प्रभु जी कार पर ले गए। कहा था, नामवर सिंह आप बड़े आदमी हो गए हैं क्या। मुझ से कहा, आप प्रकृति का आनंद उठाइए। यह अहमक लड़का, बेसाख्ता बदतमीज़। चार बजे जय से मिला। उसे डेढ़ रुपये मैंने, आठ आना केदार ने दिया।

शाम को केदार, रामकिशोर और नामवर के साथ,''समाधी'' का दूसरा खेल देखा। बहुत अच्छा नहीं लगा। नलनी जयवंत अच्छी लगी। सब प्राचीन छात्र भवन ( लौटे )। केदार ने कहा, किस खाट पर सोऊं। नामवर से कहा, आपकी छोटी है। नामवर ने कहा, छोटी तो नहीं है। दोनों सोए। डेढ़ हो गए थे। सोया। खेल में टिकट के पाँच रुपये मैंने दिए थे। रघु जी से रामेश्वर, राममूर्ति सिंह, नारी आदि पर बातें।

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8 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत आभार आपका त्रिलोचन जी की इस रचना के लिए.

Ashok Pande said...

बाबा को सतत नमन. आज आपने उनका कुछ दुर्लभ सा पढ़वा दिया. धन्यवाद.

Ratnesh said...

त्रिलोचन जी की ये रचना बहुत पसन्द आई. इतना ही नही आप ने साहित्य के समुद्र मे से मोति जो निकला है...

aalekh said...

aapki chintayen zayaj hain.trilochanji ka bahut kuch aprapya hai.unka prasidh sangrah dharti ya gulaab aur bulbul khan milta hai.jin pustakon se aapne rachnayen di hain we bhi ab shayad hi milen.unki diary men aur bhi bahut kuch darj hoga.mujhe to is bare men maloom hi nhi tha.kavita jo aapne di hai, us pr kya kahun! aur kya chahiye.shukriya.bahut-bahut.

anita said...

trilochan ji ke kavitaye mujhe behad acchi lagi...sabad me trilochan ji ko padkar muje bahut khushi hui...tumhara pyayas wakai kabil-e-tareef hai....

vishwanath suman said...

trilochaji ka ''रोजनामचा se liya gaya aansh achha laga. bahut dino ke baad kisi ne trilochnji ki sudh li. ummid hai ki aage bhi ise hi murdhanya sahityakar ki ''रोजनामचा se kuch padne ka mauka milega

ajay said...

trilochanji pr achhi samagri di hai.unhe yahan padh kar achha laga. kavita ne hriday ko chu liya. roznamche men kaisi saralta hai.

ishwar nath jha said...

ishwar nath jha
anurag ji koti koti dhanyvaad jo aap is tarah durlabh sahitykaaron, khaas kar trilochan ji ki dairy ka ham jaise saahitya premion ko darshan karaya.aap ka prayas bahut hi sarahniya hai.