Saturday, June 28, 2008

कवि की संगत कविता के साथ : 2 : गीत चतुर्वेदी


( हालाँकि अब यह बात हर दूसरे कवि के लिए कही जाती है कि उसकी कविता सबसे अलग है और बाज़ दफा इस कथन के समर्थन में आसानी से वे तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं जो कविता और कवि के मह्त्व-रेखांकन की बजाय उसमें एक हास्यास्पद नुक्ता ही जोड़ता है, गीत चतुर्वेदी और उनकी कविताओं के बारे में ऐसा दृढ़कथन इसके बावजूद किया जाना चाहिए। वह इसलिए कि संवेदना के जिस धरातल पर गीत कविता संभव करते हैं, जैसी रेंज उनके पास है ( फिर वह भाषा की हो या थीम की ), जितना उनकी कविता ने अपनी पूर्ववर्ती कविता से मेलजोल रखा है, जैसी संजीवनी वह सहोदर कलाओं से पाती रही है और जितना संयमित और सजग उसका अपना काव्य-विधान है, वह अभी लिखी जा रही युवा कविता में दुर्लभ नहीं तो इतना समर्थ ज़रूर है कि कविता को उसका मौलिक स्वर और कवि को उसकी खास पहचान दे। अकारण नहीं उन्हें युवा कविता का प्रतिष्ठित,''भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार '' मिला है। गीत ने कई बार आग्रह दुहराने के बाद अपना आत्मकथ्य लिखा। दो नई कविताएं भेजी। एक कविता,''असम्बद्ध'' हम अपनी तरफ से दे रहे हैं। सबद का इतना मान रखा उन्होंने, उनका आभार ! कवि की संगत कविता के साथ स्तंभ की यह दूसरी प्रस्तुति है। इससे पहले आप चंद्रकांत देवताले को पढ़ चुके हैं। )

*

आत्मकथ्य

ख़तरे की घंटी बादशाह के पास है

कई बार मुझे लगता है कि रचना प्रक्रिया कवि की रसोई होती है। और ज़्यादातर रसोइयों में मानक के अनुरूप स्वच्छता नहीं होती। उड़ता हुआ आटा, बिखरी हुई सब्जि़यां, किसी कोने में बह-बहकर जम गया पानी, तवे पर जलकर बिखरा पलथन, हल्दी के दाग़ और चूल्हे के पास पतीले से बाहर गिरा हुआ चावल, गर्मी, रसोइये का पसीना, अचानक आई हुई खांसी या छींक जिस समय वह अपनी तल्लीनता के कारण मुंह पर हाथ रखना भूल गया हो... रसोई से बाहर निकला खाना स्वादिष्ट, पौष्टिक और भला लगे, इससे ज़्यादा उसका कोई मक़सद नहीं होता। कविता के साथ भी ऐसा ही होता है। किसी के साथ जाने-अनजाने किया गया छल, मुस्कराकर कहा गया एक झूठ, किया और झेला गया अन्याय, कुछ अच्छी और बहुत सारी बुरी चीज़ें जो कि इस समय में एक के साथ दो मुफ़्त मिल जाती हैं... ये सब इस रसोई में पड़े होते हैं।

कविता कवि की शरणगाह होती है, उसका कन्फेशन बॉक्स होती है। कवि इस रसोई से निकलता है और कविता में आकर आत्मशुद्धि करता है। मनुष्यगत कमज़ोर‍ियों से निकलने की छटपटाहट में अपने मनुष्य होने के और क़रीब होता है। कविता आपको झुंझलाहट में एक छोटी बच्ची के गाल पर बेबात थप्पड़ मारने से नहीं रोक पाती, लेकिन जब वह रो रही होती है, तो उसके साथ बैठकर थोड़ी देर रो लेने का शऊर और शक्ति ज़रूर देती है। रुदन का वह क्षण कविता का क्षण होता है।

एदुआर्दो गैल्यानो के एक निबंध में ज़िक्र किया है, ''कुछ बच्चे शरारत करते हुए चींटियों की बांबियों में माचिस की जलती तीली फेंक रहे थे। चींटियां मर रही थीं। उन्हें नहीं पता था कि वे मौत का कितना गंदा खेल खेल रहे हैं। उनमें से एक लड़का कह रहा था कि देखो, जब ये चींटियां मरती हैं, तो एक-दूसरे पर लद जाती हैं, जैसे ये बांहों में बांहें डालकर मर रही हों। देखो, ये मरते समय दोस्ती कर लेती हैं।' बच्चे तीली फेंकना छोड़कर मरी हुई चींटियों की दोस्ती देखने लगते हैं और उन्हें जलाना छोड़ एक-दूसरे का हाथ पकड़कर गोल घेरा बनाकर दोस्ती का दूसरा खेल खेलने लगते हैं। जिस बच्चे ने चींटियों की हत्या और मृत्यु के बीच उनका एक साथ हो जाना, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर मित्रता के साथ मृत्यु में प्रवेश करने के दृश्य को बिंबित किया होगा, यक़ीनन वही कवि है।''

इसे
पढ़ने के बाद मुझे हमेशा लगता है कि समाज में कवि की भूमिका कमोबेश ऐसी ही होती है। वह जाने-अनजाने उन लोगों के साथ खड़ा हो जाता है। इसी समाज का हिस्सा होने के कारण वह हत्यारों के बीच भी रहता है, तो वह उन्हें इशारा करके इतना बताता है कि देखो, इस मृत्यु से थोड़ा पसीजो, इनका भावजगत तुम्हारे जैसा ही है। और उम्मीद करता है कि हत्यारे उस भावजगत को देखकर मनुष्यता के जेस्चर देंगे और पीछे हटेंगे। हमारे समय की सत्ता, शासक, अत्याचारी और हत्यारे इन बच्चों की तरह भोले नहीं हैं, इसलिए जितनी आसानी से कवि बच्चे के कहने पर बाक़ी बच्चे अपना खेल रोक देते हैं, उतनी आसानी से हमारे समय के हत्यारे नहीं। इसलिए हमारे कवि का काम ज़्यादा मुश्किल है।

तुर्की कवि आकग्यून आकोवा की एक पंक्ति है, ''कविता चींटियों की बांबी में लगी ख़तरे की घंटी है।'' मुझे रघुवीर सहाय की एक पंक्ति ठीक इसी के सामने याद आती है,'' ख़तरे की घंटी बजाने की अधिकार सिर्फ़ बादशाह के पास है।'' कविता में हम वही अधिकार वापस लेने का संघर्ष करते हैं या एक वैकल्पिक घंटी बना रहे होते हैं, जिसकी आवाज़ बादशाह की घंटी की आवाज़ से ज़्यादा साफ़ और ईमानदार हो। और ऐसे समय में, जब बादशाह मनोरंजन के लिए ख़ुद कविता करता हो, कविता को विज्ञापन फिल्मों की कैचलाइन में बदल देता हो, दर्द की एक धुन और आंसू के एक बड़े फोटो के साथ, गुडि़या छीनकर बच्चों के हाथ में बंदूक़ का खिलौना पकड़ा देता हो, कविता की भाषा में आपसे जेब ढीली करने की मनुहार करता हो, रूढि़यों, भ्रांतियों और पूर्वाग्रहो के विखंडन के बजाय परमाणु विखंडन पर ख़ज़ाना खोल देता हो, जो बच्चों को चॉकलेट न मिलने पर घर से भाग जाना सिखाता हो, मुक्ति के नाम पर स्त्री की देह को सिसकारियों से छेद देता हो, जो बीच राह रोककर पुरुष की मैली शर्ट, फटे जूते और ख़ाली बटुए का मख़ौल उड़ाता हो, और यह सब जानबूझकर, योजना बनाकर, विज्ञापनों में, कविता की भाषा में करता हो, वह समय कितना ख़तरनाक होगा, अंदाज़ा नहीं लगा सकते। जब बादशाह यह मनवा दे कि मृत्यु और तबाही दरअसल भूख, ठंड, बारिश, बाढ़, रोग, महामारी से नहीं, बल्कि एलियंस, साइबोर्ग्स, नामुराद उल्काओं और रहस्यमयी उड़नतश्तरियों से होती हैं, तो उस समय की भयावहता की कल्पना कर सकते हैं हम। अचरज है कि ये सब कविता की भाषा में भी हो रहा है।

कविता के लिए भी कठिन समय है यह। कवि के लिए उससे ज़्यादा। लगातार अविश्वसनीय होती अभिव्यक्तियों के बीच एक कवि को अपनी कविता के लिए वह भाषा खोजनी होगी, जो सबको समझ में भी आ जाए और सत्ता के प्रवचन को फ़ाश भी करे। भ्रम, लालच, चकाचौंध, ग़फ़लत, गलाज़त, लुच्चई और मक्कारी से भरे इस समय में कवि को सयाना होने से बचना होगा। उसे अपने भीतर वह बच्चा बचाए रखना होगा, जो मरती हुई चींटियों को देखकर सबको बता सके कि उनकी दोस्ती दरअसल जीवन की हक़दार है। कविता के भीतर ऐसी ही कोशिश करना चाहता हूं मैं।
*

तीन कविताएं

असम्बद्ध

कितनी ही पीडाएं हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हुबहू किसी दृश्य में नहीं बंधती

ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की ज़िम्मेदारी उस पर है
शाम झांकती है बारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है
धूप धीरे-धीरे जमा होती है
कमीज़ और पीठ के बीच की जगह में
रह-रहकर झुलसाती है

माथा चूमना
किसी की आत्मा को चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्मा के गालों को सुर्ख़ होते

दुःख के लिए हमेशा तर्क तलाशना
एक ख़राब किस्म की कठोरता है
****

फीलगुड

कोशिश करता हूँ किसी भी अभिव्यक्ति से
किसी को भी ठेस न पहुंचे

जिस पेशे में हूँ मैं
वहां किसी गुनाह की तरह
कठिन शब्दों को छाँट देता हूँ
कठिन वाक्यों को बना देता हूँ सरल
जबकि हालात दिन-ब-दिन और कठिन होते जाते
मैं समय का संपादन नहीं कर पाता

कितना खुशकिस्मत हूँ
एक जीवन में कितनी स्त्रियों का प्रेम मिला
कितने मित्रों कितने बच्चों का
प्रेम के हर पल में जन्म लेता हूँ
पल-बढ़कर प्रेम की ही किसी आदिम गुफा में
छिप जाता हूँ धीरे-धीरे मृत होता

कंधे झिड़क कहता हूँ ख़ुद से
एक जीवन और चाहिए पाया हुआ प्रेम लौटने को

घृणा
की वर्तनी में कोई ग़लती नहीं होती मुझसे
नफ़रत में नुक्ता लगाना कभी नहीं भूलता
****

काया

तुम इतनी देर तक घूरते रहे अंधेरे को
कि तुम्हारी पुतलियों का रंग काला हो गया
किताबों को ओढा इस तरह
कि शरीर कागज़ हो गया

कहते
रहे मौत आए तो इस तरह
जैसे पानी को आती है
वह बदल जाता है भाप में
आती है पेड़ को
वह दरवाज़ा बन जाता है
जैसे आती है आग को
वह राख बन जाती है

तुम
गाय का थान बन जाना
दूध बनकर बरसना
भाप बनकर चलाना बड़े-बड़े इंजन
भात पकाना
जिस रास्ते को हमेशा बंद रहने का शाप मिला
उस पर दरवाज़ा बनकर खुलना
राख से मांजना बीमार माँ की पलंग के नीचे रखे बासन

तुम
एक तीली जलाना
उसे देर तक घूरना
****

19 comments:

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

भाई, सचमुच उसकी रेंज बड़ी है.

सुभाष नीरव said...

सबद निरन्तर देखता हूँ। इसकी हर पोस्ट उम्दा होती है। गीत की कविताएं और उनका आत्मकथ्य पढ़ा। गीत नई पीढ़ी के समर्थ और संभावनाशील रचनाकार हैं। तीनों कविताएं अच्छी हैं और प्रभावित करती हैं। उनकी कविताएं कुछ देते तो और बेहतर होता।

ravindra said...

अनुरागजी, मुझे लगता है कि गीत से जाने-अनजाने एक गड़बड़ हुई है। उसका आत्मकथ्य ज्यादा अच्छा है (हो सकता है यह मेरी सीमा भी हो)। गैल्यानो का टुकड़ा इतना ताकतवर और मार्मिक है कि मैं वहां आकर कुछ देर ठिठक गया। लगभग स्तब्ध। मैंने उस टुकड़े को दो-तीन बार पढ़ा और उसने मुझे बेतरह पकड़-जकड़ लिया। अब इस टुकड़े से हासिल अनुभव के आलोक में मैंने जब गीत की कविताएं पढ़ना शुरू की तो रंगत कुछ फीकी लगीं। मैं हर बार महसूस करता हूं कि कवि को कम, कविता को ज्यादा बोलने देना चाहिए। (बात बोलेगी, हम नहीं-शमशेर)। बोलना जरूरी ही हो तो कविता के साथ न बोले, कहीं अोर बोले लेकिन शायद आपके कॉलम का कॉन्सेप्ट ही यही है (होगा) शायद।
बहरहाल।
गीत ने रघुवीर सहाय को भी याद किया है और यह पढ़ते हुए मुझे उनकी एक और कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं जिन्हें मैं अपनी कमजोर स्मृति के आधार पर ही लिख रहा हूं क्योंकि मैं अपने अॉफिस में हूं और यहां मेरे पास रघुवीर सहाय का संग्रह हंसो, हंसो जल्दी हंसो नहीं है जिसमें यह कविता है। पंक्तियां यूं हैं- वे किताबें, वे उम्मीदें न होंगी जो उसके बचपन में थी
कविता न होगी, साहस न होगा एक और ही युग होगा
जिसमें ताकत ही ताकत होगी
और चीख न होगी।
तो गीत कि इन तीनों कविताअों में मुझे ताकत ही ताकत के खिलाफ एक इन्नोसेंट बच्चे की चीख, एक अन्यायी-अत्याचारी समय की परतों के नीचे बच्चे की दबी चीख सुनाई देती है। हिंदी की बहुत सारी औसत दर्जे की युवा कविताअों के बीच आपने गीत की कविताएं और आत्मकथ्य को देकर एक बेहतर कवि को रेखांकित किया इसके लिए आपके प्रति आभार। गीत को भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार नहीं मिलता तब भी वह एक बेहतर कवि है और उसने अपनी हालिया कहानियों से यह साबित किया है कि वह कहानी के इलाके में भी पूरे दमखम से मौजूद है। उसकी कविता के लिए किसी पुरस्कार के सर्टिफिकेट्स की दरकार नहीं क्योंकि हम जानते हैं कि पुरस्कार कैसे-कैसों को, ऐसे-वैसों को मिला है। जिस समर्थ कवि ने गीत को भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिए चुना उन्हें अब तक साहित्य अकादमी नहीं मिला, लेकिन वह अपनी कविताअों की ताकत की बदौलत समकालीन हिंदी कविता में धड़कता हुआ जिंदा है। उनसे कई गुना कमतर कवियों को साहित्य अकादमी पुरस्कार हासिल हैं लेकिन अपनी अच्छी कविताअों के लिए वह किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं। रवींद्र व्यास, इंदौर

Navyavesh Navrahi said...

माथा चूमना आत्‍मा चूमने ...
असम्‍बद्ध और फीलगुड दोनों कविताएं कमाल की हैं.......
नव्‍यवेश नवराही

Tushar Dhawal Singh said...

in odhe huwe panno se shabd chitak chitak jate hain, goonjate hain awara rahon par... mai bujhi chitaon ke paas kai raat se baitha hoon aur maan pana mushkil hai ki koi khatam bhi ho sakta hai. Kavita parhte huwe mujhe kuch aisi hi anubhooti huwi.
Geet Ji ki kavitayen apratim lagin bilkul andar tak bheegi huwi. yahan kavi nahi uska samay bolta hai.
Matha Choomna kisi ki atma choomne jaisa hota hai. Kya baat hai.Aaap anant unchayion ko par karen yahi kamna hai.
Tushar Dhawal

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा पढ़कर.आभार.

aalekh said...

hamen itne achhe kavi ki kavitaon se rubaru krane ke liye dhanyawad.inki kavitayen is bure waqt ko aur bura batane se jyada bure waqt men acha manushya bane rahne ko prerit karti hain.

vandana said...

geet chaturvedi ki ye kavitayen adbhut hain.aur unka aatmkathya to ek kavi se jyada ek umda aadmi ka pata deta hai.unhen dheron shubhkamnayen!

katyayani said...

Geet Ji ne apne aatmkathya aur kavitayon ko kuch aise iss sansar mein halki si phukh maarkar uda diya,jaise hawayein rui ko ya kisi nanhe pankh ko uda deti hain....
Aur uske lehra k udne ka aanand utar aata hai hamari aankhon mein....
Geet ji kavitayein halke geeton ki tarah kanon mein dub gayin...
Kuch acche shan jindagi mein jud gaye............

pritu said...

adarniya anuragji,aap dhanayavad ke patra hai.kitni pidae..dhwani nahi..Matha chumna kisi ki aatma ko chumne jaisa ha.itni khoobsurat panktiyan man ko chhu gai.

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

der se padha geet jee, bahut marmik- kavitaen aur aatm kathya bhee.

Ratnesh said...

गीत की रसोई मे इतनी स्वादिष्ट और पौष्टिक कवितायें हैं कि एक बार स्वाद चख लेने के बाद यहाँ बार बार लौटने का मन करता है.

Arpita said...

आज बिन लिखे रहा नहीं गया सो मात्र गीत जी के आत्मकथ्य पर कुछ बातें लिख रही हूं......
१] गीत जी कवियों के रूख़ से/attitude से बैचेन लगते हैं. मुक्तिबोध के शब्दों को उधार लूं तो "साहित्य में साहित्य का जितना प्रभाव है उतना ही साहित्यकार के व्यक्...तित्व की सतह का भी." गीत जी कवि व्यक्तित्व के हल्के अंदाज़ को लेकर ख़ासे चिंतित लगते हैं....
२] कविता कवि की शरण गाह होती है, उसका कन्फेशन बाक्स होती है तो यह सही है कि हम अपने हृदय के उद्वेग को शांत करने कलम उठाते हैं पर जब वास्तव में मानवता कराहती है या कुचली जा रही होती हो तब उस भाव जगत को अनुभूत कर पाना ही सच्ची कविता होगी.
३] कविता में ईमानदारी की गूंज बसी होनी चाहिये तभी तो वो एक मशाल बन रास्ता दिखा सकती है....कोरे शब्दों की ध्वनियां कोलाहल से बढ़्कर कुछ नही..
४] कविता के विस्तार और शक्ति [सही शब्द नही है ये] को आज बाज़ार ने पहचान लिया है तभी तो इसका प्रयोग वो आमजन के बीच बेझिझक कर रहा है जिसका खतरा किसी भयंकर महायुद्ध से बढ़्कर है क्योंकि वो आत्मा को खोखला कर हमें मात्र चलता-फिरता पुर्जा बना छोड़ेगा जिसकी चिंता कवि को करना ज़रूरी है....समय के लिये प्रतिबद्ध होना ही कवि की ईमानदारी और कविता होगी....
इस आत्मकथ्य को पढ़ लगा कि कवि कर्म किस कदर दुरुह होता है जिसे लोग समझते नहीं और ये जुमला बड़ी आसानी से उछाल देते हैं कि...कविता करते हो..........

Brajesh pandey said...

behtarin prastuti Anurag bhai. Geet ji ne bda bejod atmkathya likha hai.bilkul kavita ki tarah.sachmuch bachpan ko bchae rkh pane ki jaddojahad to lgatar chalti hi rhti hai.aur ye bachaa jb tk hai tabhi tk kavita bhi hai .kavitaen behtarin hain jo mn ko chhoti hai.abhar anurag bhai apka.

वंदना शुक्ला said...

बेहतरीन कवितायेँ..!
वंदना

sarita sharma said...

गीत की कवितायेँ अपने समय को सजग दृष्टि से संबोधित करती हैं.अपनी अलग शैली बनाने से पूर्व उन्होंने देश विदेश के महान कवियों को समझा है.कविता सिर्फ प्रसिद्धि हेतु या शब्दों का खिलवाड़ नहीं बल्कि मानव की बेहतरी के लिए होनी चाहिए जिसमें मानव संवेदनाओं पर जोर दिया जाए.तीनों कवितायेँ इसी उद्देश्य को उजागर करती हैं असम्बद्ध में प्रेम और पीड़ा हो, फीलगुड में समय को सम्पादित न कर पाने की कसक हो या काया में मृत्यु के समय उदात्त भाव बनाये रखना हो.

अपर्णा मनोज said...

Sublimity is a word which can truly characterize Geets’s poetry.
Thanks Sabad for sharing this wonderful post.

विजय गौड़ said...

गीत की कविताएं पसंद आयी। वक्तव्य कविताओं से ज्यादा। बधाई। प्रस्तुतकर्ता और गीत दोनों को।

addictionofcinema said...

Geet ki kavitaon ka jo sparsh hai Nirmal Verma ke gadya ki tarah safed kharogish ke royen jaisa lagta hai, shukriya