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मंगलेश डबराल की डायरी


( हिन्दी के अग्रणी कवि मंगलेश डबराल की डायरियों की ये प्रविष्टियां उनकी शीघ्र प्रकाश्य गद्य पुस्तक,''कवि का अकेलापन'' से ली गई हैं। मंगलेशजी ने इन्हे प्रीतिपूर्वक हमें छापने की इजाज़त दी। हम उनके कृतज्ञ हैं। डायरी के पन्ने कवि सुंदर चन्द ठाकुर ने तत्परता से मुहैया कराया। उनका आभार। हम वक्त-वक्त पर कवि-लेखकों की डायरी या जर्नल वगैरह प्रकाशित करते रहेंगे। )


कविता में कभी अच्छा मनुष्य दिख जाता है या कभी अच्छे मनुष्य में कविता दिख जाती है। कभी-कभी एक के भीतर दोनों ही दिख जाते हैं। यही एक बड़ा प्रतिकार है। और अगर यह ऐसा युग है जब कविता में बुरा मनुष्य भी दिख रहा है तब तो कविता में अच्छा मनुष्य और भी ज्यादा दिखेगा। लेकिन क्या ऐसा भी समय आ सकता है कि अच्छे साहित्य की चर्चा ही न हो ? सिर्फ़ दोयम दर्जे की कविता-कहानी को महान, अभूतपूर्व, युगांतकारी मानाजाने लगे ?कोई बहुत अच्छी कविता कहीं छपे और लोग उस पर कोई बात न करें और चुप लगा जाएं। यह कितना भयानक होगा। लेकिन समय की विशाल छलनी भी तो कुछ छानती रहती है। चुपचाप।
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नेता, इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए, सूचना तकनीक के माहिर लोग, सॉफ्टवेयर निर्माता, पत्रकार, प्रशासक, नौकरशाह, चित्रकार, संगीतकार, नृत्यकार वगैरह प्रायः राज्य, सत्ता, बाज़ार और ग्लोबलाइजेशन के अनुरूप ही सोचते हैं। वे यथास्थिति के विरोध में नहीं जाते। प्रायः कवि-लेखक-बुद्धिजीवी हैं जो सत्ताओं के प्रतिकूल सोचते हैं। इसके अपवाद ज़रूर हैं, इसलिए हम उन्हें हमेशा याद रखते हैं। माइकलएंजेलो वेटिकन के पोप को अपने से बड़ा नहीं समझता, इकबाल बानो पकिस्तान में याह्या खान की हुकूमत के ख़िलाफ़ फैज़ की नज़्म गाती हैं, जर्मनी में कई कलाकार हिटलर के ख़िलाफ़ पेंटिंग करते हैं, बीठोफेन नेपोलियन के विरोध में उसे पहले समर्पित की हुई अपनी सिंफनी फाड़ डालता है...

पोलैंड के महान पियानोवादक लिस्त के बारे में एक कहानी प्रसिद्द है कि एक बार उसके संगीत कार्यक्रम में रूस के ज़ार निकोलस सपरिवार अगली कतार में बैठे हुए थे। पोलैंड तब रूस के अधीन था। लिस्त बजा रहे थे और ज़ार परिवार बातों में मशगूल था। उन्हें बातें करते देख लिस्त ने पियानो बजाना बंद कर दिया, लेकिन ज़ार ने उनसे कहा कि बजाते जाइए। यह क्रम तीन बार चला। चौथी बार लिस्त ने पियानो बंद किया और व्यंग्य से कहा कि जब ज़ार बोल रहे हों तो हर चीज़ को खामोश हो जन चाहिए।

ऐसे कलाकार अमर हैं, क्योंकि वे कला का नैतिक मूल्य समझते हैं और बादशाहों-तानाशाहों को कुछ नहीं समझते। अब्दुल हलीम शरर की किताब, '' गुज़िश्ता लखनऊ '' में नवाब हैदर खां का किस्सा कितना मशहूर है। इस किस्से को स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया जन चाहिए।
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राजनैतिक कविता के नाम पर ज़्यादातर जो कुछ दिखाई देता है वह शायद किसी बड़ी कविता को निर्मित कर सकनेवाला कच्चा माल है। यह हम मार्क्सवादी कविओं की एक खामी है कि हम कविता की सामग्री को कविता की तरह पेश करते रहते हैं और गैर-कलावादी बनते हैं। हम अपनी कविता के रसोईघर को ही कविता मान लेते हैं, ताकि भोजन की असलियत भी पता चल जाए। हम अपनी किचन आपको पूरा क्यों दिखाएं ? थोड़ा-बहुत दिखाएंगे, लेकिन यह भी बताएंगे कि बहुत कम चीज़ों से हम बहुत अच्छा खाना बनते हैं। यही हमारी कला है। और कला हमारी ही है, किन्हीं कलावादियों की नहीं।
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क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि इधर मैंने जितनी कविताएं लिखी हैं उनमें से कई मृतकों के बारे में हैं--भुला दिए गए नामों को संबोधित, उनसे संवाद या उनके प्रति श्रद्धांजलि या फिर उनकी ओर से कोई वक्तव्य ? शायद यह, ''गुजरात के मृतक का बयान'' से से शुरू हुआ। फिर करुणानिधान, मोहन थपलियाल, गोरख पांडेय, मुक्तिबोध, शमशेर या माँ के बारे में। और पहले की कुछ कविताओं के पात्र केशव अनुरागी, गुणानंद पथिक, अमीर खां भी तो जीवित नहीं हैं। क्या जीवितों की तुलना में मृतकों से संवाद आज ज़्यादा संभव और ज़्यादा सार्थक हो गया है?

इन्हें लिखते हुए--खासकर गुजरात के मृतकों और मोहन थपलियाल पर--मुझे बहुत पीड़ा हुई, कभी रोया भी, लेकिन लिख चुकने के बाद लगा जैसे मेरा कोई बोझ उतर गया है, मैं भारहीन-सा हो गया हूँ और वह एक नैतिक मूल्य मुझमें भी समां गया है जिसका प्रतिनिधित्व ये प्रतिभाएं करती हैं। इस तरह मृतक मेरे, ''कन्सायन्स-कीपर'' हैं। मृतकों का अपना जीवन है जो शायद हम जीवितों से कहीं ज़्यादा सुंदर, उद्दात और मानवीय है। इतने अद्भुत लोग, और जिंदगी में उन्होंने कितना कुछ झेला और वह भी बिना कोई शिकायत किए। जो नहीं हैं मैं उनकी जगह लेना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ वे मेरे मुहं से बोलें।
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15 comments:

ye mere pasandeda kavi hai
aap ka dhanyavad ki aap ne unke bare me likha bahut achha likha hai aap ne
saader
rachana


पोलैंड के महान पियानोवादक लिस्त के बारे में एक कहानी प्रसिद्द है की एक बार उसके संगीत कार्यक्रम में रूस के ज़ार निकोलस सपरिवार अगली कतार में बैठे हुए थे।

अनुराग भाई लिस्त की तबियत के बारे में मंलगेशजी ने जो लिखा उसे पढ़ते हुए ज़माना लिस्त जैसे लोगों को सनकी या अहंकार से पीड़ित कहता है लेकिन सच यही है कि कलाकार के स्वाभिमान के आगे कोई दीगर चीज़ बड़ी नहीं होती. अदभुत है डायरी के ये पन्ने....एक कवि के एकांत से उपजे शब्द ज़माने की सारी हलचल का पता देते लगते हैं.


क्‍या बात है, बहुत ख़ूबसूरत.

मैं चाहता हूं, वे मेरे मुंह से बोलें.

ख़ूब.


प्रिय भाई,

मंगलेश जी की डायरी का अंश पढ़ा . मंगलेश जी ने बिल्कुल सही बात कही है. आज कविता-कहानी और उपन्यास की दुनिया में दोयम दर्जे की रचनाओं की ही चर्चा हो रही है, क्यों ऎसे लोगों को चर्चा के मंच उपलब्ध हैं. लेकिन समय की छलनी है----निराश होने की बात नहीं-----.

डायरी जारी रखें तो अच्छा होगा.

रूपसिंह चन्देल


bahut achha hai
is tarah ki diary se
kavi ki sambedansheelta aur chintan ki gahrai ka abhas hota hai
aur sikhte rahne ki jid aur majboot hoti hai.

sambhav ho to mere blog ka link bhi is blog men dal do..


मंगलेशजी की कविताएं हों या गद्य का कोई टुकड़ा, उसमें उनकी करुणा की धीमी आवाज सुनाई देती रहती है। इसमें दया नहीं, दीनता नहीं और आत्मदया तो बिलकुल भी नहीं बल्कि अपनी करुणा से ही एक प्रतिरोध पैदा करने की ताकत है। उनका गद्य भी उनकी कविता की ही तरह हर आडंबर को बुहार कर अनसुनी आवाजों और रुदन के लिए जगह बनाता है जहां कई बार हमें अपना ही रुदन सुनाई देता है। अनुरागजी मेरी बधाई स्वीकार करें।
रवींद्र व्यास, इंदौर


mangleshji ke gadya ka main ek baar aayova ke dinon se prasansak raha hoon. marxvaadi kavitaon aur kala ke sawalon ko lekar unhone bare zaroori sawaal uthaye hain.


manglesh ji ki kuch diariyan maine lekhak ki roti namak unki pustak men padhi thi.yh khushi ki baat hai ki unki ek aur gadya pustak aa rahi hai.we jitne achhe kavi hain usse katai km gadyakaar nhin.


manglesh ji ka gadya ek lambe arse baad padhne ka mauka mila.achha laga.sabad ke aise aayojnon ki hamen aage bhi pratiksha rhegi


mangleshji ka gadya sundar aur suchintit hai.kavita jaisa hi uska prabhaw mn pr padta hai.aap unke aur gady bhi den.


मंगलेशजी की डायरी के कुछ अंश पढ़ी अच्छा लगा... इनकी चिन्ता सार्थक है ..


गिरिराज

कला हमारी ही है. सुनने में कुछ ऐसा लगता है यह हिंदुस्तान हमारा ही है. काश, 'गैर-कलावादी' बन जाने का मलाल करते हुए इस पर भी 'ईमान' (जी हाँ, ईमान के साथ, 'ईमानदारी' का करुण-रस-विलास नहीं, 'पीड़ा के रसभीने अवलेह में लिपट कर' कला हो जाता है जो, जैसा रघवीर सहाय कहते) के साथ विचार किया जाता कि किस तरह हिन्दी पट्टी का साहित्यिक मार्क्सवाद ख़ुद एक व्यवस्था बन गया- विश्वविद्यालय (शिक्षा), साहित्य अकादेमी (कला), बड़े अखबार, साहित्यिक प्रकाशन ग्रह (पूंजीवादी महासरंचनाएं) - अल्थूसे के 'स्टेट आइडियोलोजिकल एपेरेटस' - सब जगह काबिज़ रहा आया यह विचार और इसकी संस्थाएं – लेखक संगठन आदि - आख़िर उस व्यवस्था में सर्वाइव कैसे करते रहे जिसका वे विरोध करते थे, जिसके प्रत्याख्यान से, प्रतिरोध से वे हिन्दी में अपनी आत्म-छवि और अपना पोस्टर दोनों बनाते रहे.कहीं वे एक 'सेफ्टी वॉल्व'तो नहीं बन गये थे? इस सबका, और ख़ुद उसके भीतर सक्रिय 'जातिवाद', 'क्षेत्रवाद, 'व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा' जैसे फील्ड्स का कभी तो विश्लेषण होना चाहिए . मंगलेशजी जैसे कवि से यह अपेक्षा की जा सकती है, मैं करता हूँ, कि वे उम्मीद के रहैटरिक को अपने लेखन में एक पिटी हुई संगठनानात्मक उक्ति/नारे (= चिंता मत करो बधुओं 'कला हमारी ही रहेगी') में नहीं बदलने देंगे.

और बधाई हो, रैडिकल ? वाम? अब 'सामाजिक कलावादियों' (अभिव्यक्ति सौजन्यः पंकज सिंह) को निशाना बना रहा है।


dhanyawaad mere priya kavi kee daayri ke kuch anshon se parichit karwane ke liye...


'' लेकिन लिख चुकने के बाद लगा कोई बोझ उतर गया हो...मैं भारहीन हो गया हूँ और वे मेरे अन्दर समा गए हैं '' अत्यंत मनोनुकूल, स्वचालित अहसास.. धन्यवाद अनुराग जी का, पढ़ने का अवसर दिलवाने के लिए.


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