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कला का आलोक : १ : हकु शाह


स्वभाव से अन्तर्मुखी व मितभाषी युवा लेखक, सम्पादक, अनुवादक व संस्कृतिकर्मी पीयूष दईया का जन्म 27 अगस्त 1973, बीकानेर (राज.) में हुआ। आप हिन्दी साहित्य, संस्कृति और विचार पर एकाग्र पत्रिकाओं ''पुरोवाक्'' (श्रवण संस्थान, उदयपुर) और ''बहुवचन'' (महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा) के संस्थापक सम्पादक रहे हैं और लोक-अन्वीक्षा पर एकाग्र दो पुस्तकों ''लोक'' व ''लोक का आलोक'' नामक दो वृहद् ग्रन्थों के सम्पादन सहित भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर की त्रैमासिक पत्रिका ''रंगायन'' का भी बरसों तक सम्पादन किया है। पीयूष ने हकु शाह द्वारा लिखी चार बाल-पुस्तकों के सम्पादन के अलावा अंग्रेज़ी में लिखे उनके निबन्धों का भी हिन्दी में अनुवाद व सम्पादन किया है। हकु शाह के निबन्धों की यह संचयिता,''जीव-कृति'' शीघ्र प्रकाश्य है। ऐसी ही एक अन्य पुस्तक पीयूष चित्रकार अखिलेश के साथ भी तैयार कर रहे हैं। काव्यानुवाद पर एकाग्र पत्रिका ''तनाव'' के लिए ग्रीक के महान आधुनिक कवि कवाफ़ी की कविताओं का हिन्दी में उनके द्वारा किया गया भाषान्तर चर्चित रहा है। वे इन दिनों विश्व-काव्य से कुछ संचयन भी तैयार कर रहे हैं।

( हकु शाह चित्रकारों की उस विरल परम्परा के प्रतिनिधि हैं जिसमें रचने के साथ-साथ विचारने की एक सरल-सूक्ष्म और मनोग्राही प्रक्रिया भी लगातार चलती रही है। पीयूष दईया की उनके साथ की गई बातचीत से जो सामने आया है वह इसका सुंदर नमूना है कि कैसे एक कलाकार की संगत हमारे पहले से देखे-भाले अनुभव-संसार को खामोशी से बदल देता है। बातचीत के कई टुकड़े सुधि पाठकों ने पत्रिकाओं में पढ़ा है। वेब दुनिया के पाठक इसके कुछ अंश www.raviwar.com पर पढ़ चुके हैं। यहाँ बातचीत के कुछ प्रसंग और। शीघ्र ही यह बातचीत पुस्तकाकार, '' मानुष '' नाम से प्रकाशित होगी । हकु शाह की तस्वीर रविवार से साभार और पीयूष की तस्वीर संतोष पासी के सौजन्य से । )

अनचिन्हा आपा

एक छोटी-सी बात पानी की , केंकड़े की , फूल की , एक मानुष की।

मुझे याद पड़ता है कि पिछली सदी के साठवें दशक में जब मैं और मेरे जर्मन नृतत्वशास्त्री मित्र डॉ. एबहार्ड फिशर , रातड़ी ( सौराष्ट्र में पोरबंदर से लगभग बीस मील दूर मेर जाति के लोगों का एक गांव ) में काम कर रहे थे तब मैं वहीं गांव की एक सुन्दर नाम वाली महिला--वा’लीआई--की सहायता से गुदड़ी को समझने के सिलसिलों में डूबा रहता था। उनके पास उनके पति अक्सर बैठे हुए मिलते थे। वे एक मितभाषी व चुप्पा शख्स थे--वहीं एक कोने में बैठ कर मिट्टी से बनी चिलम में तम्बाखू भर कर उसे धीरे धीरे फूंक देते थे। उनकी चिलम से उठता धुआं बरामदे में ऐसे फैलने लगता था मानो उनकी हस्ती की याद दिला रहा हो। मेरे लिए वह धुआं नहीं बल्कि रूपों का सागर था। वे गुदड़ी बनाने के लिए यदा-कदा कपड़े धोने व उन्हें अलग करने में वा’लीआई की मदद करते थे। वहां उनका उठना-बैठना-घूमना मुझे एकमात्र पात्र की माफ़िक लगता था। वे सचमुच एक पात्र की तरह थे। मुझे हमेशा महसूस होता था कि वे वहां ऐसे थे गोया वे वहां नहीं थे।

एक मौन उपस्थिति। एक यात्री ! उनका नाम था सांगाआता।

सांगाआता में बढ़ती मेरी दिलचस्पी के पीछे कई कारण थे। सबसे पहले यही कि वे वा’लीआई के पति थे। यह जानने का मन बराबर बना रहता था कि वहां रहते हुए वे क्या क्या कर रहे हैं क्योंकि उस पूरे माहौल से उनकी ख़ामोश मौजूदगी के सम्बन्धों में एक खास तरह की पर्दादारी-सी थी। उन्हें मैंने कभी ज़रा-सा जोर से बोलते तक सुना नहीं हालांकि मैं घंटों और पूरा पूरा दिन वहां बैठा रहता था। उनकी आवाज़ के बजाय मैंने या तो उनका चिलम पीना देखा या उसका धुआं या उनकी छोटी-सी तेजस्वी आंखें या माथे पर बंधा रहता उनका जीर्ण-शीर्ण फेंटा। मानो कोने में सांस लेता एक पोटला रखा है जो ज़िन्दा है। शून्यवत् रीति-शैली का बिम्ब !

आखिरकार एक दिन मैंने उन्हें यह पूछ ही लिया कि सांगाआता क्या आपके साथ मैं कुछ बात कर सकता हूं ? पहले वे बोले नहीं , बस, ''हां'' में मुंह हिलाया। फिर थोड़ा ठहर कर कहा,'' कल सुबह जल्दी आ जाइए। अपने दोस्त से मिलवाऊंगा।''

सांगाआता और वा’लीआई दोनों एक झोंपड़ी में रहते थे। एक ऐसी मामूली-सी झोंपड़ी जिसमें इन दम्पति के सिवा कुछ और भी हो , यह लगता नहीं था। यह झोंपड़ी और वह बरामदा मानो मंच थे और ये दो पात्र ! शांति , गति ,व्यवहार से खिसकते व कुछ करते दो प्राणी। मानो न जाने किस पिछली सदी में जीने वाले दो जीव यहां टपक पड़े हों !

सांगाआता का रूपचित्र बहुत आकर्षक था। सुबह जब झोंपड़ी की सूराखों में से सूरज की किरणें प्रवेश करतीं थीं, उनकी चमकीली आंखें और चमकीली हो जाती थी। उनकी छोटी दाढ़ी , मूंछ, व भौहों के बाल चिलम के धुएं से और सफ़ेद बन कर इसे एक रूपचित्र की मानिन्द लेने का लालच देते थे। मैं आज भी उन प्रकाश-किरणों में उनके भौहों के सफ़ेद बाल गिनने की कोशिश कर रहा हूं।

आम आदमी की व्याख्या कई दिनों से करता रहा हूं। सांगाआता सचमुच जन थे।

उनके कहे मुताबिक अगले दिन सुबह ज़रा जल्दी मैं उनके घर पहुंचा जहां वे पहले से तैयार खड़े थे। मानो एक पात्रमय शिल्प। सांगाआता ने अपने मेर लोगों वाली पोशाक पहनी हुई थी--मोटे सूत वाले कपड़े की ; ऊपर केडिया और नीचे चूड़ीदार पायजामा व सिर पर बंधा हुआ एक छोटा-सा फेंटा। उनकी उम्र करीब पिच्यासी-नब्बे साल के आसपास रही होगी। उनका बेटा बहुत बरसों से कहीं बाहर रहता था--झोंपड़ी में अकेले वे दोनों ही रहते थे बस , पति-पत्नी/अला-अली।

यह सुनने में आया था कि पूरा गांव सांगाआता को जानता है। गांव के लोगों से जब पूछा कि,''भला क्यों , क्यों जानता है ?'' पता चला कि सांगाआता अपने युवा दिनों में राजाओं के लिए लड़कियां भगाने का काम करते थे। काठियावाड में पहले अलग-अलग छोटे राज थे। सबसे दिलचस्प बात यह लगी कि सारे गांव वाले यह जानते हैं कि यह सांगाआता है। लोगों ने मुझसे कहा,''जानते हैं या नहीं यह हमें नहीं मालूम लेकिन उन दिनों सांगाआता जब दूसरे गांव से ऊंट पर बैठे हुए एक दो मील की दूरी पर आने वाले होते, कुछ दोहे की आवाज़ आतीं। वे आ रहे हैं।'' ( लोगों को लगता था। ) यही संदेसा था। यूं पहले से ही सबको पता लग जाता कि वे आने वाले हैं। तब सांगाआता गाना गाते थे--अपने प्रिय धोळो नाम के ऊंट पर बैठ कर। धोळो का ज़िक्र छिड़ते ही मानो कोई जन्मजन्मान्तरों के दोस्त की याद आ गयी हो जिससे वे इतना खुश हो जाते थे कि उनकी आंखें और चमकने लगती थी। वे धोळो के बारे में बोलने-बताने व कहानी सुनाने लग जाते थे। धोळो की स्मृति व सम्मान में उन्होंने अपने दोनों कंधों पर ऊंट का एक गोदना भी बनवाया हुआ था। वे बताते थे कि उनका धोळा पहाड़ जितना ऊंचा और अण्डे जैसा सफ़ेद था। उन्होंने पचासों ऊंटों की सवारी की थी लेकिन धोळा उन सबमें सबसे अच्छा था--आदमी से भी ज़्यादा बेहतर व समझदार। धोळो किसी तरह सरक कर उनकी झोंपड़ी में भी आ जाता था , उसे वे बिठा कर अंदर ले लेते थे। उन दिनों अक्सर रात को वे धोळो पर बैठ कर भागते थे , इधर से उधर। दोनों साथी ! दोनों संगाथी !

बहरहाल।

उस दिन सुबह हम दोनों उनके दोस्त से मिलने निकल चले। अपने मन में कहीं मैं यह जानता था कि उनके साथ होना-मात्र अपने में एक अनुभव होगा। रातडी एक छोटा-सा गांव था हम जिससे धीरे धीरे बाहर आये। सांगाआता पर मुझे बहुत विश्वास था। मैंने यह पहले से ही सोच रखा था कि वे जहां भी , जैसे भी ले जाएंगे मैं उनके साथ बिना पशोपेश में पड़े जाऊंगा। हालांकि सुना था कि वे बहारवटिया कौम से है। वे जब साथ में चलते थे, लगता था मानो कोई पशु-पक्षी या मानव की ऐसी हस्ती साथ दे रही हो जो मार्गदर्शक , वत्सल , मौन , निर्दोष व गुरू जैसी हो।

वे ले जा रहे थे।

चलते-चलते हम इतना दूर निकल आये कि एक आदमी तक कहीं नज़र नहीं आ रहा था--गांव कबका पीछे छूट चुका था। तभी अचानक वे बहुत धीरे से बोले-- '' ये फूल आपके जानने लायक है। वैसे है ये फूल।'' वहीं रास्ते में कहीं ज़मीन से निकले हुए वे दो फूल थे--बिलकुल ताज़ा व दोशीज़ा। तब सारा संसार भूरा व गुलाबी था और यहां अरगजी पीले फूल दीख पड़े थे , पांव के पास नीचे--पीले रंग के दो बहुत सुंदर व छोटे-से अच्छे फूल। उन्होंने बताया कि इन फूलों को हीहोरिया कहते हैं। ''मेर'' औरतें अपने कान में पूरी सोने से बनी हीहोरिया/डूल पहनती हैं , ये फूल भी बिलकुल उन सरीखे ही दिखते हैं।

मैं उनके दोस्त के बारे में सोच रहा था और अभी मिले ये दो फूल।

एक फूल से एक गहने के इस अद्भुत सादृश्य से विस्मयविभोर मैं उनके साथ यह सोचता हुआ आगे चलता गया कि ऊपर से इतना मामूली व एकाकी लगता यह आदमी कितना विलक्षण है। कौन जाने यह अपनी आत्मा में एक फ़लसफ़ेकार हो। ऊपर से अळगारी-सा दिखता। मगर वे ज़रूर जानते थे। वे जन थे।

चलते-चलते चारों ओर ऐसे खुले मैदान आने लगे थे जहां किसी प्राणी का कोई आभास तक नहीं मिल रहा था सिवाय कुदरत के जो ज़मीन थी या रेत थी या कहीं कहीं झाड़-झंखाड़ या कहीं इक्का-दुक्का कोई पक्षी या पशु और अक्षत क्षितिज। यह कहीं मैं जानता था कि सांगाआता के संग मौन रहना--अकथ--ही बड़ी बात होगी--जितना मैं मुंह बंद रखूंगा उतना ही मुझे जानने को मिलेगा।

और वैसा ही हुआ था।

मैदान पार करते-करते चढाव आया , ऊपर उठती ढलान। ढलान ऊपर की ओर चढ़ती चली गयी। वहीं आगे चलते चलते हम उधर पहुंचे जहां रेत में एक छोटा विवर-सा था जिसे देखकर सांगाआता बोले,''क्या आप जानते हैं यह क्या है ?'' मेरा जवाब था--''नहीं।'' मैं कुछ जानता भी नहीं था। वे फ़ौरन बोले, यहां केंकड़ा रहता है। अभी बाहर घूमने गया है।'' अचरज में मेरे मुंह से निकला,''ऐसा है।'' उनको यह पता चल जाता था कि वह ढंका , न ढंका विवर कैसा है जिसमें केंकड़ा नहीं है--उनकी सूझबूझ इस मामले में बिलकुल सटीक थी कि कहां केंकडा है और कहां नहीं है। आगे चलने पर एक दूसरा छोटा विवर आया जिसे देखकर वे बोले,''इसमें केंकड़ा है।'' और वहीं एकदम से नीचे रेत पर लेट उन्होंने विवर में से केंकड़ा निकाल कर बाहर उछाला। मैं फिर अचरज में भर बोला,''केंकड़े ने आपको काटा नहीं ?'' वे बोले,''हम जानते हैं कि केंकड़े को कैसे पकड़ना होता है। पहले हाथ में खूब रेत भर लेते हैं और उससे फिर पकड़ते हैं तब केंकड़े का काटा हमें रेत के हिसाब से लगता नहीं। हाथ की रेत हमें बचा लेती है।'' मुझे लगा कि इन दोनों विवर की उनकी पहचान के पीछे जो गहरा ज्ञान काम कर रहा है वे उसके अच्छे ज्ञाता है हालांकि बाहर से मुझे दोनों ही विवर लगभग एक जैसे ही लग रहे थे। विवर में केंकड़े की उपस्थिति व अनुपस्थिति का पता उन्हें विवर पर बिछी रेत की हल्की परत से चलता था जैसा कि मैंने उनसे ही जाना था।

यूं मैं उनके संग रोज़ बैठता था लेकिन मालूम नहीं था कि वे कितनों के दोस्त है , कि उनके भीतर कितनी बातें छिपी हैं। जैसे पहले फूल मिले, अब यह केंकड़ा।

बहरहाल, हम फिर आगे चले लेकिन इस बार--जैसे कि हम तथाकथित लोग जो जितना ही पढ-लिख जाते हैं उतना ही शंकाशील व असहिष्णु हो जाते हैं --मैं पूछ ही बैठा--''आप मुझे अपने दोस्त के पास ले जा रहे हैं।'' वे बोले , ''हाँ, आपको अपने दोस्त के पास ही ले जा रहा हूं।'' मैं बोला--''यहां कोई दिखता ही नहीं है।'' उन्होंने जवाब दिया--''आप चलिए।'' हम आगे चले। आगे चलते चलते जहां ढलान पूरा हुआ वहीं हमने अपने को रेत के एक विशाल-पट पर खड़े पाया। विस्मयविभोर मेरे दिल से निकला--ओह !

वहां एक बहुत बड़ा समुद्र-तट था। समुद्र था।
समुद्र की ओर हाथ करते हुए सांगाआता धीमे से बोले--''यह ही है मेरा दोस्त।''

जब समुद्र देखा, लगा कि इतने विशाल विश्वरंगमंच पर हम दो और वह समुद्र कितना अच्छा लग रहा है। गो कि वहां आकाश और विशाल पृथ्वी--समुद्र के रूप को जगाने व उभारने में यूं मदद कर रही थी मानो दो रूप मिलकर समुद्र के रूप को निखार रहे हो। क्षितिज क्या होता है , यह पता लगा।

बस इसी रीति से ही चित्र भी रूप लेता है।’’
यह तो बहुत बड़ी बात है सांगाआता। समुद्र आपका दोस्त है। ''
''कैसे ''--मेरे हिसाबी मन ने पूछा।

उन्होंने समुद्र के साथ अपनी दोस्ती की कहानी का विवरण देना शुरू किया और बताया कि वे इस समुद्र-तट पर हर रोज़ करीब पांच-सात मील घूमते हैं। पहले अभी वाली ढलान तक आते हैं फिर तट के बाजू पर घूमते हुए सिपोळियां जमा करते हैं--एक खास तरह की सिपोळियां जो दवाइयां बनाने में काम में ली जाती है--जिन्हें फिर वे अपने साफे को एक पोटली में बदल-बांध कर घर लाकर छांटते हैं और हाट-बाजार में दुकानदार को जाकर इन्हें बेचते हैं। सिपोळियां जमा करते हुए वे वहीं तट के ''खज़ाने'' से भी हर बार कुछ न कुछ चीज़ें अपने साथ ले आते थे--सुफेल , समुद्र-तट की वनस्पतियां, समुद्र द्वारा फेंका हुआ मछली पकड़ने के जाल का कोई टुकड़ा, भांति भांति के धागे सहित न जाने क्या क्या। उनकी पत्नी मज़ाक करते हुए कहती थी कि, ''तुम्हारे मरने पर ये चीज़ें तुम्हारी अर्थी से ही बांध देंगे।'' सांगाआता का कहना था--''समुद्र ही मुझे दे देना। यही मेरा दाता है , असली दोस्त है।''

इस प्रसंग का यद्यपि मेरे अपने चित्र-कर्म से सीधा सम्बन्ध नहीं है लेकिन फिर भी मेरे चित्त पर इसका गहरा असर है। यूं संसार के चित्रों में मैंने न जाने कितनी मनुष्याकृतियां देखी हैं। या जीवन में कोई पात्र या जापान की रेलगाड़ी में ग्रे सूट पहने लोग या मेक्सिको में हेटवाला मछली बेचता आदमी या वहां की नदियां और समुद्र याद आते हैं। साथ में रातड़ी का यह प्रसंग भी याद आता रहा है। लोक या प्रकृति की बात को बाजू में रखे तब भी यहां सांगाआता के प्रसंग ने मुझे गहरे तक आलोडित किया। उनके मुंह की झुर्रियां या बाल या रूपाकृति या शान्त समुद्र के मानस-पट में दबी हुई रचना ने शायद मेरी रचना में भी सहयोग दिया होगा। एक शांत , अफाट , अनन्त , लम्बी , जीवित पानी की रेखा और दूसरी ओर हिलता-चलता , अपने में डूबा लगता यह छोटा-सा महामानव ! मेरे चित्रकर्म का एक रूप-टुकड़ा हो सकता है ?

अपना यह संस्मरण मुझ लागणीवाले को बहुत आनन्द देता है और गहरी सिखावन भी।

शायद मम व ममेतर के सम्बन्धों का एक उदात्त रूपक भी है। मनुष्य या कलाकार के नाते से यह हमारे स्वधर्म का ही एक बहुत ज़रूरी विवरण बन जाता है कि हमें यह जानने-समझने का निरन्तर यत्न करते रहना है कि हम अपने चारों ओर के साथ किस तरह का सम्बन्ध बना रहे हैं। आप प्रकृति को ही लें। प्रकृति में एक छोटी सी चीज़ भी एक अपने रूप में वार्ता है जिसे हमें सुनना है। अपने सत्तर-अस्सी सालों के जीवन के बाद भी यह हमसे अनदेखी व अनसुनी रह जाती है। हमारा पोत पल पल की प्रक्रिया से बनता है। हममें से हरेक में सौन्दर्य की एक नैसर्गिक वृत्ति है। इसीलिए अपनी इन्द्रियों को धारधार रखना अपने में एक मानवधर्म है बल्कि मुझे हर वह व्यक्ति नसीबदार लगता है जो अपनी इन्द्रियों को लगातार जागरुक व पैना बनाये रखता है। हर रचनात्मक व्यक्ति को पहचानने की एक पैमाइश यह भी रखी जा सकती है कि वह भोंथरे को धारदार बनाने का काम कितनी दूर व कितनी गहराई तक जारी रख सका है। जीवन का प्रत्येक पल हमारा व्यक्तित्व बनाता है। हर क्षण अपना एक संस्कार लाता है और इन्हीं क्षणों के जोड़ से हमारा चरित्र बनता है। कला का भी।

6 comments:

piyushji ki is nayi rachna ka swagat hai.


ek kalakaar kitni gahrai se apne aaspas ko dekhta aur bayan krta hai wh anchinha aapa padh kr maloom padta hai.aksar hmen chitrkaron ki paintigs dekhne ko milti hai.yh dekhne ko nhi milta ki we uske bahar ki duniya ko kis trah se zazb aur wyakt kr rahe hain.sabad ne piyushji ke madhyam se yh suawsar hm pathkon ko muhaiyya kraya, iske liye shukriya.


मित्रों,यह एक हरा संकेत है; पीयूष दइया का इस आभासी संसार में दिखलाई पड़ना. यह संकेत 'छोकरापन' जो हमारे कला-संसार में कम होता जा रहा है, उसका और एकरेखीय, प्रगतिबद्ध करियर ग्राफों पर उसके शनिचरी प्रभाव का है. इस मार्च भोपाल में हुई आखिरी मुलाक़ात को याद करते हुए.


yh bilkul alag kism ka lekhan hai.hindi men itna achha samvad bahut km awsaron pr hua hai.haku shah ke kala aur jeewan ke anubhav ke vrittant ko piyushji ne bilkul sahaj,swabhawik aur sundar bna diya hai.badhai.


पीयूषजी का यह पीस जानदार है। आत्मीय और गहरा। इनमें संबंधों की निर्मल साफ छवियां हैं। संबंधों की बारीक लेकिन सशक्त रेखाएं। कहीं रेत पर उभरती हुई, कहीं समुद्र में डूबती हुई। कहीं चिलम के धुंए में अपना आकार-अर्थ ग्रहण करती हुईं। संबंधों की इन छवियों में चित्रकार का सांगाआता से अनूठा और अविस्मरणीय संबंध है, सांगाआता का अपने समय से, कलाकार का अपने आसपास के धड़कते जीवन से। और उस समुद्र से भी जिसका हमारे साथ एक नया संबंध पुनर्जन्म लेता है, हमारे जीवन को नया अर्थ देता हुआ। इसमें सबका एकदूसरे के प्रति कितना गहरा प्रेम भी आकार लेता हुआ धकधक कर रहा है। उसका भी, जिसने इस अनूठे कलाकार से बात की। अनजानी जगहों पर अंकित होता एक कलाकार का अनंत समय।

एक छोटी-सी बात पानी की , केंकड़े की , फूल की, एक मानुष की।

और इस बात में कितनी सारी अर्थ छवियां हैं। अप्रत्याशित। दो फूल, एक केकड़े की तरह। यह बातचीत एक कलाकार के समय को, उसके आसपास को, मन को, उसकी रचना प्रक्रिया को कितने चुपचाप ढंग से, बिना कोई नकली मुद्रा बनाए, धीरे-धीरे, परत-दर-परत हमारे सामने खोलती हैं। कलाकार के कहे में और बात करने वाले में अपनी ही इंद्रियों को लगातार जागरूक और पैना बनाए रखने की विनम्रता भी लक्षित की जा सकती है। कलाकार ने कितना मार्मिक कहा है कि- अपने सत्तर-अस्सी सालों के जीवन के बाद भी यह हमसे अनदेखी व अनसुनी रह जाती है। हमारा पोत पल पल की प्रक्रिया से बनता है। हममें से हरेक में सौन्दर्य की एक नैसर्गिक वृत्ति है। इसीलिए अपनी इन्द्रियों को धारधार रखना अपने में एक मानवधर्म है बल्कि मुझे हर वह व्यक्ति नसीबदार लगता है जो अपनी इन्द्रियों को लगातार जागरुक व पैना बनाये रखता है। हर रचनात्मक व्यक्ति को पहचानने की एक पैमाइश यह भी रखी जा सकती है कि वह भोंथरे को धारदार बनाने का काम कितनी दूर व कितनी गहराई तक जारी रख सका है।

चिलम का धुंआ... प्रकाश किरणों में भौहों के सफेद बाल गिनना...मौन मौजूदगी...सारा संसार भूरा-गुलाबी और पीले फूले...विवर पर बिछी रेत की हलकी परत...समुद्र का, एक दोस्त का संग-साथ...और दोस्त से मिली अजब-गजब चीजें...और जीवित पानी की रेखा...आखिर में एक कलाकार की धीमी आंच में पकी आवाज...कितना धीरज। अद्भुत।
रवींद्र व्यास, इंदौर


बहुत सुंदर बातचीत है. www.raviwar.com का अंश भी बहुत सुंदर था. मुझे लगता है कि हिंदी में बातचीत की इस परंपरा को और आगे बढ़ाया जाना चाहिए और विविध विधाओं से संबद्ध लोगों से इस तरह की बातचीत करते रहना चाहिए.
संजीत त्रिपाठी


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संपादन : अनुराग वत्स.

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