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एक कवि एक कविता : 2 : कुंवर नारायण

( एक कवि एक कविता शीर्षक स्तंभ की यह दूसरी प्रस्तुति है। यह स्तंभ युवा कवि यतीन्द्र मिश्र ने वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की कविता , ''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर'' पर टिप्पणी लिख कर शुरू की थी। इस बार उन्होंने वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की महत्वपूर्ण कविता,''अमीर खुसरो'' को टिप्पणी के लिए चुना है। हम पहले की तरह ही चयनित कविता भी साथ-साथ दे रहे हैं। हमें आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें कवि और कविता के चयन संबंधी सुझाव भी दे सकते हैं। अगली टिप्पणी श्रीकांत वर्मा की कविता ''कलिंग'' पर । )

इतिहास के धरातल पर कुछ नैतिक प्रश्न

यतीन्द्र मिश्र
इतिहास की सबसे गौरवशाली ख़ानकाहों में से निकलने वाली अप्रतिम आवाज़ों में एक आवाज़ अमीर खुसरो की भी है, जिसने कई शताब्दियों के बाद भी अपनी उपस्थिति का निर्मल आलोक बचाया हुआ है। यह रोशनी तब और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब कुँवर नारायण जैसा संवेदनशील एवं वैचारिक रूप से सजग कवि अमीर खुसरो को अपनी कविता के दायरे में शामिल करता है।

‘अमीर खुसरो’ जैसी रचना इस तथ्य को जानने जनता सन्दर्भ में एक पेचीदा पहल है कि हम मिथक और यथार्थ, संवेदना और इतिहासबोध तथा शिल्प और विचार की शर्तों पर किसी कविता को कितना समय निरपेक्ष बना पाते हैं। एक विशेष कालखण्ड में घटने के बावजूद इस कविता का कथानक यदि सार्वकालिक महत्त्व का बन पाया है, तो उसका सबसे सार्थक पहलू यही है कि यहाँ कवि, अमीर खुसरो की ऐतिहासिकता से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद उन संवेदनात्मक अवधारणाओं से सीधे बावस्ता है, जो उसके व्यक्तित्त्व निर्माण की नियति तय करते हैं। यहाँ इतिहास एक प्लेटफार्म है, जिस पर कविता के आत्मदर्शन को खरादा गया है। कुछ-कुछ उसी तरह, जिस तरह एक कोरे कैनवास पर कोई चित्रकार अपने विचार और भावनाओं की ढेरों आत्मीय रेखाएँ और मार्मिक रंग उकेरता है। कविता में कुँवर जी जहाँ वैचारिकता के तटस्थ झरोखे से इसके कथानक एवं चरित्र को देखते हैं, वह उनका निहायत आजमाया हुआ क्षेत्र है, जिससे गुजरकर वह पहले भी ढेरों महत्त्वपूर्ण इतिहास कविताएँ लिखते रहे हैं। मसलन- इब्नेबतूता, सरहपा, अभिनवगुप्त, चन्द्रगुप्त मौर्य एवं आजकल कबीरदास जैसी अविस्मरणीय कविताएँ।

‘मानवीयता’, ‘नैतिक आग्रह’ एवं ‘संघर्ष की जिजीविषा’- ये कुछ प्रत्यय ऐसे हैं, जो कुँवर नारायण की कविता का ताना-बाना तय करते रहे हैं। साथ ही, हमें आसानी से उनकी बड़ी काव्य-यात्रा में जो निर्णायक सूत्र बराबर से मिलता रहा है, वह यही है कि भाषा, शिल्प, कला और विचार सभी के बीच में से निकलकर मनुष्य की निजता का भरा-पूरा मानवीय दायरा ही उनकी रचना का अभीष्ट बनता है। शायद इसी कारण वे खुसरो के साथ अपनी आत्मीय व वैचारिक गुफ्तगू में बड़ी आसानी से निज़ामुद्दीन औलिया, गोपाल नायक, देवलरानी एवं पद्मिनी को भी शरीक कर लेते हैं।

यह कविता संवाद की शक्ल में एक सूचना के साथ शुरू होती है और अपनी समाप्ति पर जिस विचारवान आकलन में तब्दील होती हुई नज़र आती है, वहाँ ढेरों छोटे-छोटे प्रश्नचिन्ह भी बिखरे मिलते हैं; जो इतिहास को चमत्कारिक ढंग से समकालीनता में विन्यस्त कर देते हैं। अमीर खुसरो में कुँवर जी उन्हीं बेधक प्रश्नचिन्हों के सहारे हमारे निजी सरोकारों पर ही नहीं, बल्कि अपनी महान् परम्परा पर भी उँगली उठाते हैं। जैसे- उस संगीत में दरअसल किसकी जीत हुई थी ? यह तुगलकनामा बस अब और आगे क्यों नहीं ? उन दिनों संगीत या कलाओं के बरक्स कैसे आतंक ही विजयी माना जाता था और एक कलाकार की किसी राजदरबार या सामंती व्यवस्था में या एक नृशंस समय में कितनी स्वायत्तता होती है ? ज़ाहिर है ऐसे प्रश्नों से लबरेज कुछ नैतिक सरोकारों को टटोलने के प्रयास में ‘अमीर खुसरो’ जैसी कविता असाधारण भावाभिव्यक्ति उत्पन्न करती है।

यह अलग बात है कि हम इतिहास और वर्तमान की संधिरेखा पर मिलते हुए भी अकसर जीवन की खुली आवाजाही को तरजीह नहीं देते, बल्कि विकृतियों और अन्तर्विरोधों से आँख चुराते हुए स्वयं की अस्मिता का निषेध करते रहते हैं। ऐसे ही मौकों पर बार-बार कुँवर जी की कविता कालजयी बनती है, जो हमें एक बार फिर से बताती है कि समय के शाही खेल तमाशों में संगीत, कलाएँ या उद्दात्त मानवीय सरोकार भी नहीं जीत पाते। हर युग में वह भी हारते हैं, भले ही वह काल को अतिक्रान्त करता हुआ अमीर खुसरो जैसे विवेकवान कलाकार का ऐतिहासिक समय ही क्यों न हो?

कुंवर नारायण की कविता

अमीर खुसरो

हाँ ग़यास, दिल्ली के इसी डगमगाते तख्त पर
एक नहीं ग्यारह बादशाहों को
बनते और उजड़ते देखा है ।
ऊब गया हूँ इस शाही खेल तमाशे से
यह 'तुगलकनामा' - बस, अब और नहीं।
बाकी ज़िन्दगी मुझे जीने दो
सुल्तानों के हुक्म की तरह नहीं
एक कवि के ख़यालात की तरह आज़ाद
एक पद्मिनी के सौंदर्य की तरह स्वाभिमानी
एक देवलरानी के प्यार की तरह मासूम
एक गोपालनायक के संगीत की तरह उस
और एक निज़ामुद्दीन औलिया की तरह पाक।

ग़यास एक स्वप्न देखता है, '' अब्बा जान
उस संगीत में तो आपकी जीत हुई थी ?''

''नहीं बेटा, हम दोनों हार गए थे।
दरबार जीता था।
मैंने बनाये थे जो कानून
उसमें सिर्फ़ मेरी ही जीत की गुंजाइश थी।
मैं ही जीतूँ
यह मेरी नहीं आलमपनाह की ख्वाहिश थी।''

खुसरो जानता है अपने दिल में
उस दिन भी सुल्तानी आतंक ही जीता था
अपनी महफिल में।
भूल जाना मेरे बच्चे कि खुसरो दरबारी था।
वह एक ख्वाब था -
जो कभी संगीत
कभी कविता
कभी भाषा
कभी दर्शन से बनता था
वह एक नृशंस युग की सबसे जटिल पहेली था
जिसे सात बादशाहों ने बूझने की कोशिश की !

खुसरो एक रहस्य था
जो एक गीत गुनगुनाते हुए
इतिहास की एक कठिन डगर से गुजर गया था।


( ''इन दिनों '' नामक कविता-संग्रह से साभार )
7 comments:

भाषा, संगीत या कला के बीच रहने वाला मन मानवीयता को कितनी सजगता से देखता है साथ ही किस तरह उसकी निजता के बीच सार्वजनिकता भी विद्यमान रहती है .. यह कविता उसका बेहतरीन उदाहरण है


kavita aur us par tippani, dono hi uchh koti ki hai. sabad ke is prayaas se kavita aur uske aagrahi pathak nicshay hi kuch aur najdeek aayenge.


kavita pr itne km shabdon men uske tamaam shimton ki or ishare krta yatindr mishr ka yh lekh pasand aaya.kavita bhi iski roshni me kuch aur khul gai.dhanyawaad.is stmabh k liye agyey,muktibodh,trilochan,shamsher jaise kavion ke sath-sath un kavion ki kavitaon ka bhi chayan hona chahiye jo sampurn kavi ke roop men to hashiye pr thel diye gaye,lekiin jinki kai kavitaon men aisa kuch hai jo anyatr nahi.


yatindraji ne bahut kam shabdon men amir khusro kavita par bahut maanikhez tippani ki hai.yeh kavita rajsatta aur kala ki swayattata se jure kai sawaal uthata hai,yetindra ne iske rahasyon ko udghatit karne ka saarthak prayas kiya hai.


kuwar ji ki kavita par bahut sahridayta se Yatindra ne likha hai. --Om nishchal


mujhe nhin lagta tha ki web duniya men sahitya se sambandhit itni achi samagri dekhne-padhne ko milegi. yatindrji ka yh lekh kunwar narayanji ki kavita ke sath-sath padnhe se meri kavita ki samajh aur badhi.main wqt nikaalkr dusre posts bhi dekhunga.ek nazar men to sabad bahut bha rahi hai.badhai.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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