Wednesday, June 18, 2008

सेवेंटीएमएम

(विनोद अनुपम हिन्दी की मुख्यधारा की फिल्मों पर लंबे समय से आलोचनात्मक लेखन करते आ रहे हैं। उन्होंने उद्भावना के प्रसिद्ध फिल्म विशेषांक का संपादन भी किया है। विनोद उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो हिन्दी फिल्मों के प्रति कटु होने के बावजूद जिम्मेदारी और लगाव से लिखते हैं। सबद के लिए उन्होंने फिल्मों पर सेवेंटीएमएम नामक स्तंभ लिखना स्वीकार कर एक बड़ी कमी पूरी की । गैरज़रूरी पर इन अवसरों साझा कर लेनेवाला तथ्य यह भी है कि उन्हें उनके लेखन के लिए वर्ष २००२ में सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है।

कवि संगत कविता के साथ स्तंभ की आरंभिक टिप्पणी की ओर कुछ लोगों का ध्यान गया। यह कविता के लिए शुभ है कि उसे लेकर बहसतलब बातें करने की ज़रूरत लोग अब भी महसूस करते हैं। यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। इससे बातें कुछ और साफ़ होंगी। हमने पहले ही कहा था, फिर इसरार करते हैं कि प्रकाशित रचनाओं पर वाद-विवाद-संवाद की गुंजाइश हम सदैव बरकरार रखेंगे। संयोगवश ही सही, विनोद का स्तंभ भी इसी ओर इशारा कर रहा है।)

निन्दक नियरे राखिए

विनोद अनुपम
सत्यजीत रे कहते थे, मैं सिनेमा अपने लिए बनाता हूं। बावजूद इसके सिनेमा पर जितना उन्होंने लिखा, शायद ही किसी भारतीय फिल्मकार ने लिखा हो। जाहिर है, उनका सिनेमा पर लिखना, कहीं न कहीं अपने सिनेमा के लिए दर्शक तैयार करने की कोशिश थी। कुछ वैसी ही कोशिश जो अपने शुरूआती दौर में निराला को करनी पड़ी थी। रामाविलास शर्मा, रामविलास शर्मा नहीं हो पाते यदि निराला के इस दर्द का अहसास उन्हें नहीं हो पाता कि एक कवि आखिर क्यों कर छद्म नाम से अपनी ही आलोचना लिखने को बाध्य हो रहा है। निराला को पता था, कविताएं लाख समृद्ध क्यों न हों , लेकिन जब तक आलोचकीय दृष्टि से उसकी व्याख्या न हो जाए , लोकप्रिय भले हो सकती हैं, प्रतिष्ठित नहीं।

यह एक भोला भ्रम है कि आलोचना कृति को खारिज ही करती है। बहुत कुछ यह आलोचना के नाम पर राग-द्वेष से प्रेरित लेखन की उपज है जिसमें कृति का वास्तविक गुण ओझल हो जाता है। दरअसल आलोचना कृति को सहज-संप्रेष्य बनाती है। ऐसा सत्यजीत रे भी मानते थे, दादा साहब फाल्के भी। आलोचना के महत्व के प्रति सजग दादा साहब फाल्के एक ओर भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ की तैयारी में लगे थे, तो दूसरी ओर सिनेमा पर लगातार लेखन भी कर रहे थे। हिन्दी सिनेमा के परवर्ती फिल्मकारों ने फिल्म-निर्माण तो उनसे सीखा, लेकिन अपनी कला विधा के प्रति चिन्ता करना नहीं सीखा। दादा साहब फाल्के के बाद यह प्रवृत्ति ढलान पर उतरती चली गई। बाद के फिल्मकारों के लिए सिनेमा से ज्यादा महत्वपूर्ण सिनेमा के जरिए होनेवाली आय हो गई। महबूब खान से लेकर गुरूदत्त तक और फिर सुभाष घई-करण जौहर तक, फिल्में लगातार बनती रहीं। सैंकड़ों अच्छी और गंभीर फिल्में बनीं, लेकिन किसी फिल्मकार ने यह चिन्ता नहीं की कि उसकी फिल्म को कोई जानने की कोशिश भी करे। उसे एक कलाकृति की तरह देखे-पढ़े-समझे। किसी फिल्मकार ने अपनी फिल्मों को लेकर दर्शकों से संवाद स्थापित करने की ख़ुद तो कोशिश नहीं ही की, संवाद के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी नहीं किया।

यह
कहने में कतई संकोच नहीं किया जा सकता कि हिन्दी सिनेमा के पास आलोचक नहीं है। हिन्दी सिनेमा आज जिन्हें अपने आलोचक के तौर पर स्थापित कर रही है, वे मूलतः पत्रकार हैं, जो देय तथ्यों पर रपट बनाते हैं। असल में, आलोचक की जरूरत उस विधा को होती है जिसका विकास गुणात्मक रूप से होता है। हिन्दी सिनेमा की यह त्रासदी रही कि वह इसके प्रति कभी चिंतित-सजग नहीं रही। उसके लिए अनिवार्य बाजार का विकास रहा और इसके लिए जरूरत पत्रकारों की थी। आश्चर्य नहीं कि नेत्रसिंह रावत, कुंवर नारायण, विष्णु खरे, प्रभु नाथ सिंह आजमी जैसे आलोचक हाशिए पर चले गए। हिन्दी सिनेमा को फर्क नहीं पड़ता था कि उसके दर्शक उसे कितनी गंभीरता से लेते हैं। उसके लिए इतना काफी था कि वे उसे पैसे दे जाते हैं।

8 comments:

prabhatranjan said...

vinodji ne bahut achhi baat uthai hai. ab to cinema par achha likhne waale patrakar bhi nahi dikhai dete hain. aaj ke cinema aalochna ki dasha-disha dekhkar mujhe dushyant kumar ka sher yaad aata hai- Dukandaar to mele men lut gaye yaron, Tamaashbeen dukanen sajaake baith gaye.
anuragji, vinodji ka likhna main aapke blog ki uplabdhi samajhta hoon.

kshitish said...

in this article, vinod ji has tried to place hindi poetry and flims in one frame. cinema is different kind of art. flims are only made for making profits.box office and cash register is a key word in bollywood.nobody treats cinema like bookish knowledge.you have criticised mehboob khan, guru dutt and subhash ghai. they are legendary filmmakers, not writer.

ravindra said...

अनुरागजी,
विनोदजी का यह कॉलम शुरू करने के लिए मेरी बधाई स्वीकारें। विनोदजी ने ठीक ही कहा है कि हिंदी में सिनेमा आलोचक नहीं है। उन्होंने जो नाम गिनाए हैं उनमें रघुवीर सहाय, के. बिक्रम सिंह, प्रयाग शुक्ल, मंगलेश डबराल, विनोद भारद्वाज, उदयन वाजपेयी के नाम शामिल किए जा सकते हैं। इनमें कुछ नियमित और कुछ कभी-कभार फिल्मों पर लिखते रहे हैं बावजूद इसके हिंदी में चिदानंद दासगुप्ता जैसा एक भी समीक्षक नहीं है जो पूरी तरह से एकाग्र होकर सिनेमा को उसकी एक टोटल रिलेशनशिप में देख सके। मराठी में ही अरुण खोपकर ने गुरुदत्त पर तीन अंकीय त्रासदी जैसी बेहतरीन किताब लिखी है और यह हिदी में भी उपलब्ध है। अंग्रेजी में खालिद मोहम्मद बकवास समीक्षाएं लिखते रहे हैं और अमिता मलिक ने कभी-कभार अच्छा लिखा है लेकिन बरसों पहले इंडियन एक्सप्रेस में इकबाल मसूद स्तरीय फिल्म लेखन की मिसाल दे चुके हैं। हिंदी में दिनमान ने गंभीर और बेहतरीन फिल्म समीक्षा की शुरुआत की थी। आज यह कल्पना करना ही मुश्किल है कि रघुवीर सहाय ने दिनमान में मणि कौल जैसे फिल्मकार पर कवर स्टोरी छापी थी। हिंदी में ले-देके माधुरी ही थी और थोड़ा बहुत अच्छा फिल्म साहित्य धर्मयुग में छपता था। साइट एंड साउंड, अमेरिकन सिनमेटोग्राफर, ब्राइट लाइट फिल्म जर्नल जैसी पत्रिकाअों की कल्पना करना मुश्किल है। हिंदी में पटकथा निकली थी और उसमें बेहतरीन चीजें छप रही थीं लेकिन वह भी अल्पजीवी रही। जाहिर है हिंदी में न अच्छी फिल्मों को दर्शक मिलते हैं न अच्छी पत्रिकाअों को पाठक। आज तो हिंदी का आलम यह है कि अडूर-शाजी, राय-रितुपर्णो, कर्नाड-कासरवल्ली, मृणाल-बेनेगल की बात छोड़ दें, हमारे पास करण-आदित्य, भंसाली-वर्मा, भंडारकर-मिश्रा-बसु की फिल्मों पर बेहतर समीक्षाएं सिरे से नदारद हैं। अपवाद की बात छोड़ दीजिए। जाहिर है इसके कारण फिल्मों में ही नहीं, समाज और बाजार में भी है।
रवींद्र व्यास, इंदौर

shraddha said...

cinema ko jo dekhna hi nahi , samajhna bhi chahte hai unke man ki baat ko bakhubi bataya hai.

sunsunny said...

seventymm ke bahane ab filmon aur filmjagat se judi halchalon pe kuch aur rochak aur vicharotejak padhne ko milega aisi aasha ke sath vinod ji ko sarvpratham sadhuvaad... bahut dino se is blog rupi virtual dunia me filmo se sambandhi achcha likhne walo ki jo kami mai-aur tamaam log mehsoos kar rahe they shayad ab wo samapt ho jaye...mai is stambh ko shuru karne ke liye apko punah bhdhai deta hoon...bahut bahut shubhkamnayen

vandana said...

vinod anupam ka lekhan wibhinn patr-patrikaon ke madhyam se samne aata raha hai. unhe yahan padhna ek sukhad anubhaw hai. apni phli tippani men hi unhone jis or dhyanakarshan kiya hai wh soch-vichar ke liye aamntrit krta hai. upar ravindr vyas ji ne jo pratikriya di hai wh uska ek poorak jaisa hi lagta hai.dono ko dhnyawaad.

BrainWash Inc. said...

I have been reading Mr. Vinod in newspapers from years. I know the way he use to portray his views has been excellent. But the topic and point of view here placed is quite appreciable. In fact, I am very happy that the 'Art Factor' of this medium has not been overlaped here as it happens in reality. Business of entertainment is something that gives new dimension to entertainment and some how it helps the art to grow and prosper. But this should not be at the cost of the prime purpose of this medium. Thanx! - BrainWash

शंकर said...

सिनेमा अथवा कोई भी कला देखने, रसास्वादन करने की चीज है। उस पर लिखने-लिखाने से सामान्य दर्शक या आस्वादक को क्या अंतर पड़ता है? अच्छा भोजन, शीतल-मंद-समीर या मनोरम उपवन - इन के बारे में लिखने या न लिखने से सेवन करने वाले के सुख को क्या!