Wednesday, June 04, 2008

एक कवि : एक कविता : केदारनाथ सिंह

( जब सबद की शुरूआत हुई थी तब इस स्नेह-सौजन्य की कल्पना तक मन में न थी जो इतने कम दिनों में इसे मिल रहा है। इसके दो बहुत साफ कारण थे। पहला और प्रमुख तो यही कि इस माध्यम से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ और इससे अपना बहुतेरे कामकाज निपटाने वाला पाठक-वर्ग भी इसे अपने लिए गंभीर पाठ्य-सामग्री, जैसा उसे पत्रिकाएं आदि मुहैया कराती रही हैं, उपलब्ध कराने वाला स्रोत नहीं मानता। दूसरे, हिन्दी में जो-कुछ ब्लॉग के नाम पर परोसा जा रहा है और उसकी वजह से जैसी इसकी छवि लोगों के मन में बन गई है, उससे अच्छी तरह वाकिफ होने के बाद भी यहाँ ऐसा कुछ शुरू करना निरा जोखिम का काम था। स्वीकार करना चाहता हूँ कि यह सुविचारित था। परवाह बस इस बात की थी कि हमारे समय में शब्द-कर्म में संलग्न लेखकों का सहयोग सबद को प्राप्त हो सकेगा अन्यथा नहीं। पर अब जब हर तरफ से आश्वासन और सहयोग मिल रहा है तो सिवाय उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार कर आगे बढ़ने के अलावा मेरी कोई भूमिका यहाँ नहीं है। मुझमें यह अहसास गहरा गया है कि सबद निरंतर रहेगा.....आज इसमें एक महत्वपूर्ण योग युवा कवि-लेखक यतींद्र मिश्र करने जा रहे हैं। यह उन्हीं का सुझाव था कि बात कविता के बहाने की जाए। तय हुआ कि किसी एक महत्वपूर्ण कवि की एक कविता को, जिसमें उसका आत्यांतिक काव्य-गुण भी प्रकट हो, इसका आधार बनाया जाए। प्रसन्नता है कि एक कवि एक कविता नामक यह स्तम्भ हिन्दी के अत्यन्त महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह की कविता बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर से शुरू हो रहा है। पाठकों की सुविधा के लिए कविता साथ-साथ दी जा रही है। )

देश-देशांतर के रिश्तों को बचाने की जद्दोजहद

यतींद्र मिश्र

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की एक मार्मिक व प्रासंगिक कविता है,''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर''। आज के निहायत क्रूर व अराजक समय में सिर्फ़ कविता ही हमारा ऐसा अर्जित प्रदेश बचती है, जिसके भूगोल में जाकर हम समय, समाज, देश एवं आपसी रिश्तों के संवेदनात्मक सूत्रों की रेशा-रेशा पड़ताल कर सकते हैं। केदार जी इस कविता की अंतर्वस्तु को इतनी सहज निर्लिप्तता के साथ रेखांकित करते हैं कि कविता जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वह मर्मस्पर्शिता का उत्कर्ष प्राप्त करने के साथ ही प्रश्नों और जिज्ञासाओं की असंख्य टिमटिमाती उर्मिओं में बदल जाती है।
इस कविता में, जब कवि कहता है,''यहाँ हममें से हरेक थोड़ा-थोड़ा हिंद और थोड़ा-थोड़ा पाक'', तब कविता की अर्थछवियाँ एकाएक न सिर्फ़ प्रकाशित हो उठती हैं, बल्कि हमारी सुखद स्मृतियों के शांत ताल में अचानक हरारत पैदा कर देती हैं। बर्लिन की टूटी दीवार के बहाने इस कविता की महफिल में ढेरों ऐसे रूपक मौजूद हैं, जो मनुष्य और उसके आत्मीय दायरे के बारे में अपनी उपस्थिति को और भी अधिक भावप्रवण बनाते हैं। मसलन - एक पागल स्त्री का दीवार के पास लगातार चक्कर लगना, अहमद फ़राज़ के ताज़ा ग़ज़ल में डूबी हुई पुरनम शाम और पूरे उपमहाद्वीप में सन्नाटे और चीख के बीच किसी ग़ज़ल के एक भूले हुए मिसरे का इंतज़ार।

केदारनाथ
सिंह आदमी व उसके देश-देशांतर के साथ बननेवाले हार्दिक दायरे का वृत्त खींचते हुए इस प्रश्न के पास पहुँचते हैं कि आख़िर यह दीवार कब टूटेगी ? उस समय सहसा ये सारे बिम्ब व रूपक अपनी-अपनी काव्य पंक्तियों में रहकर एक लम्बी कराह में तब्दील होते हुए नज़र आते हैं, जिससे यही अर्थध्वनि निकलती है कि हम अपने देश से बाहर रहते हुए, पड़ोसी मुल्क के लोगों के साथ अपनापे से बतियाते हुए भी कहीं न कहीं कुछ ऐसा गँवा देते हैं , जो आसानी से फिर उस यात्रा में हमारा रहगुजर नहीं बन पाता। फिर वह घास पर पड़ा हुआ होंठों से अचानक फिसलकर गिरा चुम्बन हो या एक पागल स्त्री की असंभव पुकार, जहाँ यह पहले से ही तय है कि समय ने उसकी आत्मा में कोई कील ठोंक दी है।

दरअसल
, इस कविता में अहमद फ़राज़ अपनी ही जिस ग़ज़ल का मिसरा भूल रहे होते हैं, वह एक निर्मम चेतावनी है कि हम कहीं न कहीं स्वयं को भूल रहे हैं। अपने अन्दर की उस सहज पुकार को भूल रहे हैं, जो अगर निकल पाती तो शायद हमारे बीच इतनी दूरियां न होतीं। तब शायद वह बर्लिन की दीवार भी न होती। अहमद फ़राज़ के बरक्स अगर यहाँ कबीर या ग़ालिब होते, तो उस पागल औरत के विलाप का सुर भी उतना ही अंतहीन होता, जितना वह फ़राज़ के समय में है।

''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर'' एक प्रश्न करती हुई कविता है। यह दुःख के रसायन को थोड़ा और संघनित करते हुए एक ऐसी मार्मिक कविता का रूप अख्तियार करती है, जो आपसी रिश्तों के सामंजस्य को बड़े फलक पर विमर्श का हिस्सा बनाती है। केदारनाथ सिंह इस उपक्रम में उतने ही सफल साबित हुए हैं, जितना कि इस कविता की तमाम वे सारी चीजें, जो साथ-साथ रहते हुए भी उदास होने की शर्तों पर सफल साबित हुईं हैं।

( अगली टिप्पणी कुंवर नारायण की कविता ''अमीर खुसरो'' पर )


केदारनाथ सिंह की कविता

बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर

तीन दिन हुए
मैंने बर्लिन में देखे नहीं कौए
लेकिन क्यों कौए ?
इस भारतीय कवि को क्यों चाहिए कौए
इस सुंदर शहर में जबकि आसमान उतना ही नीला है
बिन कौओं के भी !

यह एक छोटा-सा होटल है
जहाँ हम कुछ हिंद-पाक लेखक
ठहरे हैं साथ-साथ
और हमारे पासपोर्ट चाहे जो कहते हों
यहाँ हममें से हरेक थोड़ा-थोड़ा हिंद है थोड़ा-थोड़ा पाक
हम साथ-साथ खाते हैं
पीते हैं साथ-साथ
हँसते-हँसते कभी-कभी हो जाते हैं उदास भी

यह साथ-साथ हँसना
उदास होना साथ-साथ
एक दुर्लभ अनुभव है
एक वेदेशी ज़मीन पर

वहाँ बाहर
मेरी खिड़की से दिखते हैं
दो वायुयान जैसे दो कबूतर
दो महायुद्ध - वहाँ बेंच पर बैठे
वृद्धों की स्मृति में ठांय-ठांय करते हुए
एक ताज़ा चुम्बन किन्हीं होंठों से गिरकर
वहाँ घास पर पड़ा हुआ

पर मेरी खिड़की से दिखती है
बर्लिन की टूटी हुई दीवार भी
और देखता हूँ कि उसके चारों ओर
लगा रही है चक्कर एक पागल स्त्री
न जाने कब से।
कहीं कुछ है कील की तरह
उसकी आत्मा में ठुंका हुआ
कि रुकने देता नहीं उसे
और वह बार-बार
आ रही है
जा रही है
उधर से इधर
और इधर से उधर...

इधर एक छोटी सी महफिल में
सुन रहे हैं हम अहमद फ़राज़ को
कोई ताज़ा ग़ज़ल सुना रहे हैं वे
झूम रहे हैं सब
झूम रहा हूँ मैं भी
पर मेरी आँखें खिड़की के पार
बर्लिन की उस टूटी दीवार पर टिकी हैं
जहाँ वह पागल स्त्री ग़ज़ल को चीरती हुई
लगाए जा रही है चक्कर पर चक्कर...

जैसे कोई बिजली कौंध जाए
एक दबी हुई स्मृति
झकझोर जाती है मुझे
और मुझे लगता है कहीं मेरे भीतर भी है
एक पागल स्त्री
जो दरवाजों को पीटती
और दीवारों को खुरचती हुई
उसी तरह लगा रही है चक्कर
मेरे उपमहाद्वीप के विशाल नक्शे में
न जाने कब से

देखता हूँ कि ग़ज़ल के बीच में
कोई मिसरा भूल रहे हैं अहमद फ़राज़
पिछले शेर और अगले के बीच का
एक अजब-सा सन्नाटा
भर गया है कमरे में
पर मुझे लगता है मेरे भीतर की वह पागल स्त्री
अब एक दीवार के आगे खड़ी है
और चीख रही है - ''यह दीवार ...
आख़िर यह दीवार
कब टूटेगी ?''

इतने बरस हुए
ग़ज़लों से भरे इस उपमहाद्वीप में
मुझे एक भूले हए मिसरे का अब भी इंतज़ार है

( कवि के अन्तिम प्रकाशित संग्रह,''तालस्ताय और सायकिल'' से साभार )

11 comments:

Rajesh R. Singh said...

अच्छा प्रयास है .

shraddha said...

ek lambi kavita ko itne kam shabdo me sametna apne aap me mushkil hai. phir bhi accha prayas hai.

धर्मेंद्र सुशांत said...

सबद का सिलसिला अच्छा चल निकला है. यतींद्र जी ने रूपकमय भाषा में लिखा है. कविता के उदघाटन की उनकी कोशिश अच्छी है. कविताओं पर दूसरों को भी इस तरह से भी लिखना चाहिए. साथियों का ऐसा ही सहयोग मिलने लगा तो आपका ब्लॉग साहित्यिक लोगों का एक जरूरी अड्डा बन जाएगा, बन ही गया है.

Tushar Dhawal Singh said...

(वाक्य में हुवी भूल को सुधार कर दोबारा यह लिख रहा हूँ. )
यह मेरा तीसरा प्रयास है. पिछले दो बार इंटरनेट ने धोखा दे दिया और लिखा हुवा सब मिट गया. हालांकि इबारतें मिटती नही हैं. यतींद्र जी आपने सचमुच अच्छा प्रयास किया है. इस कविता में सबसे सशक्त बिम्ब है उस पागल स्त्री का जिसकी आत्मा में कील thuki हुवी है, और वह टूटी हुवी दीवार के charo तरफ़ chakkar लगा रही है. इसमे न केवल आज के मानव की मानसिक स्थिति बयां होती है बल्कि और भी गहरे मानव के मानव से खो जाने कि व्यथा भी है. यह एक तरह का आत्म निर्वासन है जिसे झेलने के लिए आज के समय में हम अभिशप्त हैं. यह दीवार हमने बनाई है और अपने सहज स्वाभाविक मानव स्वरूप को हमने नकार दिया है. तभी आत्मा में कील ठुक गई है. उदासी की कई परतों के भीतर से एक अकुलाई आवाज़ उठती है कि यह दीवार कब गिरेगी. इस कविता में अपने समय के मनुष्य को ढूँढने कि बेचैनी है और उसे खोता हुवा देख कर एक उदास पुकार है.
हम ऐसा भी कर सकते हैं कि इस ब्लॉग को साहित्य कला संस्कृति से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर गंभीर चिंतन का मंच बना लें. एक कमेंट आए और उस कमेंट पर भी कोई कमेंट आए तो बातचीत आगे बढ़ पायेगी.
फिलहाल तो यतींद्र जी आप मेरी शुभ कामनाएं स्वीकार कीजिये.
तुषार धवल.

prabhatranjan said...

ek kavi ek kavita ek achha stambh saabit hoga kyonki yatindraji chahe jitna meetha likhte hon likhte bari gambheerta se hain. pahle main samajhata tha keval ashok vajpeyiji ko hi kavita ko bachane ki chinta hai magar yatindraji ko parhkar aashvast hua ki ashokji apni muhim men akele nahin hain. mujhe bari betaabi se unke agle lekh ka intezaar hai.
prabhat ranjan

Dilip said...

बर्लिन की दीवार पढ़कर शायद मैं कविता की तह तक नहीं पहुँच पा रहा था. यहाँ मैं कविता को समग्रता में ग्रहण करने में अपने को अक्षम पा रहा था. ऐसे में यतींद्रजी की टिपण्णी ने मुझे कविता के सार और उधेश्य तक पहुँचाने में मदद की. इस टिपण्णी को कविता के सार-सन्दर्भ में सम्पूर्ण नहीं मान पा रहा हूँ. दूसरी कविताओं पर जब आगे लेखन सामने आएगा तो उसमें मेरी अपेक्षा उम्मीद है पूरी होगी.

Mahesh said...

केदार जी मेरे प्रिय कवि हैं. यह कविता मुझे भी बहुत पसंद है. इस कविता का जो पाठ यतींद्र ने किया है, वह संवेदनात्मक सूत्रों की सही परख करता है. पाठक के भीतर भी यह प्रश्न आकार लेता है कि आख़िर यह दीवार कब टूटेगी? मुझे यकीन है कि एक कवि एक कविता में हर बार ऐसा ही कुछ पढ़ने को मिलेगा. महेश दर्पण

Geet Chaturvedi said...

कविता तो अच्‍छी है ही, टिप्‍पणी भी बढि़या की है.

vidya said...

ek kavi ek kavita stambh men kedarji ki kavita ke bare men jo kuch likha gya hai wh apne laghu klewar men bhi kavita ke bhitar pathak ka praweh sugam bana deta hai.

Ratnesh said...

...आज के देश-देशांतर के रिश्तों की असलीयता बयां करती हुई ये कविता अपने आप में बेहद खूबसूरत पंक्तियों को अन्तर्निहित करती है..
...हम कहीं न कहीं अपने आपसी रिश्तों में दीवार खड़े करते जा रहे हैं, हमे इस दीवार को मिटाना होगा। हमे दीवार नही, हाथ बढ़ाना होगा ताकि हम रिश्ते ही नही अपने आप को भी कायम रख सकें।

ओम निश्‍चल said...

Yatindra ne ek achhi shuruaat ki hai. Kavita jis vyapak vision se likhi gayi hai, us par aalekh bhi utnna hi sargarbhit hai.yon to Tolstoy aur cycle--pura sangrah hi umda tatha kedar ji ki kavita ke ek bare mor kaa parichayak hai.--Om Nishchal