Sunday, June 15, 2008

कोठार से बीज : शमशेर

( इस स्तंभ के तहत हम उन रचनाओं/रचना-अंशों का प्रकाशन करेंगे जिनका बदलते युग संदर्भों में भी एक विशेष महत्व है। इसमें कोई भाषिक बंधन नहीं है। कोशिश हिन्दी और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं से लेकर सृजन की हर भाषा और विधा का यत्किंचित मूल्यवान सामने लाने की है। इसी कड़ी में पेश है हिन्दी के विलक्षण कवि शमशेर बहादुर सिंह की डायरियों के कुछ टुकड़े। इन टुकड़ों को उन्हीं की डायरीनुमा क्लैसिक कविता,''टूटी हुई बिखरी हुई'' नाम दिया है। इन्हें कई बरस पहले संभावना प्रकाशन ने, शमशेर के विरल संगतकार मलयज के संपादन में उनकी अन्य गद्य रचनाओं के साथ ही छापा था। )

टूटी हुई, बिखरी हुई

मेरे कमरे पर, इसकी चटाई और दीवारों और अख़बारों और कागज़ों और धूप और सायों पर जो एक मनहूस-सी दुखी रूह खामोश अपराधी की तरह बैठ गई थी...उसका चेहरा खिल कर सुबह के फूलों की तरह खालिस पवित्र खुशी से मुस्करा उठा और हर चीज - दीवार पर धूप और साए की नक्काशियाँ और किताबों और अख़बारों के ज़िन्दा बारीक इशारे और चटाई की बुनावट के तह-ब-तह खाने और मेरी जेबें और मेरे पायजामें और रूमाल और तह्बंद सब मिलकर एक बहुत पवित्र हलकी-फुलकी मुबारकबाद-सी मुझे देने लगे। मुझे यकीन हो गया कि मोहब्बत का जज़्बा हमेशा एक बहुत पाक हस्ती अपनी जगह पर है, और जिस सीने में वह जोरों से धड़कने लगता है, उसको आपसे-आप एक नई ज़िन्दगी बख्शता है।

आर्टिस्ट बच्चा ही होता है। यही उसकी कॉमेडी और यही उसकी ट्रेजडी है।


बादल गरजा, मुँह पर तौलिया या रूमाल रख कर ; ताकि लोगों को बुरा न मालूम हो।
शरीफ़ बादल। बारिश ने ज़ोर ज़रा-सा - बस, ज़रा - और बढ़ा दिया। जैसे भाषण देने वाला एक खास पॉइंट पर पहुँच कर मौज में आकर करता है। जैसे बारिश ने अच्छी-सी चाय पी ली हो और अब देर तक जागने के लिए तैयार हो।

शाम सेंदुर या गेरू या टेसू के रंग से धुली हुई शाम यानि शाम के बादल। बादलों का एक लंबा ढाल। हलकी ढलुवां हंसती हुई पहाड़ी - और हँसता हुआ खुश-खुश कुछ गहरा-सा ऊदा नीला आसमान।

नभ की सीपी जो रात्रि की कालिमा में पड़ी थी, धीरे-धीरे ऊषा की कोमल लहरों में धुलती और निखरती जा रही है।

तसवीर अपनी ग़लत तो नहीं। शायद कि ग़लत है। मैं कोई बेहद शरीफ़, बेहद सच्चा, अच्छा इन्सान तो नहीं। न ईश्वर को ही उस तौर से मानता हूँ , मगर मध्यम वर्ग का ईश्वर मेरा भी है, भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी का ईश्वर : वही शायद कहीं मेरी-तुम्हारी सीमाएं करीबतरीन करता है। अगर्चे वह एक खामोशी, एक प्रार्थना का सुकून है जो चुपचाप मुझे वहाँ बाँध-सा देता है। अगर्चे कोई चीज़ बज़ाहिर मुझे बांधती नहीं : सिवाय शायद कला की सच्चाई के। ज़िंदगी को मैं शायद उसी के सहारे, उसी की परतों में टटोलता, समझता, झेलता चला आ रहा हूँ। ज्यों-त्यों। बहरकैफ़।

20 comments:

Geet Chaturvedi said...

शमशेरियत है ये. ख़ूबसूरत गद्य.

sanjay patel said...

क्या ख़ूबसूरत कलेवर है भाषा का.
शमशेर सिंह जी ने हिन्दी में उर्दू को जिस तरह गिरह किया वह कहीं भीतर तक उतर जाता है मन में...साधुवाद अनुराग भाई..आपके ब्लॉग पर आता रहूँगा.

Ashok Pande said...

लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी
फिर फूल में लग जा ...

अच्छी प्रस्तुति है भाई अनुराग! धन्यवाद!

prabhatranjan said...

bahut achhi shuruat hai anuragji. keep it up.
prabhat ranjan

शायदा said...

अच्‍छा लगा आपका ब्‍लॉग। आज की पोस्‍ट के अलावा पिछला भी सब पढ़ा। बहुत अलग सा है सबकुछ यहां। बढि़या।

poonam said...

tootan or bikhrav dono hi sunder hain. anurag ko bhi isse behad khoobsurti ke sath apne blog par sahejne ke liye sadhuvaad. achcha laga apke blog par aakar.

Pratyaksha said...

अब आते रहेंगे ....

P said...

जैसे बारिश ने अच्छी सी चाय पी ली हो..अपने आसपास के साथ की गई यह भाषाई कारीगरी क्या खूब है!जिस शिद्दत और कसक के साथ ये अनुभूतियां अभिव्यक्त हुई हैं, वे भाषा को नए बिम्बों और रूपकों से समर्थ कर रही हैं.. खूबसूरत प्रस्तुति.. पुरुषोत्तम नवीन

ravindra said...

आपके ब्लॉग पर कुछ प्यारी चीजें हैं। जैसे शमशेर का गद्य या रिल्के पर राजी। राजी सेठ ने रिल्के के पत्रों का इतना लाजवाब अनुवाद किया कि मैं लगभग मंत्रमुग्ध-सा उसे एक बैठक में पढ़ गया था। और फिर कुछ-कुछ टुकड़े बार-बार पढ़ता रहा हूं। उसके बाद मैंने राजी सेठ के कहानी संग्रह पढ़े क्योंकि इसके पहले मैंने उनका एक उपन्यास तत्सम ही पढ़ा था। बहरहाल, हिंदी की रचनात्मकता से संपन्न-समृद्ध इस ब्लॉग के लिए बधाई। रवींद्र् व्यास, इंदौर

Ratnesh said...

सबद को एक नया अर्थ प्रदान करता यह स्तंभ बहुत बढ़िया है

Nandini said...

बहुत ही अच्‍छा ब्‍लाग है...
आना होता रहेगा यहां तलक अब अपना...
बहुत अच्‍छी सामग्री है....
बधाई

katyayani said...

Tuti hui, bhikhri hui...par kitni nikhri hui
Ye kavita si diary maza de gayi...

Mahesh said...

only shamsherji can write this type of diary. the truth of art is always on the top for him.

sunsunny said...

behtreen..kya khoob andaje bayan hai..badal ko shareef likhna to toooo much tha..

vandana said...

yh nhi maloom tha ki shamsherji ne itne ache gadya ke tukde bhi likhe hain jo prabhaw men unki kavita se ktai kmtar nhi.sabad ke is stambh ka aage bhi intzaar rahega.shubhkamnayen.

Dilip said...

logon se suna, kahate hue-Shamsherji. Maine bhi isi tarah unka nam lena chaha. Lekin is tarah unka nam le nahin paya.Lekin Kala ki sachchai ki paraton men dhansne laga, jaise-jaise "tooti hui, bikhari hui" men sanwarne laga. Apani bachpana par hamesha jhunjhalata aur khud ko kosata rahta. Sambal mila. Mujhe ek-ek bat bandhane lagi aur har shabd me atit ki jhalak pate hue jeene laga. Darasal main puri tarah tarotaja hone laga. Khud se jitni shikayaten thi mitne lagi. Lagne laga kuchh is tarah aur tatolne laga, man ko samjhane laga.

aalekh said...

shamsherji ke gadya se shuru kr aapne yh umeed jaga di hai ki is stambh ke tahat jo bhi chapega use padhu.yh vhayan bahut acha tha.shamsher ki in diariyon ki traf ashok wajpei ne kai baar dhyan dilaya hai.aapne to padhwa hi diya.

saleel wagh said...

लालिमा से मढ़ गया है राग
घिर गया है समय का रथ कहीं
*
*
*
*
ज़माने भर का इस कदर कोई अपना न हो जाएँ
की अपनी जिंदगी खुद आप को बेगाना हो जाएँ
.. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. ..
इधर मै हूँ उधर मैं हूँ अजल तू बीच मे क्या है
फकत इक नाम है वह नाम भी धोखा न हो जाएँ

mahendra said...

ज़माने भर का इस कदर कोई अपना न हो जाएँ
की अपनी जिंदगी खुद आप को बेगाना हो जाएyh nhi maloom tha ki shamsherji ne itne ache gadya ke tukde bhi likhe hain jo prabhaw men unki kavita se ktai kmtar nhi.sabad ke is stambh ka aage bhi intzaar rahega बहुत ही अच्‍छा ब्‍लाग है...
आना होता रहेगा यहां तलक अब अपना...
बहुत अच्‍छी सामग्री है....
बधाईलव इन द टाइम...
फिर भी कुछ लोग
सबद निरंतर
द रेड बलून
कवि का अकेलापन
मारियो और मासिमो
पहली किताब
शम'अ हर रंग में
और भी ग़म हैं
वाजश्रवा के बहाने
मेरे युवजन मेरे परिजन
हिन्दोस्तां हमारा
देवप्रिया
शहरजाद के नाम mahesh

Priyankar said...

"वो अपनों की बातें,वो अपनों की खू-बू
हमारी ही हिन्दी हमारी ही उर्दू ।"

हिंदुस्तानी शमशेरियत ज़िंदाबाद !