Thursday, June 12, 2008

रिल्के पर एक बढ़त : गिरिराज किराडू

( कुछ दिनों पहले सबद में जर्मन कवि राइनर मारिया रिल्के पर राजी सेठ का लेख छपा था। इस प्रकाशन से युवा कवि और प्रतिलिपि के सम्पादक गिरिराज किराडू को रिल्के पर लिखी अपनी एक रचना की याद हो आई और उन्होंने तत्परता से उसे प्रकाशन के लिए हमें भेज दिया। सबद उनका स्वागत करता है। रचनाओं का ऐसा सखा पाठ बहुत महत्वपूर्ण है। लेखकों की इस पहल का हम खुले मन से स्वागत करेंगे। )

रिल्के का कृति जीवन - विलाप एक मित्र के लिए

गिरिराज किराडू*

और ठीक इसी छवि में मैंने तुम्हे पाया है सदैव--आईने के भीतर,
बहुत भीतर जहाँ तुम स्वयं को रखती हो--इस संसार से दूर, बहुत दूर

फ़िर क्यूं आई हो ऐसे अपने आप को मिथ्या करते हुए,
फ़िर क्यूं मुझे विश्वास दिलाना चाहती हो कि
जो पंख तुमने पहने थे अपनी आत्मछवि में उनमें वो थकान थी
जो नहीं हो सकती अपने आईने के शांत, मंद्र आकाश में ?

फ़िर क्यूं ऐसे खड़ी हो कि अपशकुन मंडराता दिखे मुझे तुम्हारे सिर पे,
फ़िर क्यूं अपनी आत्मा के अक्षरों को ऐसे पढ़ रही हो जैसे कोई पढ़ रहा हो हाथ की रेखाओं को
यूँ कि मैं भी न पढ़ पाऊँ उन्हें तुम्हारी नियति के सिवा किसी और तरह से ?

और इससे भयभीत न रहो कि मैं अब समझता हूँ इसे--तुम्हारी नियति को,
यह मुझमें व्याप रही है; कोशिश कर रहा हूँ इसे जकड़ने की,
मुझे जकड़ना ही होगा इसे चाहे मैं मर जाऊं अपने ही पाश में,
जैसे कोई नेत्रहीन महसूस करता है वस्तुओं को वैसे महसूस करता हूँ तुम्हारी नियति,
भले इसे कोई नाम नहीं दे पा रहा मैं

आओ विलाप करें इसका कि किसी ने खींच लिया है तुम्हे तुम्हारे आईने की गहराइयों से,
बाहर आओ विलाप करें एक साथ ....एक साथ...पर क्या तुम रो सकती हो अब भी?

नहीं मैं देख सकता हूँ--तुम नहीं रो सकती, अब तुमने अपने आँसुओं के सत को बदल लिया है
इस उदास, घूरती , भरी पूरी नज़र में; नहीं, तुम नहीं रो सकती अब

आओ विलाप करें--एक साथ, मिल कर

क्या तुम जानती हो कैसे अनमने ढंग से, अनिच्छा से लौटा तुम्हारा रक्त तुम्हारे भीतर
अपने अतुल प्रवाह से बिछडकर जब तुमने पुकारा उसे लौटने के लिए?

कितना शंकित था वह--तुम्हारा रक्त--फ़िर से संकरे गलियारों में लौटते हुए,
कैसी हैरानी, कैसे अविश्वास से लौटता हुआ भीतर, अपने घर और वहीं पूरा हो गया

पर तुमने धकेला उसे फ़िर से आगे की तरफ़, घसीटा उसे--अपने रक्त को, वेदी की ओर
जैसे घसीटता कोई कातर पशु को बलि के लिए

यही चाहती थी तुम तुम्हे खुशी चाहिए थी--किसी भी तरह, यह सब करके भी

और अंततः तुमने उसे बाध्य कर ही लिया--अपने रक्त को, और वह भी प्रसन्न हो गया,
दौड़ने लगा और समर्पण कर दिया तुम्हारे सम्मुख

* मैंने २००५ की गर्मियों में, 'उन गर्मियों में' इसे लिखा था। अंशतः यह अनुवाद है, अंशतः प्रेरणा,
अंशतः सह अनुभूति की उस कविता के साथ जिस पर यह आलम्बित है।

4 comments:

prabhatranjan said...

giriraj,
aapki kavita parhkar dilli ki is umas men man geela-geela ho aaya. bare dinon ke baad apne priya durlabh kavi ki kavita parhne ko mili. aasha hai is virtual duniya men aapse mulakat hoti rahegi.
prabhatranja@gmail.com

jasvir saurana said...

bhut hi aachi.

Geet Chaturvedi said...

अच्‍छी अनुभूति है.

Ratnesh said...

Really very heartful poem. I appreciate the Poet. I expect, I would be able to learn more about his poetry.
Ratnesh