Monday, June 09, 2008

अनकहा कुछ : शेक्सपियर

( वादे के मुताबिक हम अपना दूसरा स्तम्भ शुरू कर रहे हैं। इसे युवा कहानीकार प्रभात रंजन ने हमारे आग्रह पर लिखना स्वीकार किया है। अनकहा कुछ नामक यह स्तम्भ उन अप्रतिम रचनाकारों पर एकाग्र है जिनके लेखन के अलावा जीवन में भी हमारी गहरी और असमाप्य दिलचस्पी रही है। इसके लिए हमें इन लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकों, आत्मकथा, डायरी, पत्र, संस्मरण और इनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर उपलब्ध सुशोधित पुस्तकों को प्रमाणिक आधार बनाना उपयुक्त लगा ताकि बातें वस्तुनिष्ठ हों और लेखन महत्व का बने। आगे तो आप ही तय करेंगे कि हम अपने प्रयासों में कितने सफल रहे। यह जरूर है कि शुरू करने के लिए हमें शेक्सपियर से बेहतर कोई दूसरा लेखक न मिला। )

शेक्सपियर के इर्द-गिर्द

प्रभात रंजन

बोर्खेज कि एक कहानी है जिसमें मृत्यु के बाद शेक्सपियर से जब यह पूछा जाता है कि तुम कौन हो, तो जवाब में शेक्सपियर कहते हैं कि इसी प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयत्न तो मैं जीवन भर करता रहा। मेकबेथ, जुलियस सीजर, हैमलेट जैसे अनेक पात्र गढ़ता रहा। इसके बावजूद मैं जीवन भर यह नहीं समझ पाया कि मैं कौन हूँ। विलियम शेक्सपियर सचमुच अंग्रेजी के ऐसे लेखक हैं जिनके जीवन और कृतित्व को समझने के जितने प्रयास आज भी हो रहे हैं, उतने शायद ही किसी अन्य लेखक को लेकर किए गए हों। शेक्सपियर क्वार्टरली जर्नल के मुताबिक हर वर्ष पुस्तकों, लेखों और शोध निबंधों की शक्ल में शेक्सपियर से संबंधित चार हजार महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाश में आती हैं।

क्रम में इधर छ्प कर आई अमेरिकी-ब्रिटिश लेखक बिल ब्रायसन की पुस्तक शेक्सपियर: द वर्ल्ड एज स्टेज में शेक्सपियर के जीवन, उनके कृतित्व से जुड़े तथ्यों और उनके बारे में फैले तमाम भ्रमों की रोचक प्रस्तुति एक महत्व का प्रकाशन है। लेखक ने पुस्तक के पहले अध्याय में ही पाठक के मन में उठनेवाले इस सहज प्रश्न का उत्तर दे दिया है कि शेक्सपियर पर उपलब्ध प्रचुर सामग्री के बावजूद वह यह पुस्तक क्यों लिख रहा है। ब्रायसन का उद्देश्य महज इतना है कि इन प्रचुर सामग्रियों के आधार पर मिथक में तब्दील होते जा रहे इस लेखक की बिलाखिर छवि कैसी बनती है ।

बहुत कुछ मध्यकालीन संत-कविओं की तरह लगभग दस लाख शब्दों का साहित्य पीछे छोड़ने वाले अंग्रेजी के इस महानतम नाटककार विलियम शेक्सपियर के जीवन और लेखन से संबंधित प्रमाणिक साक्ष्य कम ही मौजूद हैं। ब्रायसन की मानें तो लंदन में बसने और मशहूर नाटककार होने से पूर्व उनके जीवन के बारे में इतिहास में केवल चार प्रमाणिक साक्ष्य मिलते हैं - बचपन में हुए बपतिस्मा के अलावा विवाह और दो बच्चों के जन्म इसका भी कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं मिलता कि वे देखने में कैसे लगते थे। इसी कारण समय-समय पर यह प्रमाणित किए जाने के प्रयास भी किए जाते रहे कि विलियम शेक्सपियर के नाम से इंग्लैंड के स्ट्रेटफोर्ड कसबे के जिस व्यक्ति को जाना जाता रहा है, वह वास्तव में उन महान नाटकों का रचयिता था ही नहीं।

हाल ही में एक शोध सामने आया है जिसके अनुसार शेक्सपियर के छद्म नाम से एक यहूदी महिला गुप्त रूप से लिखती थी। उसके छद्म नाम से लिखने का कारण यह था कि एलिजाबेथकालीन लंदन में कोई महिला अपने नाम से रचना प्रकाशित नहीं करवा सकती थी। ब्रायसन की पुस्तक इस तथ्य को भी सामने लाती है कि ऐसा माननेवालों की एक लम्बी परम्परा रही है कि विलियम शेक्सपियर के नाम से प्रचलित नाटक वास्तव में उन्होंने नहीं किसी और ने लिखे हैं। सिर्फ़ इस बात को सिद्ध करने के लिए अब तक पाँचेक हजार पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं।

इस तरह के विवादों कि शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हुई। सबसे पहले यह कहा गया कि इन नाटकों के असल लेखक फ्रांसिस बेकन थे। अनेक विद्वानों का यह मानना था कि शेक्सपियर की रचनाओं में कुछ गुप्त कोड छिपे हैं जिनके माध्यम से उसके वास्तविक लेखक का पता लगया जा सकता है। लेकिन जैसा कि शेक्सपियर के विद्वान जोनाथन बेट ने लिखा है कि न तो शेक्सपियर के जीवन काल में, न ही उसकी मृत्यु के करीब दो सौ साल बाद तक किसी ने उसकी लेखकीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया।

शेक्सपियर का जीवन ही नहीं, उनके नाटकों को भी ब्रायसन ने उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर परखने का प्रयास किया है। शेक्सपियर को भले अंग्रेजी भाषा की महान प्रतिभाओं में गिना जाता हो, पर अंग्रेजी में इस विषय पर पर्याप्त शोध हुए हैं कि उनकी भाषा कितनी त्रुटिपूर्ण थी। यह भी कहा जाता है कि अपने नाटकों के लिए उन्होंने पहले से प्रचलित कथाओं को ही आधार बनया। ब्रायसन ने उनके नाटकों से जुड़े कथा-संदर्भों की ओर इशारा करते हुए यह बताया है कि अ मिडसमरनाइट्स ड्रीम, लव्स लेबर इज लॉस्ट, द टेमपेस्ट जैसी कुछ कॉमेडी ही उनकी मौलिक रचनाएँ कही जा सकती हैं।

बातें हजार हैं, पर सचाई यह है कि एक महान लेखक किसी स्थानीय कथा को विराट संदर्भों से जोड़ कर उसे एक अविस्मरणीय कृति में बदल देता है। अंग्रेजी भाषा में शेक्सपियर ने यही काम किया। उनकी भाषा के भ्रष्ट होने के सम्बन्ध में चाहे कितने प्रमाण पेश किए जाएं, यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने अंग्रेजी को दो हजार से अधिक शब्दों और सैंकडों मुहावरों का अनुपम उपहार दिया। जब तक मनुष्य जीवन है, उसमें त्रासदी और कॉमेडी की गुंजाइश है, तब तक मिथ में बदलते रहने के बावजूद हम शेक्सपियर का अपने इर्द-गिर्द होना महसूस करते रहेंगे।

10 comments:

Administradora said...

achha lekh hai

Tushar Dhawal Singh said...

बड़ा रोचक लेख लगा . जाने कहाँ कहाँ गोता लगा कर आप ये मोती चुन कर लाते हैं. आपके लेखन का सहज प्रवाह इसे आपकी कहानियो जैसा ही असरदार बना गया . प्रभात जी आपको बहुत बहुत बधाई . अनुराग इस नए स्तम्भ की परिकल्पना के लिए आपको भी बधाई.
तुषार धवल

धर्मेंद्र सुशांत said...

प्रभात जी का स्वागत है. वह काफी पढाकू हैं और उतने ही अच्छे से अपनी जानकारी दूसरों तक पहुंचाते हैं. इसलिए हमे उम्मीद है की अब हमे कई नई चीजें पढ़ने-जानने को मिलेंगी. शेक्सपियर के बारे में उन्होंने बड़ी रोचक जानकारी दी है. शेक्सपियर के होने न होने का विवाद इतिहासकारों के लिए तथ्यात्मक महत्व रखता है लेकिन वास्तव में यह एक महान रचनाकार की अमरता के आरोहन का वृतांत है. प्रभात जी ने इस वृतांत को कुशल किस्सागो की तरह कहा है जो वह हैं भी.

vidya said...

sabse jyada jroori hai wh rachna sansaar jo shakespere ne hamare liye srijit kiya hai. ismen hum apne hone ko kai trah se mahsooste hain. achraj nahi hua jaan kr ki is wilakshan pratibha pr itne wiwaad hue aur ho rahe hain.

Geet Chaturvedi said...

शेक्‍सपियर के साथ तो ऐसे मामले चल ही रहे हैं, और उनकी बहुत चर्चा भी होती है. उनके महिला होने वाले कि़स्‍से ने तो इधर बहुत मनोरंजन किया है.

पिछले दिनों ऐसी ही कोई रिसर्च फ्रांत्‍स काफ़्का के बारे में आई थी. उनकी मशहूर लंबी कहानी है 'मेटामॉर्फासिस', जिसमें मुख्‍य किरदार को एक सुबह जागने के बाद पता चलता है कि वह एक अजीबोग़रीब कीड़े में बदल गया है. विश्‍व साहित्‍य की अनमोल निधि है यह कहानी. पिछले दिनों योरप में हल्‍ला मच गया कि यह एक सच्‍ची कहानी थी, काफ़्का के पड़ोसी के साथ ऐसा ही हुआ था, काफ़्का ने उसकी कहानी बनाकर लिखी और कहा कि काल्‍पनिक कहानी है. लोग काफ़्का को 'झूठा' कहने में लगे रहे. मोटा-मोटी कुछ ऐसी ही बातें चलती रहीं. कुछेक विदेशी अख़बारों में इन पर लेख पढ़ने को मिले.

ऐसे रिसर्च अक्‍सर लेखक की रचना और प्रतिभा से अलग हटकर बातें करते हैं. ख़ैर.

प्रभात ने अच्‍छा लिखा है. जारी रहें आप लोग. शुभकामनाएं.

heena said...

lafzo ka zyada istmal mujhe atta nahi saf lafzo maie yahe lik sakti hoh accha article hai informative and educative keep going...

Ratnesh said...

अब तक तो मैंने शेक्सपियर को अंग्रेजी भाष मे पढा था, हिन्दी मे पहली बार इतना रोचक लेख इस ब्लाग के माध्यम से पढ़ रहा हूँ...

गिरिराज किराडू/Giriraj Kiradoo said...

Anurag:
Its a nice, decent beginning. And as we know nice, decent and serious things are not very common in Hindi blogging.

Also nice to see two of my friends here. Yatindra I talked to this afternoon but Prabhat's no. I have lost. Plz redirect him to www.pratilipi.in. Its a biligual e-mag that I edit.

You also visit and see in what way you could be on Pratilipi? Sorry, I have read nothing of yours except these posts.

Take care,

giriraj kiradoo

kshitish said...

prabhat ranjan is my class fellow.he is simply brillant from the student life.In this article he has presented great writer and dramatist in a very different context via bill bryson book shakespere: the world is stage.there is no doubt that he created masterpiece in the field of literature. thanks to prabhat for giving us new level of thought.

rakesh said...

rachnayein hain to comments hain. shakespere kya the kaise the isase koi fark nahin padata. aaj english global language hai to shakespere ki badaulat jaise devaki nandan khatri ne logon ko hindi sikhane ke liye prerit kiya.
rakesh patel