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नए कवि....तुषार धवल की लम्बी कविता

( कविता में लंबे समय से गृहस्त तुषार धवल स्वाभाविक संकोच और शिथिलता के कारण छपने से ज्यादा छुपते रहे। लेकिन देर से ही सही, जब उनकी कविताएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के माधयम से पाठकों तक पहुँचने लगीं तो एक नए कवि के विषय-वस्तु की रेंज और उस पर उसकी आमूल पकड़ से कुछ अचम्भा ही हुआ। वह शायद इसलिए भी क्योंकि नए कविओं में अधिकतर के पास हरी घास की दूब नहीं, ठूठ थी जिसे वे कविता में रोपने की बेजां कोशिश अब तक कर रहे हैं। तुषार की कविताएं इससे इतर इस अजनबी दौर में मर्माहत मनुष्यता को चिह्न-बुन रही है। उसमें सामने के समय का मोहक आवरण भेदने की दृष्टि और उसे महीन व्यंग्य में व्यक्त करने की सलाहियत है। अनर्जित चीख और गुस्से से उसे गुरेज है। साथ ही वह कोई अवलेह बन जाने की हसरत भी नहीं पालती, ताकि मर्ज़ का इलाज हो सके। उसकी सबसे बड़ी आकांक्षा पाठकों में उस विवेक को उदबुध करने की ही रही है जिससे उनके भीतर मानुस होने का अहसास मुसलसल बना रहे। सबद नए कवि की अपनी सीरीज तुषार धवल से शुरू करने जा रहा है। पत्रिकाओं में तुषार की जो कविताएं अब तक सामने आई हैं, उससे कुछ भिन्न आकार-प्रकार की,''तुम्हें फांसी नहीं होगी'' शीर्षक यह लम्बी कविता उम्मीद है आपको पसंद आएगी। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइएगा....)


तुम्हें फांसी नहीं होगी

मेरी खिड़की पर चिपके हुए हैं
मांस के लोथडे
हवा में जली हुई लाश उड़ रही है
दीवारों पर सूख गई है लहू की धार
कल शाम फिर बम फटा था बाज़ार में
कल शाम फिर एक चाल थी बिसात पर
हंसती हुई कई दुनिया
शिनाख्त में बेपहचान पाई गई
कौन मर गया ?
होगा कोई
अब मुआवजों की काली छाया
हू हू कर नंगा नाचेगी
यह ऐलनों का दौर है
बेहतर है हम मसरूफ रहें

तफ्तीश तबादले जिरह
कई कई अध्याय हैं रंगमंच पर
कोई सिर धुनेगा
बटोरेगा वाहवाही
जालसाजी
जालसाजी

यह लीला है महामानवों की
कुर्सियाँ भयानक मुखौटे लगा कर
सड़कों पर चलती हैं
आतंक का तुम्हारा चेहरा
उसी की आंत से उपजा है
निश्चिंत रहो
तुम्हें फांसी नहीं होगी

2
एक दंगल है
जो चलता ही रहता है
एक जंगल है
जो जलता ही रहता है
हमारे घर उसी में थे
हम बया हैं
हम बकरियाँ हैं
इससे ज्यादा हमें क्या चाहिए
नारे कोई भी रहे
सिर्फ़ हम ही हम उजड़े
तुम्हीं हांकते
हलाल करते हो
हमारे लहू से ही
अंगडाई ले उठता है तुम्हारा ताज

भले ही तुमने
हज़ार हत्याएं की हों
तुम दुलारे तंत्र के
तुम्हें फांसी नहीं होगी
3
एक छत चूती हुई बताई गई थी
तुम उस सुराख से
आकाश ताड़ गए
नंगी हमारी पीठ को झुकाया
सजदे के बहाने
लाद कर नंगों पर नंगी पीठों को
सीढियां आजमाई हुई चढ़ गए
सीढियों के स्मारक बने हैं
सुंदर सुनहरे
देख कर भी नहीं देखा किसी ने
वहाँ हमारे ढेर दफन हैं

बादशाहत में हाथ काटे गए
लोकतंत्र में सिर
धडों की यह आबादी
तुम्हारी व्यक्तिगत क्रांतियों में
कच्चा माल बनी हुई हैं

ये शीशों के टुकड़े
ये आईने लहू के
हमारी काली हथेलियों पर उग रहे हैं

तब तक तुम हंस सकते हो
तब तक
तुम्हें फांसी नहीं होगी

( कवि का पहला संग्रह ''पहर यह बेपहर का'' नाम से राजकमल प्रकाशन द्वारा शीघ्र प्रकाश्य )

10 comments:

aatankvadi ghatnayen aur fir muaavjon ka daur rajniti ki sanche -khanche me banti es jugalbandi pr kvi marmahat hai.es estithi me tushar dhaval ki rachana vyang karti hai ki tumhe fansi nhi hogi
Es kvita ko padhte hue Nida fazli sahab ki najm jehan me tair gai,jisme dangon ke dauran ea vidhva maa ke char bete jla diye jaten hain.
dhaval ji ki rachna apne samay ka mukkmal byan hai.
kvita bahut achhi lgi, dhaval ji ko badhai.


कवि की पहली रचना ने आतंक के विद्रूप चेहरे को सामने रखा है. बधाई


दिल को और दिमाग को दुरुस्त करनेवाली कविता है. इसमे आज के समय का सच प्रकट है. कवि को भविष्य की ढेर साडी शुभकामनाएं!


jio tushar bhaee...
tumhara lahja bhi kitna marmsparshi hai


tusharji ki kavitaon ka mai purana pathak raha hoon.sampadakji ne apni tippani men sahi rekhankit kiya hai kavi ke paas apna lahja hai, kahne ki betaabi hai aur ek passion jo aajkal zyadatar kaviyon men missing dikhta hai.waise is kavita ke liye anuragji badhaai ke patra hain jo unhone is alakshit kavi ko pahchana aur hindi internet ki duniya men itna achha taaruf karwaya.
ek baar phir badhaai
prabhat ranjan


ek ache kavi se milwane ke liye shukriya. tushar men sambhawnayen dikhti hain. bs is kavita ki laudness thoda khtakti hai.


bahut khuub...baat dil tak pahunchti hai...badhaayi


आप उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं. बधाई.

रूपसिंह चन्देल


दिमाग को झकझोर करने वाली कविता। दिल के पास आकर कुछ कह जाती हैं।
तब तक तुम हंस सकते हो
तब तक
तुम्हें फांसी नहीं होगी
वाह बहुत खूब।


दरिंदगी व मानवता के बीच संघर्ष का खेल नाना विध रूपों में सृष्टि के आरंभ से ही चल रहा है। हर पक्ष अपनी सुविधा के अनुसार उसे देखता-गुनता है। तुषार ने जिन भावों को शब्दों में रेखांकित किया है, वे शाश्वत जीवन मूल्यों की ओर संकेत तो करते ही हैं, भयावह परिस्थितियों का भी निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने वालों का पर्दाफ़ाश भी करते हैं। एक सराहनीय प्रयास जिसके लिए साधुवाद। ब्रह्म प्रकाश गौड़


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