Tuesday, May 20, 2008

शहरजाद के नाम

इंतज़ार हुसैन भारतीय उपमहाद्वीप और उर्दू के सबसे बड़े कथाकारों में से एक हैं। उनके फन से हर सजग पाठक गहरे मुत्तासिर है। हुसैन का विपुल लेखन हिन्दी में अनूदित होकर समय-समय पर सामने आता रहा है। इस कड़ी में उनके उपन्यास ''बस्ती'' की बरबस याद आती है जिसे कॉलेज के दिनों में पहली बार पढ़ा था और उसके जादुई असर में हम साथी अर्से तक रहे थे। हुसैन के साथ और समानांतर कथा-साहित्य में बहुत से बदलाव आए। फिर भी उन्होंने अपने को साधे रख कर वह सिरजा जो चिरस्थाई है। उनके पाठकों के लिए उनके गद्य के आस्वाद का एक और अवसर वाणी प्रकाशन ने मुहैया कराया है। खुर्शीद आलम द्वारा ''शहरजाद के नाम'' शीर्षक से उनकी डेढ़ दर्ज़न कहानियों के इस अनूदित संग्रह से गुजरते हुए उनकी ही कही एक उक्ति दुहराने का मन करता है : ''ग़ालिब ने अपने पत्रों में कहीं कहा है कि शायर की इंतहा यह है कि फिरादौसी बन जाए। मेरे हिसाब से कहानीकार की इंतहा यह है कि शहरजाद बन जाए''। बिला शक वे इस इंतहा तक पहुँच सके हैं। वे हमारे शहरजाद हैं। इसलिए उन्हें सुनिए। उनके यहाँ इस तुमुल कोलाहल में भी कहने के लिए जिंदा रूहों के किस्से हैं। लगते वे अलिफ लैला के किस्सागो हैं, लेकिन उसकी परतें इतनी ज्यादा हैं कि हर बार गौर करने पर कुछ न कुछ अनदेखा-अलक्षित ही कौंधता है।
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1 comment:

om kabir said...

इंतजार हुसैन ने पाकिस्तान के साहित्य को एक दिशा दी है। खासकर विभाजन के बाद जब पाकिस्तान का साहित्य भी विभाजित हो गया था। और उसे एक इतिहास के साथ-साथ भविष्य की भी रूपरेखा तैयार करनी थी। उस समय इंतजार जैसे कहानीकारों ने इस विभाजन के दंश से निकालकर उसे एक मंच प्रदान किया।