Tuesday, May 20, 2008

रंग तेंडुलकर की क्षति !

एक उदास ख़बर यह है कि प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंडुलकर का 19मई को निधन हो गया। तेंदुलकर को उनके नाटकों ''खामोश अदालत जारी है'' ''घासीराम कोतवाल'' ''गिधाडे'' ''कमला''आदि के लिए जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखीं। तेंडुलकर ने मराठी रंगमंच को उसके परंपरागत और ठस रूपबंध से उबार कर बदलते वक़्त से जोड़ा। इसके लिए उन्होंने जो रंगयुक्ति अपनाई वह अप्रत्याशित और विवादास्पद थी। ''गिधाडे'' के बारे में अभिनेता डॉक्टर श्रीराम लागू ने लिखा है : ''सेंसर बोर्ड से नाटक पास हो गया था, पर उसमें करीब डेढ़ सौ आपत्तिजनक शब्दों को हटाने को कहा गया था। रूढ़ अर्थ में जिसे गालियां कहते हैं वे नाटक में बहुत थीं, लेकिन वह गिद्धों की भाषा थी- सुसंस्कृत मानव की नहीं। उन्हें उसी भाषा में बोलना चाहिए। शहरी, सभ्य भाषा में बोलते तो वे गिद्ध नहीं लगते। मनुष्य में गिद्धत्व को प्रखरता से वास्तविक धरातल लाने में इस नाटक की भाषा का बहुत बड़ा योगदान है।'' इस एक टिप्पणी से तेंडुलकर के नाटकों का मिजाज़ समझा जा सकता है। यह भी स्पस्ट होता है कि वे कितने सधे हाथों अपने वक्त की नब्ज टटोल रहे थे। यह जोड़ना ज़रूरी है कि वे उन कम नाटककारों में भी थे जिनकी अपनी भाषा में जितनी ख्याति थी उतनी ही अन्य भाषाओं में सम्मान। उनका जाना इसीलिए अखिल भारतीय स्तर पर रंगपट को कुछ सुना और उदास कर गया है। रंग तेंडुलकर की कमी हमेशा खलेगी। सबद की ओर से उनको नमन!

5 comments:

bhashkar said...

भारतीय रंगमंच की दुिनया में िवजय तेंडूलकर का न हाेना एक अधूरेपन का एहसास िदलाता है जनमानस के करीबी िवजय काे अब िफर से जनमानस के करीब ले जाना हाेगा तािक बहुत से मसलाें पर नइ राेशानी पड सके

Ritesh Purohit said...

mein vijay tendulkar ke baare me jyada nahi jaanta tha. aapke lekh se unke baare me kuch jaankari mili. thanks

vidya said...

tendultar atyant mahtwpurn lekhak the jinke na hone se rangmach ki duniya men ek bada shunya paida ho gya hai.

Abem said...

tendulkar ka nidhan appurniya kshati hai!

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

श्रीराम लागू की टिप्पणी वाकई तेंदुलकर जी के नाटकों मिजाज समझने के लिए पर्याप्त है..! आभार..!