Skip to main content

शम'अ हर रंग में


वैद की डायरी में वैद हैं। हर रंग में। जलते-सुलगते। बेलिहाज रोशनी में अपने को टटोलते। अपने लेखन के प्रति समर्पित और शंकालुलेखकों, किताबों, कलाओं और कलाकारों के प्रति सदय और कभी-कभार सख्त भी। विवरणों में बेहद नपे-तुले। जिक्र अपना हो या दूसरों का, वह अटपटे और आत्ममुग्ध प्रसंगों से परे है। उर्दू कविओं की तरह बात को एक बहर में कहने का सलीका उन्हें खूब आता है। उनका यह विलक्षण गद्य-गुण उनकी पहली औपन्यासिक कृति,''उसका बचपन'' से ही ज़ाहिर हो गया था। इन पचास वर्षों में भी उसकी काव्यात्मक अन्विति और प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है। बहुत सफलतापूर्वक उन्होंने निर्भीक औपन्यासिक प्रयोग किए और हिन्दी नाटकों को वैसी नाट्य कृतियाँ दी जो उसके सुदीर्घ विकास में अनहुआ थीं। तीन बरस पहले जब उनकी पहली डायरी,''ख़्वाब है दीवाने का'' छप कर आई तब यह भी साफ हो गया कि इस विधा में भी वैद लगा-बंधा न लिखकर वह दर्ज कर रहे हैं जिसकी ज़द्दोजहद में एक लेखक ताउम्र रहता है। यूं यह उनके लंबे अमरीकी प्रवास की डायरी है और इसे उनके हालिया प्रकाशित दूसरी डायरी,''शम'अ हर रंग में'' से मिला कर पढ़ें तो यहाँ-वहाँ के कूल-किनारों पर तिरता वैद का एक टुकड़ा जीवन और लेखन के अन्तःसूत्र आसानी से मिल सकते हैं। यहाँ दर्ज लंबे पर महत्वपूर्ण रचना-प्रसंग वैद में प्रवेश के द्वार हैं। खामोश और संजीदा दिखते वैद ने अपने मन को इस 'इन्द्राज' (डायरिओं को दिया उनका पुकारू नाम) से जितनी ईमानदारी से बांटा है, उससे वह पहले से कहीं ज्यादा वेध्य ही नहीं, बोध्य भी हो चले हैं। उन पर आलोचकों ने हद बचकानी टीपें की हैं। वे अगर इन बेहद के मैदानों में घूम-घाम आने की जहमत उठाते तो उनमें निश्चय ही कुछ सयानापन आ गया होता, अस्तु...

( प्रख्यात कथाकार कृष्ण बलदेव वैद की डायरियों को क्रमशः राजपाल और राजकमल प्रकाशन ने छापा है । )

Comments

Ratnesh said…
आप जानते है आज से चार साल पहले मैंने "कृष्ण बलदेव वैद" की कृति ''उसका बचपन'' पढ़ा था ये नोबेल मुझे बहुत पसंद आयी। अब उनकी डायरी....
sampu said…
क्त्नास्फ२१वैद साहब का कहने का सलीका बड़ा अनूठा है |अपने पात्रों के मुख से उन्ही की शैली मे कहलवाने की विधा आपको बाखूबी आती है |कही सामाजिक दायरे से बाहर आकर कुछ नया कहने की अकुलाहट तो कभी freud के मनोविश्लेशन की विधा का भारतीय पृष्ठभूमि मे मानसिक ज़द्दोज़हद का विश्लेषण | आज भी उनकी डायरी मे कुछ न कुछ नए पन्ने निकल आते है | हाल मे ही उनके उपन्यास 'एक नौकरानी की डायरी' को पढ़ने का अवसर मिला | यहा डायरी भी है और नौकरानी भी| एक तरफ़ नौकरानी के सामाजिक स्थिति को पडोसा है उन्होंने तो दूसरी तरफ़ उस नौकरानी मे मौजूद युवा होती वनिता का freudian चित्रण | बस यहा मौलिकता की थोडी कमी है| frued कुछ ज़्यादा ही नज़र आते है यहा |कुछ ऐसा ही उपन्यास लिखा था freud ने |
vijay gaur said…
अनुराग जी यूं ही भटकते हुए आपके ब्लाग तक पहुंचा. अच्छा लगा. आपने उम्दा सामाग्री जुटायी हुई है. बधाई और शुभकामनायें.
vidya said…
vaid sab ki dono diariyan maine padhi hai. wilakshan hai yh.akeli aur star men sirf malyaj ke diariyon ke jod ki.un pr unhin ki shaili men likha yh lekh adbhut hai. badhai.

Popular posts from this blog

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब।


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्…

ईरानी कविता : सबीर हका : अनुवाद - गीत चतुर्वेदी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 10 : भुजंग, मेरा दोस्त

कई दिनों की लगन के बाद आज मैंने सौ साल पुराना वह फ्रेंच उपन्यास पढ़कर पूरा कर दिया। किताब का पूरा होना एक छोटी मृत्यु जैसा है। जीवन से ज़्यादा बहुरूपिया मृत्यु होती है। हम सबके पैदा होने का तरीक़ा एक है, लेकिन हमारे मरने के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। इसीलिए किताब का पूरा होना हम सबको अलग-अलग अनुभूति से भरता है। मेरा मन अक्सर दुख की एक चादर ओढ़ लेता है। सोचता हूँ, किस बात का दुख होता है? किताब के पूरा होने का दुख? अपने बचे रह जाने का दुख? जिन चरित्रों से मैंने एक मैत्री कर ली, उनके पीछे छूट जाने का दुख? कथा का दुख? या मेरे भीतर सोये मेरे अपने दुख, जिन्हें किताब जगा देती है?
इंदुमति के मृत्यु-शोक से अज रोया था। उसे लिखनेवाले कालिदास रोये थे। उसे पढ़कर मैं क्यों रोता हूँ? क्या मेरे भीतर अज रहता है? कालिदास की कविता रहती है? मृत्यु का शोक रहता है?
हाँ, ये सब रहते हैं। इसीलिए तो, पढ़े व लिखे हुए शब्द, मेरी मिट्‌टी पर उगते हैं।
हमारा हृदय एक पिरामिड है। मरे हुए लोग अपने पूरे साज़ो-सामान के साथ इसमें सुरक्षित रहते हैं- उनके चेहरे नहीं बदलते, उनके कपड़े, गहने, किताबें, उनकी बातें, आदतें, उनके ठह…