Thursday, May 29, 2008

और भी ग़म हैं


पहले एक बानगी : ''मैं डायबिटीज की जगह मधुमेह शब्द बोल नहीं पाता। डायबिटीज एक रूखा-सूखा शब्द है जो बीमारी जैसा लगता है, जबकि मधुमेह कान को इतना मीठा लगता है कि अनजाने में इश्क हो सकता है''। यह के.बिक्रम सिंह हैं, अपने खास अंदाजे बयां के साथ। बिक्रम हिन्दी के उन गिने-चुने लेखकों में से हैं, जिनकी ख्याति किसी पोथी से नहीं, बल्कि अखबार में हर दूसरे रविवार लिखे जाने वाले उनके कालम के कारण है। हालांकि अब इन्हें पोथी की शक्ल और और नाम दोनों मिल गए हैं और पहले संकलन,''कुछ गमें दौरां'' के बाद यह दूसरी जिल्द हाल ही में,''और भी ग़म हैं'' नाम से छप कर आई है। जो बात बिक्रम के लेखन को अखबार की एकदिनी ज़िन्दगी से उबार कर उसे स्थाई महत्व का बनाती है, वह उसमें ज़ज्ब हल्दी की गाँठ के पनसारिओं का यह युग ही नहीं, समय के उपलों की आग पर सीझी हुई यादें भी हैं। पहले की तरह कुछ गप्प, घुमक्कडी और उनकी शेखी-शोखी तो खैर है ही। भूलना नहीं चाहिए कि बिक्रम मंजे हुए फिल्मकार भी हैं, इसलिए उनके लेखन में लक्षित बिम्बधर्मिता और उसका लयात्मक संयोजन इतना चुस्त है कि वह तिरस्कृत आशिक की आँख में आंसुओं की तरह हरी घास पर ओस का चमकना भी संभाल कर रखता है। तीन खंडों में विभक्त इस पुस्तक के पहले दो खंड : कुछ उधेड़,कुछ बुन और कला : एक आध्यात्मिक कर्म में बिक्रम का देखा-भाला संसार विन्यस्त हुआ है। नोट करनेवाली बात यह है कि जीवन और कला दोनों को निरखते बिक्रम का मन हमारे सामने हर बार कुछ ऐसा पेश करता है जिसके कारण देखे हुए से हमारा रिश्ता वही नहीं रह जाता जो उसके पहले था। पुस्तक के अन्तिम खंड में आज का समाज और राजनीति है जिस पर बिक्रम अलहदा नुक्ता-ए-नज़र से विचार करते हैं। ज़रूरी नहीं कि हम उनसे सहमत हों, पर जिस सादी गहनता से वह लिखते हैं और जितने सलीके से हमें पढ़ा ले जाते हैं वह इधर के हिन्दी गद्य में दुर्लभ है। कम लोगों को ज्ञात होगा कि उन्होंने अपना लेखन अंग्रेजी में शुरू किया था लेकिन कुछेक वर्षों में ही हिन्दी गद्य का वह बाना धारण किया जिसे केदारजी ने पुस्तक की भूमिका लिखते हुए बरबस ही,'हंसमुख गद्य' कहा है। सच तो यह है कि कुछ पात्रताएं ऐसी होती हैं जिन्हें हम अर्जित करने के बावजूद सिर्फ़ इसलिए खो देते हैं कि समय बीतने के साथ हम उसके योग्य नहीं रह जाते। हंसमुख गद्य से हमारा बिछोह भी इसी वजह से हुआ। हमें बिक्रम जैसों का आभारी होना चाहिए जिनके मार्फ़त वह पुनर्नवा हो सका।

5 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

जानकारी बढाने के लिय शुक्रिया

satya.... said...

के.विक्रम सिंह से नए लेखकों को काफी प्रेरणा मिलती है खास कर अख़बार में लिखे उनके लेखों से समय पर एक अच्छी जानकारी मिल जाती है ..मैं उनको बहुत बहुत थैंक्स देना चाहता हूँ

shraddha said...

k.bikram singh ko padha to hai par is nazar se nahi .is naye nazariye ke liye dhanyavad.

Anonymous said...

achhee jankaree ke liye shukriya.

sarita sharma said...

के.विक्रम सिंह के चले जाने के बाद उनके हंसमुख गद्य से परिचित कराने के लिए आभार .