Tuesday, May 27, 2008

मेरे युवजन मेरे परिजन

हमारे यहाँ पत्रों को उसके दस्तावेजी महत्व के बावजूद इस लायक नहीं माना गया कि गंभीर सोच-विचार के दायरे में लाकर उसके ज़रिये व्यक्त सचाई को इतिहास सम्मत साचाइओं से मिलाकर देखा-परखा जाए। यह जानने की कोशिश की जाए कि उनमें खुबा व्यक्ति मन किस कदर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी रचने के लिए उद्धत और व्यग्र रहा है। या यह सहज कौतुक ही कि रचना की ओट में रचनाकार की दुनिया और उसमें उसका होना-जीना कैसा रहा है। अपने रचनाकारों के प्रति जिज्ञासा का ऐसा भाव पश्चिम में बहुत उत्कट रहा है और वहाँ ऐसे ढेरों उदाहरण मिलते हैं जब पत्र , डायरी और स्मृतलेख का सहारा लेकर न सिर्फ साहित्येतिहास को गत्यावरोध से उबारा गया बल्कि रचनाकार और उसके बाहर-भीतर के ज्ञात सत्य में भी कुछ नया और सार्थक जोड़ने की कोशिश की गई।

इधर जब हिन्दी के बड़े कविओं में से एक मुक्तिबोध को लिखे पचास कवि-लेखकों के करीब तीन सौ पत्रों का संकलन,''मेरे युवजन मेरे परिजन'' नाम से देखने में आया तो लगा कि उन पर हुए पर्याप्त लेखन के बावजूद ऐसा बहुत-कुछ है जो हमसे अनजाना रहा आया था और वह हम शायद कभी न जान पाते यदि अव्वल तो अपनी रचनाओं के रख-रखाव के प्रति लापरवाह मुक्तिबोध ने इसे सुरक्षित न रखा होता; तिस पर उनके पुत्र रमेश मुक्तिबोध और कवि अशोक वाजपेई ने उनके देहावसान के तैंतालीस वर्षों बाद उसके महत्व को जान कर उसे प्रकाशित न कराया होता। यह पूरा सच नहीं है कि मुक्तिबोध को काव्य-परिदृश्य पर मरणोत्तर मूर्धन्यता मिली और उनके कवि-कर्म का प्रभाव भावी कविता और कविओं पर उसके बाद ही पड़ा। इसके ठीक उलट पत्र इस बात की पुरजोर तसदीक करते हैं कि उनके तीस अत्यन्त सक्रिय, सर्जनात्मक और संघर्षमय वर्षों के दौरान भी एक बड़े और महत्वपूर्ण लेखक-पाठक समूह में उनकी पूछ और प्रतिष्ठा थी। और तो और जीते जी अपना कोई प्रकाशित कविता-संग्रह न देख पाने वाले इस कवि को लोग ''दूसरा निराला'' तक मानते थे। इन मायनों में यह पत्र-संकलन नई कविता की पृष्ठभूमि पर भी नए सिरे से रोशनी डालता है। कई मूल्यवान संदर्भों के अलावा उस समय की पत्रिकाओं का श्रमसाध्य प्रकाशन, लेखकों, उनका सृजन, सौमनस्य और दुरभिसंधियों की भी बानगी इन पत्रों में मिलती है। सजग पाठकों को इनमें मुक्तिबोध को मुक्तिबोध बनाने वाली जीवनास्थितियों के सूत्र भी मिल जाएंगें। साथ ही उस करुण अंतर्कथा का अता-पता भी जिसमें मरणासन्न मुक्तिबोध के लिए साहित्य जगत की चिंता और उन्हें बचाने की ज़द्दोजहद शामिल है।

हिन्दी में यह देर से शुरू हुई कवायद है। हालांकि पत्र-संकलन वगैरह छपते रहे हैं, पर बेध्यानी का आलम वैसे का वैसा ही है। अकादमिक जगत इस बारे में कुछ करेगा, ऐसा सोचना मात्र एक दुराशा होगी। लिखने-पढ़नेवाला समुदाय यदि जागरूक रहा तो इस तरह भी वह अपने मूर्धन्य लेखकों को लक्षित कर समझ की रूढियों से परे उनके बारे में कुछ नया और महत्व का प्रस्तावित कर सकता है।

1 comment:

vidya said...

hamare yahan patraadi ko log ab bhi ghrelu kism ki anawshyak jaankaari denewali ubau pustak mante hain to uske mool men yh tathya bhi hai ki aise ptr sankalan hindi men na ke brabar hain jisse lekhak ke desh-kaal ke bare men kuch nya jaanne ko mile.mere ywjan mere parijan ke bare men saubhagya se yh baat nhi khi ja sakti.