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वाजश्रवा के बहाने

कुछ तो काव्य-वस्तु की समानता और कुछ उसमें सक्रिय काव्य-विवेक के कारण कुंवरजी की हालिया प्रकाशित लम्बी कविता,''वाजश्रवा के बहाने'' उन्हीं के प्रबंध काव्य,''आत्मजयी'' की याद दिलाती है। ''आत्मजयी'' में कवि-दृष्टि के केन्द्र में मृत्यु थी, तो,''वाजश्रवा के बहाने'' में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की कोशिश की गई है। जिस दौर में ''आत्मजयी'' छप कर आई थी उस दौर की हिन्दी आलोचना को कविता के बाहर काव्य-सत्य पाने-जांचने में बड़ी दिलचस्पी थी। अकारण नहीं उसने इस कृति को निरे अस्तित्ववादी दार्शनिक शब्दावलिओं में घटा कर अपने काम से छुट्टी पा ली थी। उम्मीद है बीते वर्षों में वह इतनी प्रौढ़ और जिम्मेदार हो चुकी है कि कविता को उसके अर्जित जैविक अनुभव और काव्य-गुण के आधार पर जांचने की जहमत उठाए। अन्यथा यह एक निर्विवाद तथ्य है कि उसकी तत्कालीन बंद सोच के बावजूद ''आत्मजयी'' आधुनिक हिन्दी कविता की एक उपलब्धि है। ''आत्मजयी'' की तरह हालांकि,''वाजश्रवा के बहाने'' में कवि से प्रबंधत्व कम निभा है, पर कविता के इसी ढीले-ढाले रचाव ने उसकी नियोजन क्षमता को इतना बढ़ा दिया है कि वह वाजश्रवा का पितृ पक्ष और इस बहाने औपनिषदिक जीवन के औदात्य, मर्म और उसकी आधुनिक समय में प्रासंगिकता का सफल निदर्शन कर सकी है। मृत्यु पर मनन करता कवि-मन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मृत्यु इस पृथ्वी पर जीव का अन्तिम वक्तव्य नहीं है और परलोक भी इसी दुनिया का मामला है। यही वजह है कि दो खंडों में विभाजित इस लम्बी कविता में आदि-अंत से परे जीवन की ऋतुमयता का ही चित्रण हुआ है। पुत्र की वापसी का पुनर्लाभ कर रहे वाजश्रवा से नचिकेता का संबंध कविता में द्वंद्वात्मक न होकर दोहरी जीवनशक्ति का द्योतक है। संभवतः यह कवि के सुदीर्घ जैविक अनुभव का ही सार हो, परे इससे हमारी भी स्वाभाविक सहमति है कि,'' जीवन में संघर्ष भी हैं, परे संघर्ष ही संघर्ष नहीं है। इस तरह चित्रित करने से कि जीवन सतत संघर्षमय ही है, उसकी ज़रूरत से ज्यादा क्रूर छवि उभरती है। उसमें मार्मिक समझौते और सुंदर सुलहें भी हैं। इस विवेक को प्रमुख रख कर भी जीवन को सोचा और चित्रित किया जा सकता है''। यूं ही नहीं कुंवरजी की कविताओं में यह अलक्षित जीवन अपनी अपराजेय शक्ति, अनुपम सौन्दर्य और समावेशी विवेक से दीर्घायु रहा है। इस लम्बी कविता में भी उसके कुछ नए गवाक्ष खुले हैं। ऋग्वेद की ऋचाएं कविता में जगह पाकर उसके आशय को और गहरा बनाती हैं। हांलाकि कुछेक जगहों पर उसका रचनात्मक बसाव अटपटा जान पड़ता है।

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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