Sunday, May 25, 2008

रचने का अचरज




( किसी रचना की जड़ें कब और किन परिस्थितियों में लेखक के मन में फूटती हैं, इसके बारे में बता पाने में स्वयं लेखक को कठिनाई महसूस होती है। अपनी कालजयी कहानी 'परिंदे' के बारे में प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा का कहना था कि वह एक बड़ी हास्यास्पद-सी परिस्थिति में शुरू हुई थी : एक बार जब वे शाम के झुटपुटे में एक गर्ल्स हॉस्टल के सामने से गुजर रहे थे और लड़कियां बारजे पर खड़ी हँस रही थीं, उसी दरमियान इस कहानी का ख़याल उनके मन में आया। बहरहाल, हम यहाँ कुछ नामचीन लेखकों की वे संक्षिप्त टीपें प्रकाशित कर रहे हैं, जिनमें उन्होंने रचने के अचरज को अपने तईं समझने-समझाने की कोशिश की है। इन अंशों का अनुवाद कथाकार राजी सेठ ने हमारे लिए किया है। उनके प्रति आभार ! साथ में दी गई तस्वीर गूगल से। )


गैब्रियल गार्सिया मारक्वेज
कॉलेज के दिनों में एक रात किसी दोस्त ने फ्रान्ज़ काफ्का की कहानियों की एक किताब लाकर दी। मैं अपने ठिकाने पर लौटा और 'मेटामोर्फोसिस' पढ़ने लगा। पहले वाक्य ने ही मुझे जैसे पलंग से नीचे पटक दिया। मैं बहुत हैरान-परेशान हो गया। पहली पंक्ति थी,''जैसे ही ग्रेगर समसा, बेचैन सपनों वाली रात के बाद सुबह सोकर उठा, उसने अपने को एक बहुत बड़े कीड़े में रूपांतरित होते देखा''। इस पंक्ति को पढ़ते ही मैंने सोचा, मैं नहीं जनता था कि ऐसा कुछ लिखने की भी लेखक को छूट होती है। यदि मैं जनता होता तो बहुत पहले से मैंने लिखना शुरू कर दिया होता, और मैंने तभी से कहानियाँ लिखना शुरू कर दी।

हेनरी मिलर
हर किसी का अपना-अपना तरीका है। वस्तुतः सारा लेखन तो आप टाइपरायटर पर करते हैं। इसके अलावा चाहे आप सैर कर रहे हों या हजामत बना रहे हों, या किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हों जिसमें आपकी कोई गहरी दिलचस्पी न भी हो, आप तब भी व्यस्त हैं, आपका दिमाग किसी गहरे स्तर पर सक्रिय है। रचनाकार आख़िर है कौन ? एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास एंटेना है, जो वातावरण में, ब्रह्माण्ड में प्रवाहित तरंगों को देखने और पकड़ने की क्षमता रखता है। मौलिकता भी आख़िर है क्या ? वह सब कुछ जो हम सोचते या करते हैं, वह तो सृष्टि में पहले से मौजूद है। हम मात्र मध्यस्थ हैं जो हवा में मौजूद चीजों को पकड़ते हैं। ऐसा कैसे संभव होता होगा कि बहुत से विचार या बड़े-बड़े वैज्ञानिक अन्वेषण संसार के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ प्रकट होते दिखाई देते हैं। कविता, उपन्यास या किसी दूसरी रचना के अवतरण का यही मर्म है, यानी कि जो तत्व ब्रह्माण्ड में मौजूद तो हैं, पर जिन्हें अभिवाक्ति मिल गई है, उन्हें व्यक्त करने के लिए एक व्यक्ति, या एक व्याख्याता की ज़रूरत होती है।

इतलो कल्विनो
मैं अपने काम को शुरू करने के मामले में बहुत ढीला हूँ। मेरे मन में अगर किसी उपन्यास को लेकर कोई विचार चल रहा है, तो उसे शुरू करने का हर संभव कारण मेरे पास मौजूद रहता है। अगर मैं कहानियों की किताब पर या गद्य के छोटे-छोटे टुकडों पर काम कर रहा हूँ तो उनका अलग समय है। लेखों तक की शुरुआत मैं देर से कर पाता हूँ।अख़बारों के लिए लेख लिखने में भी मुझे इसी कठिनाई से गुजरना पड़ता है। एक बार शुरू हो गया तो फ़िर मैं तेजी से लिखता चला जाता हूँ। दूसरे शब्दों में, मैं बहुत द्रुत गति से लिखता हूँ, पर लेखन में एक से दूसरे खेप के बीच खूब लंबे-लंबे अंतराल होते हैं। मेरी स्थिति उस चीनी चित्रकार की तरह है जिसे एक बार किसी सम्राट ने केकडे का चित्र बनाने के लिए कहा था। चित्रकार ने उत्तर दिया,'' इसके लिए मुझे दस वर्ष का समय, एक बड़ा मकान और बीस नौकर चाहिए'' । दस वर्ष बीत गए तो सम्राट ने केकडे के चित्र के बारे में पूछा। चित्रकार ने कहा,'' मुझे दो वर्ष का समय और चाहिए''। इसके बाद भी उसने एक सप्ताह का समय और माँगा। अंतत: उसने तेजी से अपनी तूलिका उठाई और क्षण भर में ही केकडे का चित्र बना डाला।

ओक्तावियो पाज
हर कविता अलग होती है। अक्सर पहली पंक्ति सदा उपहार जैसी लगती है। पता नहीं यह ईश्वरप्रदत्त है या उस रहस्यमय शक्ति का करिश्मा जिसे 'प्रेरणा' कहते हैं। अपनी कविता ''सनस्टोन'' का उदाहरण देता हूँ। उसके पहले तीस हिस्से मैंने ऐसे लिखे जैसे कोई चुपचाप खामोशी में मुझसे लिखवाता जा रहा है। मैं उस प्रवाहमानता से चकित था जिसके चलते एकाद्शाक्षर पंक्तियाँ एक के बाद एक उतरती चली आईं थीं। फ़िर अचानक ही यह प्रवाह रुक गया। तब मैनें अपने लिखे हुए को पढ़ना शुरू किया। पर मुझे उसमें कुछ भी जोड़ने-घटाने जैसा नहीं लगा। कुछ दिन बाद, मैनें फ़िर से लिखना शुरू किया। अचेत तरह से नहीं, बल्कि पंक्तियों को सँवारने और प्रवाह को तारतम्य देने की गरज से। मैंने तीस या चालीस पंक्तियाँ और लिखीं, फ़िर रुक गया। बाद में मैंने अपने रचित को फ़िर से देखना शुरू किया। उस दौरान मैं धीरे-धीरे कविताओं की अंतर्वस्तु का अन्वेषण कर पाया। समझ पाया कि वे मुझे किस दिशा में ले जा रहीं थीं। यह एक प्रकार से मेरे जीवन का पुनरावलोकन था - मेरे अनुभवों का, मेरे सरोकारों, मेरी असफलताओं , मेरी ग्रस्तताओं का पुनर्सृजन। मुझे लगा कि मैं अपनी युवावस्था के अन्तिम छोर पर हूँ और यह कविता मेरे लिए एक साथ आरंभ और अंत दोनों है।

इयान मैकवान
इस प्रक्रिया में सारा आनंद तो उस हाथ लगे आश्चर्य में है, चाहे वह कितना ही छोटे से छोटा- संज्ञा को क्रिया से जोड़ता कोई उपयुक्त शब्द मात्र ही क्यों न हो। याकि पूरा दृश्य, याकि अनियोजित रूप से किसी वाक्य में से उठ खड़ा हुआ कोई चरित्र। साहित्यालोचना, शब्दों के पीछे के अर्थ का उत्खनन करते यह कभी नहीं समझ सकती कि कुछ चीजें इस तरह पृष्ठों पर आन बैठी है और वे लेखक को खूब गहरा सुख दे रही हैं। एक लेखक, जिसकी सुबह निर्विरोध हो, जिसकी वाक्य-संरचना संतोषदायक रूप से चल रही हो, वह अपने भीतर कितने शांत, निजी आह्लाद को महसूस कर रहा होता है। ऐसे आह्लाद में से मुक्तता की जो अनुभूति उसके हाथ लगती है, वही विचार की समृधि को जन्म देती है। तब ऐसे सुखद आश्चर्यों का जन्म होता है। लेखक ऐसे क्षणों, ऐसी बैठकों के लिए तरसता है।यदि मैं ''एटोन्मेंट'' का दूसरा पृष्ठ उधृत करते हुए कहूँ कि पूरे प्रोजेक्ट में यही उच्चतम किस्म की परिपूर्णता है। कोई खुशगवार लंच पार्टी, श्रुतिपाठ के लिए ठसाठस भरे हुए हाल, प्रशंसापूर्ण आलोचनाएं भी उस संतोष का मुकाबला नहीं कर सकतीं।
****

3 comments:

shraddha said...

vakai me jankari badhane wala blog hai. sabhi lekh sangrahniy hai .

Rang Nath said...

आपने अपना ब्लॉग देखने का निमंत्रण दिया तो आपकी सक्रियता के एक और आयाम से परिचय हुआ. रचना प्रक्रिया की पोस्ट रुचिकर लगी. बता बढाइये... बातो को जुड़ने दीजिये ... कुछ न कुछ बात तो जरुर निकलेगी. आपने अपने पोस्ट मे कुछ लोगो की टीपे दी है उनसे आपका रुझान साफ है कि आप चीजो को किस तरह देखते है. लेकिन ...रुझान तो रुझान है बात नहीं . अपने ओब्सेर्वेशन और इन्फेरेंस लिखिए तो बात आगे बढे ! आपका ब्लॉग चले इसी शुभ कमाना के साथ rangnathsingh@gmail.com

vidya said...

rachne prakriya ka rahsya aboojh hai jise har rachnakaar apne lekhan men alag-alag trike se mahsoos krta hai. uske baare men kuch bhi khna, antim roop se khna nhi hota.