Friday, May 23, 2008

हिन्दोस्तां हमारा


यह
हम सब के लिए एक ज़रूरी किताब है। इसलिए नहीं कि अदब और अदीब में हमारी किसी कदर दिलचस्पी है, बल्कि इसलिए इस खूरेंजी वक्त में हमारे हिस्से ऐसी नेमतें कम बची हैं। कभी प्रसिद्ध इतालवी चिन्तक-कथाकार उम्बेर्तो इको ने कहा था : ''वही कौम हिंसा पर उतारू होती है जिसका अपने अदब से रिश्ता कमज़ोर पड़ जाता है''। इस नुक्ते पर गौर करें तो यह समझना मुश्किल न होगा कि कहीं-न-कहीं हमारा भी अपने अदब से रिश्ता कमज़ोर या शिथिल पड़ गया है और इसका फायदा फिरकापरस्तों ने उठाया है। अन्यथा यह तथ्य है कि खूरेंजी से कहीं बड़ा तो हमारा संग-साथ रहने-निभाने का इतिहाहै।

वर्षों पहले उर्दू के मशहूर शायर जां निसार अख्तर ने इसी संग-साथ को उसके तमाम रंगोबू में ''हिन्दोस्तां हमारा'' नाम से दो खंडों में पेश किया था। संकलन की खूबी ये जानिए कि शुरूआती सफों में ही यह हमें इस सरलदिमागी से निजात दिला देता है कि उर्दू, जिसे हम अक्सर मुसलमानों की भाषा मान लेते हैं, दरअसल खड़ी बोली के विकासक्रम में अर्जित एक खालिस भारतीय भाषा है और इसने यहाँ की भाषिक संस्कृति के अनुरूप ही खुले मन से हिन्दी, संस्कृत, फारसी, अरबी और तुर्की ही नहीं, अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली के अलावा उन भाषाओं के शब्दों को भी स्वीकार किया जो ऐतिहासिक कारणों से तब भारत में प्रचलित थीं।

उर्दू-कविता के यूं तो कई मूड्स हैं, लेकिन उसमें राष्ट्रवाद की भी बड़ी प्रखर अभिव्यक्ति मिलती है। उर्दू कविओं की राष्ट्रीयता की एक बानगी इकबाल की इन पंक्तियों में देखिए : ''यूनानो-मिस्रो-रुमा, सब मिट गए जहाँ से / अब तक मगर है बाकी, नामो-निशां हमारा / कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी / सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा''। राष्ट्र के विरूद गायन के अलावा उसकी सभ्यता-संस्कृति,प्राकृतिक सुन्दरता,तीज-त्योहारों, कलाओं और कथाओं आदि का अद्भुत बखान किताब के पहले खंड में है। यह जानना खासा दिलचस्प है कि मीर के यहाँ की होली और मुन्नवर लखनवी के यहाँ कालिदास का कुमारसंभव कैसा है। अपनी-अपनी काव्यगत विशिष्टताओं के लिए लक्षित मीर, मोमिन, ग़ालिब, फिराक, जोश, जिगर और नजीर को तो हम-आप पढ़ते-गुनते ही आए हैं, अख्तर की मेहनत और मेधा से इस संकलन में उन कविओं को भी जगह मिल सकी है जिन्हें लगातार मरकज़ से हाशिये की ओर ठेला जाता रहा। यह क्या अपने-आप में कम बड़े दस्तावेजी महत्व की बात नहीं है।

दूसरे खंड में उर्दू की उन नज्मों को संकलित किया गया है जिससे देश के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों को गति और बल मिलता रहा। इन नज्मों में ग़दर से पहले, दौरान और बाद में गुलामी की मुखालफत और जंगे-आज़ादी के लिए की गई ज़द्दोज़हद का विशद चित्रण मिलता है। इनसे गुजरते हुए एक मशहूर उर्दू लेखक की इस अतिशयोक्ति को भी मान लेने का मन करता है : ''अगर हिंदुस्तान की तमाम तारीखी किताबें ख़त्म कर दिए जाएं, तमाम आंदोलनों के वृत्तांत गुम कर दिए जाएं और सिर्फ़ उर्दू साहित्य बाकि रह जाए तो आप हिंदुस्तान की हर युग की ऐतिहासिक श्रृंखलाओं को जोड़ सकते हैं''।


( हिन्दोस्तां हमारा को राजकमल प्रकाशन ने करीब पैंतीस वर्ष बाद इधर फिर से प्रकाशित किया है )

4 comments:

Amit K. Sagar said...

BAHUT KHUB. realy nice one. आप अच्छा लिख रहे हैं.लिखते रहिये. शुभकामनायें.
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http://ultateer.blogspot.com

शोभा said...

अनुराग जी
आप सही कह रहे हैं. राष्ट्रीयता आज की महती आवश्यकता है. आप की तरह अगर सब इस तरह सोचें तो देश की दीन दशा न हो.

अमिताभ फौजदार said...

जानकारी के लिए शुक्रिया !!

sampu said...

पहले विश्व साहित्य को सिलसिलेवार तरीके से अनुवादित कर पाठको तक पहुँचने का कार्य , और फिर हिन्दी/उर्दू साहित्य के उन चुनिंदा रचनाओ को पुनर्प्रकाशित करने की दिशा मे कुछ संतुलित कदम जो पुस्तकालयों के सीलन भरे कमरों मे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं | सचमुच राजकमल प्रकाशन ने मेरे साहित्य से प्रेम और अध्ययन को काफ़ी आसान कर दिया है | काफ़ी कुछ पढ़ गया हूँ इन दिनों |''हिन्दोस्तां हमारा'' अभी हाथ मे नही आयी है |उपलब्ध होने पर ज़रुर parhunga |