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देवप्रिया

यह एक खेदजनक सचाई है कि अन्यथा रसिक कहलाने वाला हिन्दी का साहित्य-समाज शास्त्रीय कलाओं और कलाकारों के प्रति बेहद उदासीन रहा है। यही वजह है कि इन पर गहरी रीझ-बूझ के साथ हिन्दी में बहुत कम लेखन देखने को मिलता है। इस उदासीन परिवेश में, बजरिये कलाकारों के ही, जिन चंद लोगों ने धीरज और समझ के साथ लिखा है, उनमें युवा कवि यतींद्र मिश्र का नाम उल्लेखनीय है। ''देवप्रिया'' जो प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह पर एकाग्र है, के पहले भी वे सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी पर एक बहुप्रशंसित पुस्तक लिख चुके हैं। देवप्रिया में भी पिछली कृति की तरह ही संवाद और विचारों का सुंदर संयोजन है। दूसरे शब्दों में, इसे एक सहृदय कवि और विचारशील नर्तकी के उत्कट बौद्धिक साहचर्य का प्रतिफल भी कहा जा सकता है।

देवप्रिया संबोधन नर्तकी के लिए है। वह इसलिए कि सारी नृत्यांगनाएँ देवता को प्रिय हैं। यूं भी नृत्य-कला का उद्गम स्थल मंदिर और उसका अर्घ्य देवताओं को समर्पित रहा है। भरतनाट्यम और ओडिसी में समान रूप से दक्ष सोनल मानसिंह ने बातचीत के क्रम में इन प्राचीनतम नृत्य विधाओं की परम्परा, उसमें प्रयोग के स्थल और नवगठन पर बहुत सुचिंतित टिप्पणियां की हैं। नृत्य में देवदासी प्रथा, राज्याश्रय आदि की मूढ़ आलोचना करने वाले सोनल की इन टीपों से गुजरते तो शायद उनमें प्रथा और उसमें समयानुसार आते गए परिवर्तनों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की सलाहियत पैदा होती। बहरहाल, सोनल यहीं नहीं रुकी हैं। उनकी वैचारिकता का दायरा बड़ा है और यतींद्र ने अपने संवाद-कौशल से उसके तमाम कोने-अंतरों में बड़ी सहजता से प्रवेश कर उनसे कला, समाज, साहित्य और राजनीति ही नहीं, वाक्तिगत जीवन और रूचि से जुड़े सवाल भी पूछे हैं। पुस्तक के आधे से अधिक पृष्ठों में फैला यह सरस-संवाद रोचक और पठनीय होने के साथ-साथ हमारी लगभग शून्य-सी पड़ती जा रही शास्त्रीय समझ को भी वसी करता है ।

इसके आखिरी हिस्से में यतींद्र ने सोनल मानसिंह के बहाने नृत्य-कला पर अपने विचार भी प्रस्तुत किए हैं। नृत्य में पगा उनका कवि-मन इस कला और कलाकार की भंगिमाओं का जैसा अप्रत्याशित अंकन करता है, वह भाषा में छीजती रसिकता का पुनर्वास सरीखा है। यतींद्र के इस उद्यम से उम्मीद है दूसरे भी प्रेरित होंगे और हिन्दी में इन कलाओं के मूर्धन्य कलाकारों के बहाने ही सही, अभी कुछ और ऐसा या इससे बेहतर लेखन सामने आ सकेगा। पर फिलहाल तो यह सुसज्जित देवप्रिया ही!

Comments

Satya prakash said…
आप अच्छा काम कर रहे हैं. आपको मेरी शुभकामनाएं....चाहता हूँ मैं भी लिखूं यहाँ प्रकाशित रचनाओं पर...अक्सर भूल जाता हूँ...देवप्रिया पर आपका आलेख देखा तो विवस हुआ लिखने पर...यह किताब मुझे बहुत पसंद आई...सबद ने भी इसे पसंद किया, अच्छा लगा...यतींद्र सोनल मानसिंह के बहाने नृत्य जैसी विधा की बहुत सी तहों को पहली बार उजागर कर सके हैं.
Abem said…
hindi men aisi pustakon ka sarwatha abhaw hai.yatindr ke is prayaas se kuch kshati-poorti to hui hi hai,saath hi sonal mansingh jaisi kalakaar ko is kriti ke madhyam se kuch aur nikat ta se jaan na acha laga.
निश्चित ही यतीन्द्र जी का कार्य प्रशंसनीय है..!

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