Tuesday, May 20, 2008

कुंवर नारायण की नई कविताएं



( यह किसी सौभाग्य से कम नहीं है कि सबद को उसकी शुरुआत के दूसरे ही दिन हिन्दी के अत्यन्त प्रतिष्ठित कवि कुंवर नारायण का रचनात्मक सहयोग मिला है। कुंवरजी ने अपनी कुछ कविताएं हमें सहर्ष छापने को दी। यहाँ प्रेम और मृत्यु जैसी शाश्वत थीम पर उनकी कविताएं प्रस्तुत हैं। यह इन कविताओं का पहला ही प्रकाशन है। )

इतना कुछ था
इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया

अच्छा लगा
पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक
अच्छा लगा,
पेड़ की छाया का सुख
अच्छा लगा,
डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,
''अब चलूँ'' सोचा,
तो यह अच्छा लगा...


11 comments:

Mahesh said...

it is always a nice exp to read kunwar ji. first poem impressed me a lot. it a big poem in small size. please keep this blog in function.

lalit said...

bhut khoob... waaahh!!!!!

kshitish said...

kunwar narayan ji ne dus lines mein zindagi ka poora aks utaar kar rakh diya hai. aadmi poora jeevan pyar ki talaash mein rahta hai.lekin mil jaane par pyar ka mol nahin pechaan paata.pyaar ki ek boond ke saahare garmi aur aag se tapta registaan hanste hanste paar kiya ja sakta hai.mrityu to jeevan ka shsashwat satya hai.sach
kavi ka jawab nahin.

viruddh said...

कुंवर नारायण की कविताओं को पढ़ना आज के दिन की उपलब्धि है। प्यार और मन पर इतनी खूबसूरत कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगा कि कुंवर नारायण चलते-चलते इतने गंभीर विषयों पर इतनी अच्छी कविताएं लिख डालते हैं। प्यार पर कुंवर नारायण की कविता को पढ़ते हुए महान कवि नाजिम हिकमत की याद आती है। साथ ही साथ हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की भी। तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेते हुए मुझे ऐसा लगता है कि दुनिया को इसी तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।

Ratnesh said...

Congratulation Starting for blogs keep it up...
We appreciate your selections…
Thanks.

Amit said...

It's simply great to have such a great poet's word exclusively in the blog....

i can't dare to say anything about such a great poet without reading him thoroughly...but what i felt is...kunwarji's each line show the reality of life....

cheers! anurag ji...

katyayani said...

"Itna kuch tha"......Kunwar Narayan Ji ki iss kavita ko pad accha laga...bahut accha laga.
Ya yun kahun! khubsurti se mulaqat hui aur mera aaj ka din safal gaya...
Dhanyawaad Kunwar Ji...
Dhanyawaad Anurag....

Katyayani Upreti

vidya said...

sachmuch jeevn aur prem me aisa hota hai. kavi ne apni anubhutiyon ko shabd dete hue anyaas ham men wh sab bhar diya hai jise hum jine ki aapadhapi men bhoolte rahe hain.

Abem said...

ek sampurn jeewnanubhaw ka nichod hai ye kavitayen.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

वाकई यह ज़रा सा प्यार और इतना अल्हड़ मन नहीं होता तो जीवन यूँ ही लड़ने-झगड़ने में ही बीतता..!

कुंवर जी के शब्द बिलकुल सीधे ही उतर जाते हैं मन पर..!

mardulika yoganandi said...

hindi k ek mahan rachanakar kuwar narayan