Sunday, May 18, 2008

आगाज़


हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा
हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

मुझे
वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले
दोनों
एक दूसरे को नहीं जानते थे

साथ
चलने को जानते थे। 

 ***

[ यह कविता हिन्दी के मूर्धन्य कवि विनोदकुमार शुक्ल की है। 
सबद की शुरुआत इन्हीं शब्दों से।
गुफ्तगू उन सबसे है जिनका एक घर सबद निरंतर में भी है। 
जरिया सबद है। 
गरज इतनी कि लोगों का उससे सम्बन्ध और घना हो। 
ख़ुद भी लिखता रहूँगा और कोशिश रहेगी कि समर्थ रचनाकारों की नई-पुरानी रचनाओं को भी सबद के माध्यम से आपके सामने लाऊं, जिनका होना हमें कई तरह से समृद्ध करता है। ]

11 comments:

bhashkar said...

pheli post ki mubarkbad, ummid hai kuch accha karoge

lalit said...

तुम जानते हो यह कविता मुझे बेहद पसंद आई थी इसलिए मेरे हिसाब से इस कविता से अपने ब्लॉग की शुरुआत करके तुमने ब्लॉग प्रेमियों के लिए पहले ही ‌ओवर में छक्का मारने वाले बल्लेबाज वाला इंप्रेशन बनाने की जो कोशिश की है उसमें काफी हद तक तुम्हें कामयाबी मिलनी चाहिए। मेरा मानना है कि तुम्हारा ब्लॉग जरूर कुछ हटकर परॊसेगा। जो कुछ भी अच्छा छपा और छापा है हमें जरूर पढवाना। शुभकामनाएं।

poonam pandey said...

बेहद ही खूबसूरत पंक्तियां....हकीकत यही है....
keep it up. congrats

Amit said...

ब्लॉग बनाने की बधाइयां और मुझे यक़ीन है कि आप लोगों के बीच शब्दों से जाने जाएंगे। बस, ऐसी ही कोशिशें जारी रखिए.....

सबद में जो बातें कही गई हैं वो वाक़ई ज़िंदगी की सबसे बड़ी हकीकत हैं।

धर्मेंद्र सुशांत said...

anurag bhai,
blog shuru kar aapne bada achha kiya.aap sajag pathak aur samvedanshil rachanakar hain.isliye mujhe ummeed hai ki aapke blog par hamen shreshtha rachnayen padhne ko milengi.pahle post men vinod kumar shuklaji ki kavita iska praman hai.varshon pahle maine unki ek kavita (shirshak bhul raha hun) : nadi se milne jaunga kam ki tarah... aisha kuchh tha usme : mujhe kafi pasand aayee thi to maine unhe likha ki ise apani hastlipi me likh kar bhej den. unhonen likh kar bheji thi.
subhkamnayen.
dharmendra sushant

vidya said...

nye blog ki shuruaat par hhadik shubhkamnayen.in dino jo blog dekhne me aa rahe hain unme jyadatar kmakl logo ki bhadas hi nikalti hai.aise me agar main umeed kru ki isme kuch alag hoga to aap nirash nhi krenge.

sampu said...

वैसे तो आपके लेखन से परिचय पुराना है पर ब्लोग के माध्यम से आपको पढना एक नया एहसास दे रहा है । बधाइ स्वीकार करे ।

shona said...

congrats fr the starting of a new journey....I hope this will be a mile stone in ur creative work...no doubt we all r busy with one or another work bt doing something like this in the field of literature is truly commendable...gud luck for Aagaz!

P said...

अनुराग भाई, सबद के आगाज की बधाई। शानदार शुरुआत। आशा है, सबद देशी-विदेशी रचनाकारों के शब्द-मर्मों के विभिन्न अर्थ-स्तरों को पाठक तक पहुंचाने में कामयाब होगा। शुभकामनाओं सहित, पुरुषोत्तम नवीन

Abem said...

bahut achi kavita padhane ke liye shukriya.main yahan der se pahunchi.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

हमेशा से सोचता था कि "सबद" को शुरू से पढ़ना है..शुरू किया है..!

व्यक्ति और हताशा...और अंततः एक चिरंतन आशावाद...! शानदार तो आगाज ही था सबद का..!