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Showing posts from 2008

तीन श्रद्धांजलियाँ

पहले कवि-नाटककार हैरॉल्ड पिंटर, फ़िर चिंतक सैमुएल हंटिंगटन और अब चित्रकार मंजीत बावा के निधन की ख़बर आई है। रचना, विचार और कला की दुनिया को इन तीनों ने अलग-अलग ढंग से आलोकित किया। पिंटर ने कवि-नाटककार से आगे जाकर एक सार्वजनिक बौद्धिक की भूमिका का भी निर्वाह किया। मौजूदा वक्त में पिंटर सरीखे लेखक और जन बौद्धिक की प्रजाति लुप्तप्राय है। पिंटर का हमारे बीच से जाना इस सन्दर्भ में और भी दुखद है।
हंटिंगटन को विचार-विमर्श की दुनिया में उनकी पुस्तक , '' The clash of civilizations and the remaking of world order'' की अत्यन्त मौलिक और विचारोत्तेजक स्थापनाओं के लिए याद किया जाता है। हंटिंगटन ने यह पुस्तक उस दौर में लिखी जब यह प्रश्न जिज्ञासा और आशंका के मिले-जुले स्वर में पुछा जा रहा था कि क्या आने वाले समय में सभ्यताओं का संघर्ष वैश्विक राजनीति के केन्द्र में होगा ? अपनी पुस्तक के ज़रिये उन्होंने इस सवाल का जवाब देने के अलावा सभ्यताओं के संघर्ष के बीच वैश्विक शान्ति और सहअस्तित्व कायम रखने के रास्ते भी बताए। कहना न होगा कि हंटिंगटन द्वारा शुरू किए गए विमर्श का दायरा आज कितना बड़ा …

कुंवर नारायण पर असद ज़ैदी

'ईमान का खाता' : कुंवर नारायण और उनकी कविता

असद ज़ैदी

धीरे धीरे टूटता जाता मेरी ही हँसी से मेरा नाता
कुंवर नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा है जिसने बहुत ज़माना देखा है। वह अपने तजरुबे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते हैं और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहते हैं। काव्यशास्त्रीय नज़र से देखेंतो कह सकते हैं उनके लहजे ही में सब कुछ है। उनको पढ़ते हुए लगता है किउनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता है--यही उनकी तर्ज़ है। बुफ़ों के शब्दों में : 'द स्टाइल इज़ द मैन'।
पर यह कहना असंगत न होगा कि स्टाइलिस्टों से कुलबुलाते काव्य-परिदृश्य में वह एक महत्वपूर्ण स्टाइलिस्ट-भर नहीं हैं। वह मूलतः नैतिक और सामजिकरूप से अत्यन्त सावधान और प्रतिबद्ध कवि हैं। हिन्दी के अव्वलीन नागरिक-कवि का कार्यभार और अधिकार अब उन्हीं के पास है। एक ज़माना पहले, 1960 के दशक के आरंभिक वर्षों में, मुक्तिबोध ने उन्हें अपने समीक्षात्माक लेख में 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' का कवि कहा था। कुंवर नारायण ने हरदम मुक्तिबोध की…

सिगरेट छोड़ने के बहाने : ओरहन पामुक

लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं
ओरहन पामुक

मुझे सिगरेट छोड़े हुए २७२ दिन हो गए। अब आदत हो गई है। मेरा तनाव कम हो गया है और मुझे अब ऐसा नहीं लगता कि मेरे शरीर का कोई हिस्सा टूट रहा है। पर ऐसा असल में है नहीं । सचाई यह है कि एक अभाव की भावना से मैं अब तक नहीं छूटा हूँ। मैं इस सोच की ज़द में रहा कि मुझे मेरे स्व से अलग कर दिया गया है। और ज्यादा सही यह कहना होगा कि अब मुझे ऐसे जीने की आदत हो गई है। निष्ठुर सत्य को मैंने स्वीकार कर लिया है।अब मैं फिर कभी सिगरेट पीऊंगा। कभी नहीं।ऐसा कहते हुए भी मैं दिवास्वप्न देखता हूँ कि मैं सिगरेट पी रहा हूँ। अगर मैं कहूँ कि ये दिवास्वप्न इतने भयानक और गोपनीय हैं कि उन्हें हम अपने आपसे भी छिपाते हैं... समझते हैं ? वैसे भी, यह बात ऐसे ही एक दिवास्वप्न के दौरान होगी और उस क्षण जो भी खिचड़ी मैं पका रहा होऊँगा, जैसे-जैसे मैं इस फिल्म यानी कि अपने सपने को शिखर तक जाता देखता हूँ, मुझे उतनी ही खुशी मिलती है जितनी कि पीने के लिए एक सिगरेट जलाने से मिलती है।तो सुख-दुख, आकांक्षा और हार, उदासी और उल्लास, वर्त्तमान-भविष्य के अनुभव को…

किस तरह से लिखूं मैं / निवेदिता / कि लगे/ तुम / हो ?

( वक्त-वक्त पर सबद में नए कविओं को वरिष्ट कवि-लेखकों के समान ही महत्व देकर प्रकाशित किया जाता रहा है। उसी कड़ी में इस बार विपिन कुमार शर्मा की कविताएं दी जा रही हैं। विपिन की कविताएं यों पत्र-पत्रिकाओं में आती रही हैं और वे इतने भी अजाने और नए नहीं हैं कि उनकी कवि-पत्री बांची जाए। पर यह ज़रूर है कि जैसा उनकी कविताओं से किसी काव्य-मुद्रा के असर में न होकर लिखने का पता चलता है, उसी तरह व्यवहार में कवियशःप्रार्थी न होने की वजह से वे अलक्षित होते रहे हैं। ऐसे कई युवा और महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी किसी दरबार में हाजिरी नहीं है और वे अपनी कविताओं के बूते सुधि पाठकों की निगाह में बने हुए हैं। सबद इन कवि-लेखकों का सच्चा सखा बनने की आकांक्षा रखता है। विपिन ने अपनी जो कविताएं दी थीं उनमें से चार कहीं भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं, जबकि पांचवीं कविता पूर्व प्रकाशित है। )

नई कविताएं

सुकवि की मुश्किल

बहुत तड़पकर हाथ मलता है कवि
जब उसे पता चलता है
कल रात
साड़ी दुनिया का प्रेम ओढ़कर
जब वह लिख रहा था प्रेम कविता
ठीक उसी वक्त
पड़ोस की एक लड़की
उसको मदद के लिए पुकार रही थी
किया जा रहा था उसका बलात्कार
लगभग उसी समय
च…

कवि कह गया है : १ : संजय कुंदन

कविता के बारे में कुछ बेतरतीब बातें

हिंदी कविता के बारे में दो परस्पर विरोधी बातें कही जा रही हैं। एक तो यह कि अब काव्य परिदृश्य में ऐसा कुछ खास नजर नहीं आ रहा जो ध्यान खींचता हो, युवा कवियों ने ऐसा कुछ नया नहीं जोड़ा जिसे रेखांकित किया जा सके। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग बेहद आश्वस्त होकर यहां तक कहते हैं कि यह कविता का स्वर्ण युग है। इतने सारे कवि लिख रहे हैं, यही क्या कम है। एक कवि इन दो तरह के वक्तव्यों को किस रूप में ले ? या उसे इन पर ध्यान देने की कोई जरूरत है भी कि नहीं ?

एक बार एक वरिष्ठ कवि ने मुझसे कहा था कि हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हमारे पाठक हैं या नहीं। तब मुझे यह सवाल बहुत दिनों तक परेशान करता रहा था कि क्या कवि अपनी एक स्वायत्त दुनिया में बंद होकर चुपचाप कविता लिखता रहे, किसी गुह्य या रहस्यमय साधना की तरह ? क्या हमें उनकी अपेक्षाओं और शंकाओं से मुंह फेर कर बैठ जाना चाहिए, जिनके लिए हम लिखने का दावा करते हैं ? क्या हमें उनसे यह कहना चाहिए कि मैं जो लिख रहा हूं लिखता रहूंगा तुम्हें समझना है तो समझो वरना भाड़ में जाओ। हमें तुम्हारी परवाह नहीं।

क्या कवि इस बात की चि…

हम उम्मीद करें ...

अभी थोड़ी देर पहले ही मुंबई में धमाके ख़त्म हुए हैं और उसकी पल-पल बदलने और दिल बैठा देने वाली सर्द ख़बरों की ज़द से निकल कर मैं अपने मोर्चे पर आया हूँ। इसे आंकड़ों में कहने की ज़रूरत नहीं कि देश पर हुए इस फ़िदायीन हमले में कितने निर्दोष लोगों का खून बहा। यह ज़रूर है कि इस नाजुक मौके पर सुरक्षा बलों और मीडिया ( एकाध टी आर पी पीड़ित चैनल्स को छोड़कर ) ने जितनी तत्परता और जिम्मेदारी का परिचय दिया वह काबिलेतारीफ है। यह भी गौरतलब है कि इस मौके को कुछ सियासी दलों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए मुफीद समझा पर उनके मंसूबे किस कदर मखौल का विषय बन गए हैं यह किसी से छुपा नहीं है। यह एक लोकतंत्र के रूप में हमारे वयस्क होने का भी प्रमाण है। ऐसी घटनाओं के बाद जिस एक बात की ओर ध्यान जाना लाजिमी है, वह है हमारे नीति-निर्माताओं का बयान। चूँकि वह इतना घिसा-पिटा और दरहकीक़त इतना बेअसर है कि उसे लेकर हमारे मन में गुस्से और तकलीफ का भाव एक साथ जगता है। हम उम्मीद करें कि उनके ये बयान महज कोरी बातें न रहकर स्थिति में बदलाव लाने में भी सक्षम होंगे।

सबद मुंबई में जान गंवाने वाले तमाम निर्दोष लोगों और उन्हें बचाने की …

सबद विशेष : ६ : कुंवर नारायण : नई निगाह में

( यह सबद की ओर से किए गए आग्रह से कहीं ज़्यादा अपनी भाषा के एक बड़े कवि-लेखक के सम्मान में लिखने की अन्तःप्रेरणा ही रही होगी जिसकी वजह से इन युवा कवि-लेखकों ने कुंवरजी के बहुविधात्मक कृतित्व पर इतना त्वरित लेखन किया। इनमें से पंकज चतुर्वेदी पहली बार ब्लॉग की दुनिया की ओर अपना रुख कर रहे हैं, उनका स्वागत ! गीत और गिरिराज ने कुंवरजी की कविता पर ख़ुद को एकाग्र किया है, जबकि प्रभात रंजन ने उनके एकलौते कहानी संग्रह के माध्यम से उनकी कहानियों के अनूठेपन की ओर इशारा किया है। हम इनके शुक्रगुजार हैं। )

आग का वादा
पंकज चतुर्वेदी

कुंवर नारायण पिछले लगभग छह दशकों से रचनारत हैं। आज जब त्रिलोचन और रघुवीर सहाय हमारे बीच नहीं हैं, तो बेशक वह हिन्दी के सबसे बडे़ कवि हैं। मुक्तिबोध ने 1964 में ही उनके महत्त्व को पहचानते हुए लिखा था कि वह 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' के कवि हैं। मगर 1964 से 1994, यानी तीस वर्षों का लम्बा वक्फा ऐसा भी रहा है; जिसमें सतत रचनाशीलता के बावजूद कुंवर नारायण को हिन्दी आलोचना में वह सम्मान और शोहरत नहीं मिली, जिसके दरअसल वह हक़दार थे। उलटे, उनकी कवित…

कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ

ज्ञानपीठ

इस घोषणा के बाद कि वर्ष २००५ का ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुंवर नारायणको दिया जाना है, यह उक्ति दुहराने का मन होता है कि इससे ज्ञानपीठ की ही प्रतिष्ठा बढ़ी है। ज्ञानपीठ पुरस्कार को समस्त भारतीय भाषाओँ के साहित्य में अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है, पर इसके साथ भी विवाद और चयनित कवि-लेखक को लेकर बिल्कुल फर्क किस्म की बातें सामने आती रही है। इस परिप्रेक्ष्य में कुंवरजी का निर्विवाद चयन कुछ विलंबित ज़रूर है, पर इससे हिन्दी और विशेषकर कविता का सम्मान बढ़ा है। स्वयं कुंवरजी इसके लिए ख़ुद को एक निमित्त भर मानते हैं।

इन दिनों

कुंवर नारायण की कविता ने मुझ जैसे अनेक लोगों को न सिर्फ़ कवित-विवेक बल्कि जीवन विवेक भी दिया है। मैं खुशकिस्मत हूँ की पढ़ने-लिखने के शुरूआती दिनों से ही उनकी कविता और दिल्ली आने के बाद मुझे उनकी संगत भी मिली। अस्सी पार भी उनकी दिनचर्या किसी स्कूली छात्र जैसी है। आंखों की रोशनी कम पड़ने के बावजूद अपनी डेस्क से लगकर वे किताबें लेंस के सहारे देर तक पढ़ते हैं। हजारों पृष्ठों में फैली अपनी अनछपी रचनाओं का सख्ती से संपादन करते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों से …

ज़बां उर्दू : २ : सफ़िया अख्तर

जाने अज़ीज़,

कैसे हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।
जब सोचती हूं तो समझ में नहीं आता कि मेरी गैरमौजूदगी में ज़िन्दगी को किन मशागिल (कामों) से पुर करते होगे ? फातिमा बहन बेचारी मजदूर आदमी, वक्त पर चल देती होगी, फिर घर पर अकेले क्या करते होगे, वक्त कैसे कटता होगा ? घबराओ नहीं, मैं भी तुम्हारे पास हूं, अलबत्ता ये और बात है कि ऐसे में मीना (शराब ) भी आ जाती हो और मुझे उस बज़्म से निकाला मिल जाता हो।
तुम कब आओगे ? मुझे बुलाना या ख़ुद आना। मार्च के पहले हफ्ते में जयपुर जाना तय करो और मुनासिब समझो तो मुझे भी ले चलो। औन के यहां ठहरेंगे और उनकी शाने-मेज़बानी भी देखेंगे। वैसे तुम अपनी मर्ज़ी पर रखो। ये शौक तो महज़ तुम्हारी हमसफरी क…

सबद विशेष : ५ : के. सच्चिदानंदन की कविताएं

एक ही भाषा नहीं

व्योमेश शुक्ल

मलयाली कवि के. सच्चिदानंदन समसामयिक हिंदी कविता के अनूठे दोस्त हैं। उनकी कविता की अंतर्वस्तु, प्रतिक्रिया करने की पद्धतियाँ, मुख्यधारा की राजनीति के पतन का हिस्सा बन जाने को लालायित वामपंथी भटकन के प्रति उनकी चिढ़, और फिर भी मार्क्सवाद को एकमात्र विकल्प मानने की अक्सर अदृश्य और कभी-कभी ज़ाहिर ज़िम्मेदारी उनके साथ आज की हिंदी कविता के रिश्ते को एक आदर्श तनाव में स्थापित कर देती है। हालाँकि, इसके अलावा आप मलयाली जीवन-संस्कृति की अनेक खुश और उदास, बेबस और प्रचंड , अतिसाधारण और असामान्य फिल्में भी उनके यहाँ देख सकते हैं। इस कविता में स्मृतियों, जगहों , लोगों प्रकृति और लगावों का ऐसा वैभव मुमकिन हुआ है जिसमें डूबकर मुग्ध, विस्मृत या आत्महीन नहीं हुआ जा सकता। सच्चिदानंदन की कविता कभी भी ऐसी सहूलियत ख़ुद को या अपने पाठकों को नहीं देती।

उनकी कविताएं सरलता लगभग हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं और एक आश्चर्यजनक उमंग के साथ मिथकों, पुराकथाओं, मनुष्येतर प्रकृति के उपेक्षित नायकों के शरीर और आत्मा में दाख़िल होकर वहीं से कुछ उनकी, कुछ अपनी बातें कहने लगती हैं। उनके उदबोध…

डायरी : २ : कृष्ण बलदेव वैद

( कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के कथा परिदृश्य में अपनी विरल उपस्थिति के कारण जाने जाते हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ उन्हीं अर्थों में कथा कृतियाँ नहीं हैं जिनकी चिर-परिचित छवि हमारे मन में परम्परित कथाकृतियों को पढ़ कर बनी है। वैद ने अपने फॉर्म और कंटेंट को लेकर लगातार प्रयोग किया है और अब भी उनमें प्रयोगशीलता और जोखिम उठाने का माद्दा कम नहीं पड़ा है। कहना न होगा कि हिन्दी में अपनी इस प्रयोगवृत्ति के कारण उन्हें लेकर एक नासमझी का भी माहौल बना है जो प्रकारांतर से उसकी क्षीण पड़ती आलोचनात्मक मेधा का ही परिचायक है। हालाँकि वैद और उनके जैसे लेखकों की अब तो एक बड़ी जमात ही है, पर वैचारिक असहमतियों आदि का बहाना बना लोग अब भी ऐसे लेखकों की कृतियों पर विचारने-बतियाने से कतराते हैं। होना यह चाहिए कि इस ओर एक सच्चा और निर्भीक आलोचनात्मक उद्यम के लिए हम एक माहौल बनाएं। इसके लिए यह आवश्यक है कि अवसर और औचित्य की चिंता किए बगैर इस करुण तथ्य की ओर इशारा किया जाए। यहाँ भी यही करने की मंशा है। आगे आप वैद साहब की तीसरी डायरी, '' डुबोया मुझको होने ने ''के अंश पढ़ेंगे जिसे ज्ञानपीठ ने हाल ही में …

सृजन : तुषार धवल की लंबी कविता

( हिंदी में लंबी कविताओं के लेखन की अत्यंत समृद्ध परंपरा है। उन कविओं की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने कविता के इस विधान को साध कर सार्थक रचनाएं दीं। युवा कवि तुषार धवल की यह सद्यः लिखित कविता उसी सार्थक सृजन की एक कड़ी है जिसमें हम अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं से साक्षात होते हैं। अच्छी बात यह है कि इस विद्रूप अंकन के बाद भी कवि के पास मनुष्यों के लिए जीवनदायनी आस्था बच रहती है और कविता में उसकी पुनर्प्रतिष्ठा इन लंबी कविताओं के ज्ञात इतिहास में भी प्रीतिकर विलोम है। प्रसंगवस जोड़ दूँ की सबद पर यह तुषार की दूसरी लंबी कविता पहलेपहल प्रकाशित हो रही है। )


काला राक्षस

तुषार धवल

समुद्र एक
शून्य अंधकार सा पसरा है।
काले राक्षस के खुले जबड़ों से
झाग उगल-उचक आती है
दबे पाँव घेरता है काल
इस रात में काली पॉलीथिन में बंद आकाश

संशय की स्थितियों में सब हैं
वह चाँद भी
जो जा घुसा है काले राक्षस के मुंह में

काले राक्षस का
काला सम्मोहन
नीम बेहोशी में चल रहे हैं करोड़ों लोग
सम्मोहित मूर्छा में
एक जुलूस चला जा रहा है
किसी शून्य में

कहाँ है आदमी ?

असमय ही जिन्हें मार दिया गया
सड़कों पर
खेतों में
जगमगाती रोशनी के अ…

कोठार से बीज : ४ : रघुवीर सहाय

( हिन्दी के जिन कविओं का अपने समय और बाद की कविता पर बहुत सीधा, निर्णायक और सार्थक असर रहा, रघुवीर सहाय उनमें से एक थे। उन्होंने कविता को इस योग्य बनाया कि उसकी तरफ उम्मीद से देखा जा सके : उसकी ज़रूरत महसूस हो। उनकी ऐसी अनेक स्मरणीय कविताएं हैं जिनसे इस अंधेर समय में रोशनी के कल्ले फूटते हैं। मसलन यही : कुछ तो होगा / कुछ तो होगा / अगर मैं बोलूँगा / न टूटे / तिलस्म सत्ता का / मेरे अदंर / एक कायर टूटेगा / टूट मेरे मन / अब अच्छी तरह से टूट / झूठ मूट मत अब रूठ। इसीलिएरघुवीर सहाय को याद करना कभी-कभी निराशा का कर्तव्य भी लगता है। कोठार से बीज में इस दफा गद्यकार रघुवीर सहाय। आगे दिए गए गद्य के टुकड़े सुरेश शर्मा द्वारा संपादित रघुवीरजी के गद्य चयन, '' यथार्थ यथास्थिति नहीं '' से हैं जिसे चयन में से एक और चयन भी कहा जा सकता है। )

जो कविता बचा लेती है

कविता क्या चीज़ें बचा सकती है ? बहुत सोच करके देखूं तो भी मैं उसको कुछ पहचानी जाने वाली शक्लों में नहीं देख पाता -- सिवा इसके कि कुछ चीज़ें हैं जो कि रोज हम अपनी जिंदगी में करते हैं या पाते हैं और हर वक्त एक तरह की भावना से आक्रांत रहत…

रंगायन : ३ : हबीब तनवीर

( हबीब तनवीर उन जीवित मूर्धन्यों में से एक हैं जिनका होना उस कला-माध्यम को न सिर्फ़ एक अमाप ऊँचाई देता है, बल्कि जिन मूल्यों और प्रतिबद्धताओं से वह विकस रही होती है, उसमें हमारी आस्था भी दृढ़ करता है। रंगायन में इस दफा हबीब तनवीर। )

'' आओ, देखो सत्य क्या है ''
हृषीकेश सुलभअब छियासी के हो चुके हबीब तनवीर को याद करना सिर्फ रंगकर्म से जुड़े एक व्यक्ति को याद करने की तरह नहीं है। दसों दिशाओं से टकराते उस व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जिसके सिर पर टूटने को आसमान आमादा हो, धरती पाँव खींचने को तैयार बैठी हो और कुहनियाँ अन्य दिशाओं से टकराकर छिल रही हों; और वह व्यक्ति सहज भाव से सजगता तथा बेफ़िक्री दोनों को एक साथ साधकर चला जा रहा हो। अब तक कुछ ऐसा ही जीवन रहा है हबीब तनवीर का। भारतेन्दु के बाद भारतीय समाज के सांस्कृतिक संघर्ष को नेतृत्व देनेवाले कुछ गिने-चुने व्यक्तित्वों में हबीब तनवीर भी शामिल हैं। भारतेन्दु का एक भी नाटक अब तक मंचित न करने के बावजूद वे भारतेन्दु के सर्वाधिक निकट हैं। उन्होंने लोक की व्यापक अवधारणा को अपने रंगकर्म का आधार बनाते हुए अभिव्यक्ति के नये कौशल से दर्शकों …

अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : अंतिम किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की यह आखिरी पेशकश है। इस अपेक्षाकृत लंबी पोस्ट को भी रूचि और लगाव से पढ़ा गया है। इसके पीछे जितना काफ़्का और सिताती हैं उससे कतई कम अशोक का उद्यम नहीं है। हम इस पेशकश की समाप्ति पर पुनः उनके सहयोग के लिए अपना आभार प्रकट करते हैं। )
यह रूपान्तरण हमारी आंखों के सामने होता है। शुरू में सास्सा को लगता है कि वह एक ऐसी देह में कैद है जिसे वह उस नैसर्गिकता के साथ काबू या निर्देशित नहीं कर पाता जैसा पहले अपने प्राकृतिक हाथ पैरों के साथ कर पाता था। जब वह बोलने के लिए अपना मुंह खोलता है उसे नीचे कहीं से चिड़िया की सी दर्दनाक आवाज अपने शब्दों के साथ घुलती महसूस होती है और उस प्रतिध्वनि में उसे संदेह होता है कि उसने अपनी आवाज सुनी भी या नहीं। उसे भान होता है कि उसकी देह अकल्पनीय रूप से चौड़ी है। जब वह बिस्तर से उतरना चाहता है उसके पास हाथ पैर नहीं बल्कि कई सारे छोटे छोटे पैर हैं ; अगर वह उन में से एक को मोड़ना चाहता है तो उसे अपने को खींचना होता था और जब वह उसे मोड़ पाता है वह देखता है कि बिना उसके प्रयास किए बा…