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यादों में बाबा : रेवा नाग बोडस

12:12 am




( हिंदी के चर्चित नाटककार और कहानीकार नाग बोडस पर उनकी बिटिया रेवा के स्मृतिरेख।)



1.

बाबा 
की लिखी पाण्डुलिपि पढ़ते हुए कभी भी मेरी आँखों के सामने उनके नाटक के पात्र नहीं आए। हर बार बाबा की छवि ही आई। शायद इसी वजह से 
मुझे उनका एक भी नाटक कभी समझ में नहीं आया। नाटक के दृश्य पढ़ते समय वह जगह दिखती रही, जहाँ वे दृश्य लिखे गए थे। पुराने नाटको में पुराना और नए नाटकों में नया घर दिखा। उनकी सोच कभी पकड़ नहीं पाई मैं। और हर बार ज्यादा और ज्यादा निराश  होती गई।
निराश क्योंकि मैं अपने पिता को समझ नहीं पा रही  थी! कई बार कोशिश की कि नाटकों को 'बाबा' की छवि से अलग करके पढ़ूं। पर नाकाम रही। फिर सोचा अगर मैं उनके दोनों अस्तित्वों को अलग समझूं-स्वीकारूं, तो शायद बात बने। 



तुम्हारे बाबा क्या करते हैं
मुझे एक वाकया याद आता है। माँ, बाबा और मैं किसी ट्रेन में सफ़र कर रहे थे। सीनियर केजी में थी तब मैं। ट्रेन में किसी यात्री ने मुझसे बात करना शुरू की। नाम, माँ का नाम, पिता का नाम वगैरह बच्चों से पूछे जाने वाले सवालों के क्रम में उन्होंने जब पूछा कि तुम्हारे पापा क्या करते हैं,  तो मैं चुप रह गई। उन्होंने सवाल दोहराया। मैं फिर भी चुप। माँ को लगा मुझे सवाल समझ नहीं आया है, इसलिए उन्होंने झेंप कर दूसरी तरह से वही सवाल मुझसे पूछा। पर फिर भी मैंने कोई जवाब नहीं दिया। घर आकर माँ ने मुझे थोड़ी डांट लगाई। एक सीधे और सरल प्रश्न का उत्तर मुझे न पता होना उन्हें मंजूर नहीं था। मुझसे माँ बार-बार यही पूछे जा रही थी "बताओ रेवा तुम्हारे बाबा क्या करते हैं?" काफी देर चुप रहने के बाद मैं अचानक से बोली मुझे नहीं पता माँ। बाबा हमारी बात दूसरे कमरे से सुन रहे थे। बाहर आकर उन्होंने मुझसे कहा, "बेटी मैं फिजिक्स पढ़ता हूं। मैं प्रोफ़ेसर हूँ।" मैंने अचरज से पूछा, ''पर आप तो लिखते है। वह क्या है ?'' बाबा मुस्कुराए और बोले, ''मैं नाटककार हूँ, जिसे अंग्रेजी में playwright कहते हैं।''


दिस इज़ माय फन
उसके बाद शायद ही मैंने किसी को उनके प्रोफेसर होने की बात बताई। मुझे जवाब मिल गया था। बस समझ में नहीं आ रहा था कि अगर वह लिखते थे, तो पढ़ाते क्यों थे! कुछ साल बाद इसका जवाब भी मुझे मिल गया। हुआ यूँ कि दूसरी क्लास की गर्मियों की छुट्टियों में मुझे पेंटिंग करने का शौक चढ़ा। बाबा से मांग करने पर वाॅटर कलर्स और कुछ कोरे सफ़ेद कागज़ मुझे दिए गए। बस फिर क्या था, बाबा के मेज़ से थोड़ी दूर ही मेरी मेज़ भी सज गई। दिन रंगों से खेलने और अजीबोगरीब आकृतियां बनाने में निकल जाता था। एक दिन कोई नया चित्र लेकर बाबा के पास गई और बोली बाबा आपको भी पेंटिंग करनी चहिए। इट्स सो मच फन। बाबा मुस्कराए और उनके टाइपराइटर को दिखाते हुए बोले, ''सी दिस? दिस इस माय फन।'' और फिर उन्होंने मुझे समझाया कि किस तरह फिजिक्स पढ़ाना उनकी पसंद थी और लिखना उनका शौक। और अपने इस शौक की खातिर रात रात भर जागना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। 

लिखूं या लाड़ करूं
माँ स्कूल में पढ़ाती थी। स्कूल और घर के कामों के बाद रात को देर तक जागना उनके लिए आसान नहीं था। रात के खाने के बाद बाबा एक मोटे से गलीचे पर बैठकर लिखते रहते थे। जब मैं 8-9 महीने की थी, तब मैं भी शायद देर तक सोती नहीं थी। ऐसे में माँ मुझे उनके पास छोड़ देती थी। बाबा लिखते रहते थे और मैं नींद आने तक वहां खेलती रहती थी। बीच में बाबा की गोद में चढ़ने की कोशिश करती थी। अब सोचती हूँ, तो लगता है कि कितना मुश्किल होता होगा वह वक़्त बाबा के लिए। लिखना अधूरा छोड़ बेटी को लाड़ करना! आज जब मैं लिखने बैठती हूँ, तो पंखे की हल्की-सी तेज़ आवाज़ काफी होती है मुझे डिस्टर्ब करने के लिए। फिर क्या गुज़रती होगी उस नाटककार पर, जब उसका सृजन चरम पर होता होगा, संवाद अपने आप बनते होंगे, नाटक के दृश्य आँखों के सामने आते होंगे और उसे तय करना होता होगा कि वह लिखे या लाड़ करे।

टाइपराइटर की लोरी 
मैं बाबा को लिखता देखकर ही बड़ी हुई। वह लगभग रोज़ ही लिखते थे। और जिस दिन नहीं लिखते थे, मुझे डर  लगता था। शायद तीसरी क्लास में थी मैं, जब लगभा एक महीना उन्होंने कुछ नहीं लिखा। पहला ख़याल मुझे आया कि शायद उन्हें माँ से डाट पड़ी है। आज यह याद करके हंसी आती है, पर तब मैंने इसे ही सच माना था। और मैं खुद को जितना जानती हूँ, मैंने अंदाज़े भी लगाये ही होंगे कि माँ ने उन्हें क्यों डाटा होगा। बाबा कोई गलती करें यह मानना मेरे लिए तब असंभव था और माँ बेवजह कभी नहीं डाटती थी। मैं इस चंता में कितने दिन डूबी रही, कह पाना  मुश्किल है। कई दिनों बाद एक रात मुझे टाइपराइटर की आवाज़ सुनाइ दी। मुझे याद है उस रात मैं निश्चिन्त हो कर सोई। किसी और दिन की तरह टाइपराइटर की आवाज़ से नींद टूटने पर बहार जाकर अपने पिता को आवाज़ न करने का आर्डर देने वाली उस बच्ची के लिए उस रात टाइपराइटर ने लोरी का काम किया था।

पूरे पिता
उस दिन के बाद बाबा का लिखना सिर्फ उनका ही नहीं, मेरा भी पसंदीदा काम था। उस लम्बे ब्रेक के बाद कई रातें उन्होंने लिखने में गुज़ार दीं। सुबह कॉलेज जाते थे, शाम को आकर एक नींद लेते थे और रात भर टाइपराइटर से बातें करते थे। ऐसे में माँ और मेरे लिए उन्हें समय ही नहीं मिल पता था। रात का खाना खाते वक़्त ही उनसे बातें हो सकती थी और उस दौरान वह पूरी तरह पिता होते थे। पर उस आधे घंटे में सवाल पूछना, किस्से सुनना, स्कूल की बातें करना और कभी बिना कुछ बात किए ऐसे ही एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराना नहीं हो पाता था। शुरुआत में मुझे बहुत गुस्सा आता था, पर धीरे धीरे आदत पड़ गई।


ये तुम्हारी किताबें नहीं
एक सवाल जो बाबा हर हफ्ते मुझसे पूछते थे, वह कभी नहीं बदला, "आजकल क्या नया पढ़ रही हो ?" किताबें पढ़ने की आदत मुझे बाबा की वजह से ही लगी। जब से स्कूल जाना शुरू किया, तब से जुलाई महीने के पहले रविवार को वह मुझे किताबों की दुकान में ले जाते थे। स्कूल की किताबों के अलावा हर साल 5-6 किताबें मुझे अलग से मिलती थीं, जिन्हें पढ़ना एक तरह से अनिवार्य होता था। उन किताबों में से 2 मेरी पसंद की होती थीं और बाकी बाबा चुनते थे। मेरे पास हमेशा से ही एक अलग बुक शेल्फ भी था। बाबा की किताबें छूने की मुझे इज़ाज़त नहीं थी। सिर्फ बचपन में ही नहीं बल्कि 19 साल की होने पर भी मैं उनके कलेक्शन को  छू नहीं सकती थी। एकाध बार जब वह घर पर नहीं थे, तब कोशिश की थी। पर पता नहीं कैसे उन्हें पता चल गया था। उन्होंने डांटा बिलकुल नहीं था लेकिन "रेवा, यह तुम्हारी किताबें नहीं हैं " ऐसा ज़रूर कहा था। आज वे सारी  किताबें मेरे पास हैं। मैं जब चाहूं, उन्हें पढ़ सकती हूँ। पर आज भी कोई किताब उठाने  जाती हूँ, तो " रेवा यह तुम्हारी किताबें नहीं है " वाली उनकी आवाज़ कानों पर पड़ती हैं। पहले थोड़ा हिचकती थी, पर अब इस आवाज़ को "हाँ बाबा, पता है " का उत्तर देना सीख गयी हूँ।
****


2. 



एक दिन सुबह-सुबह बाबा कहीं बाहर चले गए। बिना कुछ बोले। वैसे यह मेरे और माँ के लिए कोई नई बात नहीं थी। "आता हूँ थोड़ी देर में" कह कर अक्सर वह चले जाया करते थे। कहाँ गए थे, यह उनके आने पर ही पता चलता था। उनके बताने पर नहीं, बल्कि उन्हें आने में कितना वक़्त लगा है, उससे। मसलन, आधे-पौने घंटे में लौटना, सैर होती थी,  2-3 घंटे का मतलब था दोस्तों के साथ होना और उससे ज्यादा वक्त का मतलब किसी साहित्यिक चर्चा या बैठकी में शिरकत। पर ऐसा अक्सर शाम को ही होता था। उस दिन सुबह-सुबह बाबा के चले जाने से हम दोनों हैरान थे। घंटे भर बाद गरम समोसे और जलेबियाँ लेकर बाबा लौटे। हमें अजीब लगा। घर पर जलेबी सिर्फ माॅं के जन्मदिन पर ही आती थी और उस दिन यकीनन ऐसा कुछ नहीं था। पूछने से पहले ही बाबा रसोईघर से प्लेट लाते  हुए बोले, ''बहुत साल पहले शुरू किया हुआ नाटक आखिर कल रात पूरा हो ही गया। और एक बड़ा-सा जलेबी का टुकड़ा मुहं में डालते हुए बोले "वाह मज़ा आ गया"। मज़ा निश्चित ही जलेबी के उस टुकड़े से नहीं आया था। मुझे आज तक नहीं पता वह नाटक कौन-सा था। लेकिन उनकी आँखों की उस वक़्त की चमक अब भी सामने तैर जाती है। हालांकि तब उनकी आंखों की चमक, चहक और खुशी से ज्यादा मैं जलेबी खाने के लिए मरी जा रही थी।


बी योरसेल्फ
ऐसी बेवकूफियां मैंने कई बार की हैं, पर दो किस्से ऐसे हैं, जिन्हें मैं कभी भुला नहीं सकती। बाबा दिल्ली से लौटे थे। उनकी आदत थी कि कहीं से आने पर वहां का सार हाल विस्तार से बताते थे। सारा  किस्सा बताने के बाद उन्होंने मेरी और देखा और कहा "पता है रेवा, वहां दिल्ली में एक लड़की ने मुझसे ऑटोग्राफ माँगा"।  ''क्या लिखा आपने?'' मैंने पूछा। ''ब़ी  योरसेल्फ " वह बोले। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। शाम को मैं बाबा के पास गई और उन्हें इडियम्स एंड फ्रसेस की किताब थमाते हुए बोली, ''अगली बार कोई ऑटोग्राफ मांगे, तो इसमें देख लेना। कुछ बहुत आसन है। आप चाहो तो मैं आपको याद करा सकती हूँ।'' उन्होंने किताब मुझसे लेकर अपने बैग में रखी और कहा, ''अगली बार याद रखूंगा'' और जोर से हंस पड़े।

चालू रखो
ऐसा ही एक और मजेदार किस्सा हुआ था, जब मैं आठवी क्लास में थी। माँ से मेरे झगड़े बढ़ने लगे थे। छोटी बातों पर से लेकर बड़े झगड़े, रोना-मानना, डांट खाना, यह सब उस उम्र की किसी भी लड़की के लिए नॉर्मल होता है। एक दिन हम दोनों झगड़ रहे थे। बाबा बहर बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे। उन्हें हमारे झगड़ों से फर्क पड़ना बंद हो गया था। माँ और मैं अपनी बात पर अड़े हुए थे। अचानक बाबा कमर में आए। उन्हें देखकर हमने झगड़ा बंद कर दिया। बाबा बोले, ''चालू रखो''। हमें समझ नहीं आया। मुझे लगा मैंने कोई बहुत गलत बात कह दी है अपनी धुन में और बाबा मुझसे गुस्सा होकर यहाँ आये हैं। मैं चुप थी। माँ ने उनसे पुछा "क्या हुआ? आप यहाँ क्यों आए ?" बाबा मुस्कुराते हुए बोले "अपने लिए संवाद इक्कट्ठा करने।" ''मतलब?'' मैंने पूछा। ''मतलब यह कि जिस तरह तुम दोनों झगड़ा करती हो, इस दौरान जैसी बातें करती हो, उससे मेरे नाटक के कई दृश्य लिखे जा  सकते हैं।'' बाबा की इस बात से झगड़ा बंद हो गया। कमरे में हंसी फैल गई। हालांकि एक लम्बी शाम की सैर पर मैंने बाबा से पूछ ही डाला, "बाबा आप सचमुच हमारे झगड़े पर नाटक लिखेंगे?" "पता नहीं बेटी। " "वैसे बाबा आप चाहो तो मैं आपकी मदद कर सकती हूँ। आपको उन झगड़ो के बारें में बताकर जो तब होतें हैं जब आप घर पर नहीं होते।" "सोचता हूँ " चलते-चलते ही मेरे सिर पर हल्की चपत देकर वह बोले। "और अगर मैं उस नाटक में काम करू तो आपको और भी आसानी हो जायेगी। " बाबा जोर से हंस पड़े और बोले "फिर तो मुझे नाटकों से रिटायर होना पड़ेगा।"

इतना आसान था कहना 
बारहवीं की पढ़ाई के बाद आगे पढ़ने के लिए मुझे पुणे भेजना तय हुआ। यह बाबा का ही फैसला था। पुणे आने पर बाबा और मेरी बातचीत बहुत कम हो गई। फ़ोन पर ज्यादा बातें माँ से ही होती थीं। हॉस्टल, नई जगह, नए दोस्त, इन सब में मेरा मन रम गया था। दिवाली की छुट्टियाें में वापस घर आई। लेकिन ऐसी छुट्टियां जल्दी ख़त्म हो जाया करती हैं। पुणे वापस आई, तो पढ़ाई और परीक्षा में उलझ गई। ग्रेजुएशन की पहले साल की फाइनल परीक्षा के दिन बाबा का मुझे फ़ोन आया। वह मुझे लेने आने वाले थे। अगले दिन ही बाबा पुणे आ गए और परीक्षा के बाद हम ग्वालियर के लिए रवाना  हुए। ट्रेन में बाबा बोले "रेवा मुझे तुम्हें कुछ बताना है " मैं किताब पढने में मग्न थी। बाबा की तरफ देखा, तो पहली बार वो मुझे थके हुए दिखाई दिए। "क्या हुआ बाबा ? " "रेवा माँ को कीमोथेरेपी दी जा रही है।" "माँ को कैंसर है?"" मैंने पूछा। "तुम्हे कीमोथेरेपी के बारे में पता है? "" बाबा बोले। "हाँ बाबा मैंने पढ़ा है " मैंने डूबते मन से कहा। एक लम्बी सांस छोड़ते हुए बाबा बोले, " और मैं इतने दिनों से इसी उलझन में था कि तुम्हे कैसे बताउंगा। इतना आसन होगा पता नहीं था।"

कैंसर और कढ़ाई
ग्वालियर पहुंंचने के कुछ दिन बाद हम माँ को लेकर मुंबई आए। टाटा मेमोरियल में जाँच के बाद हमें बताया गया कि आगे की कीमोथेरेपी पुणे में होगी। पुणे में किसी रिश्तेदार के खाली पड़े मकान में हम अगले 6 महीने रहे। ये 6 महीने हम तीनो के लिए अलग-अलग तरह से कष्टदायी थे। माँ की तबियत उन्हें परेशान करती थी। बाबा और मैं भी बहुत कम सो पाते  थे। मेरा कॉलेज शुरू होने पर मुश्किलें और भी बढ़ गईं। पर एक अच्छी बात  यह हुई थी कि हम फिर से वॉक पर जाने लगे थे। बाबा तब भी रोज़ लिखते थे। रात को माँ के सो जाने के बाद लिखने बैठते थे। एक वॉक पर मैंने उनसे पूछा, "आप अब भी कैसे लिख पाते हैं? " "अब भी मतलब? " उन्होंने कुछ हैरत से पलटकर पूछा। "मतलब आप थक जातें है। मुश्किल वक़्त चल रहा है, फिर भी लिखने पर कंसन्ट्रेट करना कैसे मुमकिन हो पाता  है? " बाबा ने तब मेरा हाथ थाम कर कहा, '' बेटी, जो भी हमारे परिवार के साथ हो रहा है निश्चित ही  निराश करने वाला है। जब तुम्हारी माँ को ऑपरेशन थिएटर में ले जा रहे थे, तब एक पल के लिए मुझे लगा कि वह अब कभी वापस नहीं आएगी। तुम यकीन करोगी, उस दिन नाटक का एक पूरा दृश्य लिख डाला था मैने। पूरी रात और पूरा दिन बस लिखता ही रहा। और तब मुझे पता चला की ज़िन्दगी पर ध्यान देना हो, तो लिखना पड़ेगा। डिटैच  नहीं हुए रेवा, तो ज़िन्दगी को समझना दूर, हम ज़िंदा ही नहीं रह पाएंगे।जानती हो न तुम्हारी माँ आजकल एक चादर पर कढ़ाई  कर रही है। इसलिए तो नहीं कि उनका वक़्त नहीं कटता,  है न ?" मैं चुप थी। वह बोल रहे थे। मानो नाटक का कोई पात्र अपने मोनोलॉग की सबसे जरूरी बात बयां कर रहा हो, " सहारे की ज़रूरत सबको पड़ती है। फिजिकल हो या इमोशनल।'' और फिर मेरे लिए यह नसीहत, '' मैं चाहता हूँ की तुम भी लिखती रहो।

बहुत देर होने से पहले
माँ की कीमोथेरेपी अगस्त में पूरी हुई। कुछ ही दिनों में माँ-बाबा गवालियर चले गए और मैं वापस हॉस्टल आ गई। दिवाली की छुट्टियों में घर गई, तो पता चला माँ की तबीयत बहुत ख़राब हो चुकी है। उन दोनों ने ही मुझसे यह बात छुपकर रखी थी। मैं वापस पुणे नहीं आना चाहती थी, पर बाबा ने मेरी एक नहीं सुनी और 3 दिन बाद ही मुझे वापस भेज दिया। पुणे आने के बाद मेरी उनसे फ़ोन पर लगातार बातचीत होती रहती थी। 29 दिसंबर, 2001 को मैं ग्वालियर आई थी। माँ बात तक कर पाने की हालत में नहीं थी। बस लेटी  रहती थी।  इशारों से बातें समझना मुश्किल होता जा रहा था। कैंसर पेट मैं फैल चुका था। दिसंबर 31 को मेरा पुणे वापस जाना तय था क्योंकि बाबा ने ग्वालियर पहुँचने से पहले ही मेरे पुणे जाने का रिजर्वेशन करा कर रखा था। जाते वक़्त बाबा स्टेशन पर छोड़ने आए। मैंने उनसे मिन्नत की, "बाबा मैं नहीं चाहती आपसे झगड़ना पर प्रॉमिस कीजिए कि बहुत देर होने से पहले आप मुझे घर आने देंगे।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और बोले "आय प्रॉमिस।"


सब ख़त्म
24 जनवरी, 2002 को मैं फिर से ग्वालियर स्टेशन पर थी। सुबह 3:55 पर बाबा मुझे लेने आए थे। रास्ते में उन्होंने बस इतना ही कहा था," रेवा, यू रिमेम्बेर माय प्रॉमिस? दिस इस द टाइम।" जनवरी 25 को माँ चली गई। बाबा ने सबसे पहला फ़ोन मेरी मौसी को किया। "विजया, सब ख़त्म।" बस इतना कहकर उन्होंने फ़ोन रख दिया और अन्दर के कमरे में चले गए। मैं भी उनके पीछे गई। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। दोनों की आँखों में एक भी आसूं नहीं। हमने एक-दूसरे को गले लगाया और बाबा ने धीरे से कहा "रेवा, अब बस तुम और मैं। हम दोनों ही रह गए। " मैंने उनकी आवाज़ में इतनी निराशा कभी नहीं सुनी थी। फिर थोड़ा रुक कर बोले, "अंतिम संस्कार के बाद तुम पुणे वापस जाओगी। 2 दिन बाद का रिजर्वेशन करा लो। पर उससे पहले हम वॉक पर जाएंगे।''

प्यार, अादर, फ़िक्र, नाराज़गी...
अगले दिन मैं और बाबा घर पर आए हुए रिश्तेदारों की परवाह न करते हुए वॉक पर गए। फिर कॉफ़ी  हॉउस। वहां हम तीनों अक्सर जाया करते थे। कॉफी मंगाकर थोड़ी देर वह चुप रहे। फिर बोले, "जानती हो, जब मेरी माँ का मरी थी, तब मैं 19 साल का था। आज तुम भी 19 साल की ही हो। मैं समझ सकता हूँ, तुम किस प्रक्रिया में हो। घर पर मुझे सब बता रहे थे कि तुम बहुत चुप हो। रोई भी नहीं हो। कोई जल्दी नहीं है रेवा। तुम अपना वक़्त लेना। उनकी बात बीच में ही काटते हुए मैं बोली "बाबा आप मुझे घर क्यों नहीं आने देते थे ?" बाबा बोले, "क्योकि मैं नहीं चाहता था कि तुम माँ को उस हालत में देखो। वह एक जिंदादिल महिला थी। स्ट्रॉंग, सेल्फ कॉंफिडेंट। हमेशा खुश रहने वाली। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारी इस उम्र में जब तुम्हें आगे की ज़िन्दगी के सपने देखने चाहिए, तुम उसे ख़त्म होते देखो।"  "पर आपने भी तो आपकी माँ को इसी उम्र में देखा था, फिर मुझे क्यों रोका ? "मैंने थोड़े गुस्से से पूछा। "रेवा, मेरी माँ कुए में गिर गई थी। मैंने उसे मरा  हुआ देखा था। मरते हुए नहीं। तुम्हारी माँ की हालत बहुत ख़राब थी। मुझसे भी नहीं देखी जाती थी। फिर मैं कैसे तुम्हें यहाँ बुला लेता? मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी।" मैंने गहरी सांस ली। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझमें उनके लिए प्यार और आदर था कि फ़िक्र या नाराज़गी!

वॉशरूम में रुलाई 
अगले दिन मुझे पुणे वापस आना था. सामन ज्यादा नहीं था इसलिए मैं और बाबा पैदल ही स्टेशन की तरफ चल दिए। "बाबा आप रोये? " रस्ते में मैंने पूछा। "हाँ कल रोया मैं ।" "कब? कहाँ? घर में कितने सारे लोग हैं? " "रेवा, कितने भी लोग हों, एक जगह हम अकेले ही होतें हैं।" ''वॉशरूम'', हम दोनों एकसाथ बोल पड़े। बहुत दिनों के बाद हम मुस्कुरा रहे थे। घर से स्टेशन तक की यह वॉक हमारी आखरी वाक थी। उसके बाद बाबा ने कभी मुझसे नहीं पूछा और मैंने भी पहल न करना ही ठीक समझा। माँ के जाने के बाद हमारे बीच बात करने को कुछ बचा ही नहीं था। पहली बार मुझे समझ आया कि माँ मेरे और बाबा के बीच की वह कड़ी थी, जिसके बिना हम बस दो अजनबी थे। उस साल दीवाली की छुट्टियों में जब घर गई, तो बाबा अचानक बहुत बूढ़े दिखाई दिए। 10-15 दिन जब मैं वहां थी, मैंने देखा कि रसोईघर में उनकी फेवरेट लेमन टी की जगह शराब ने ले ली थी। ऐसा नहीं था कि मुझे  अंदाजा नहीं था। पर फिर भी मुझे यह सब अजीब लग रहा था। वह दिन भर लिखते रहते थे। शाम को पीते थे और कभी दोस्तों से मिलने चले जाया करते थे। मुझसे ज्यादा बात नहीं करते थे। क्या नया पढ़ रही हो, कुछ नया लिखा क्या, ऐसे सवाल बीते दिनों की बात हो चुकी थी।

साथ रहेंगे!
पुणे आने के बाद बाबा से मेरा कांटेक्ट और कम हो गया। महीने में दो फ़ोन। बस। ऐसे ही 6-7 महीने और गुज़र गए और मेरा ग्रेजुएशन ख़त्म हो गया। आगे की पढ़ाई मैं ग्वालियर में बाबा के साथ रहकर करना चाहती थी। पर बाबा नहीं माने और उन्होंने मुझे भेज दिया जबलपुर मेरी मौसी के पास। मुझसे कहा की उन्हें जर्मनी जाना है और ग्वालियर में अकेले रहना ठीक नहीं। बाबा जर्मनी जाने वाले थे, यह पता था मुझे, पर दो ही महीने में वापस भी आने वाले थे। बहुत मिन्नतें, झगड़े करने पर भी उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी और मैं पुणे से सीधे जबलपुर आई। जुलाई में मेरा कॉलेज शुरू हो गया। मैं बाबा से नाराज़ थी और उनसे बात करना बंद कर दिया था। मेरे हालचाल उन्हें मौसी से ही पता चलते थे। अगस्त में मेरे जन्मदिन पर मुझे मनाने वह जबलपुर आए। बाबा ने लेमन टी का लालच देकर रसोईघर में खाना बनाने के लिए मुझे उकसाया पर मैं  नहीं मानी। आखिरकार जब उन्होंने प्रॉमिस किया कि अगली छुट्टियों में मैं ग्वालियर आ सकती हूँ और वह वक़्त सिर्फ हमारा होगा, तब जाकर मैंने बाबा से बातचीत शुरू की। कुछ दिन बाद बाबा ग्वालियर चले गए। जाते-जाते बोले "एक नाटक लिख रहा हूँ ब्रह्मा पर, उसी सिलसिले में पुष्कर जाना है। फिर जयपुर में एक मित्र है अर. दी  मन्त्रि. उनके घर भी जाऊंगा। लौटने पर विस्तार से बात करेंगे।'' 14 सितंबर, 2003 को उन्हें जयपुर में ही दिल का दौर पड़ा। सवाई मानसिंह हॉस्पीटल में भर्ती हुए। अगले दिन उनसे मेरी बात हुई, तो बोले "रेवा, मैं ठीक हो जाऊं , फिर जबलपुर आता हूं। साथ ही रहेंगे।" 17 सितंबर सुबह 3 बजे फ़ोन की घंटी बजी। फ़ोन मैंने ही उठाया।  उधर से आवाज़ आई "आप नाग बोडस जी की बेटी बोल रही हैं? "जी ", मैं बोली। "नाग बोडस जी नहीं रहे" उसी आवाज़ ने कहा। मैंने बाकी फोन सुनने के लिए मौसी को बुला लिया और बरामदे में आ गई। कुछ समझ नहीं आ रहा था। साथ रहेंगे वाली बाबा की आवाज़ दिमाग से जा ही नहीं रही थी। अब आगे क्या? एक अजीब-सी बैचनी हो रही थी। थोड़ी देर बाद मौसी भी बरामदे में आ गई। वह मुझसे कुछ कह रही थी, पर मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया। कुछ कपड़े बैग में डालकर हम दिल्ली रवाना हुए, जहाँ बाबा का अंतिम संस्कार किया जाना था।

शायद, शायद, शायद ...
जिस दिन माँ गई, तब बाबा के कहे ''सब ख़त्म" का अर्थ मुझे अब समझ में आता है।  माँ के जाने के बाद बाबा को भी ऐसे ही लगा होगा, जैसा मुझे लगता है। कई बार लगता है। पर मुझे हमेशा ही उन्हें बताना था की मैं थी। उनके लिए हर हाल में। शायद मुझे छोटी समझते थे या हो सकता है एक पिता अपनी बेटी के सामने कमज़ोर न पड़ना चाहता हो। इसिलए हमारी वह वॉक जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि वह रोए, हमारी आखरी वॉक थी। अपने अकेलेपन को मुझसे छुपाने के लिए ही शायद उन्होंने मुझे जबलपुर भेज दिया था। और वह अपनी जगह बिलकुल सही थे। कोई भी पिता नहीं चाहेगा की उसकी बेटी पिता  की उजाड़ ज़िन्दगी देखे। और मैं उन्हें कभी यह भरोसा ही नहीं दिला पाई कि हमारे साथ रहने से ज़िन्दगी की नीरसता कम हो सकती है। पता नहीं ऐसा क्या हो गया था हमारे  बीच कि हम दोनों एक-दूसरे  से इतने दूर हो गए थे। शायद जयपुर से लौटने के बाद मुझे मौका मिलता उनसे दोस्ती करने का। उन्हें जानने-समझने का। पूछने का कि रात रात भर जागकर आखिर वह लिखते क्या थे? क्यों मैं उनका लिखा एक भी नाटक पढ़ नहीं सकती थी? क्यों मुझे उनकी किताबें छूने की इजाज़त नहीं थी? लेमन टी इतनी ज़रूरी क्यों थी? कॉलेज से रिटायर होने के बाद जीन्स और कुरता ही पहनना क्यों पसंद था उन्हें? फ्रेंच कट की दाढ़ी ही क्यों रखी थी उन्होंने? मेरे जैसी बेटी पाकर क्या वो खुश थे? मेरी वजह से क्या उन्हें कभी बहुत ख़ुशी या निराशा  हुई थी? उनके लिए क्या ज्यादा ज़रूरी था? पत्नी और बेटी या लिखना? इन सब सवालों के जवाब मुझे मिल पाएँगे अब।
****

नाग बोडस के बारे में :    







{ रेवा नाग बोडस मराठी और हिंदी में एक समान लेखन करती हैं. पुणे में रहती है. नाग बोडस की तस्वीरें रेवा के सौजन्य से. }
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
प्रत्यक्ष की त्वचा से नीचे