Sunday, November 15, 2009

सबद पुस्तिका : २ : कुंवर नारायण

( कुंवरजी का यह ताज़ा लेख पहलेपहल सबद पुस्तिका के रूप में यहाँ छप रहा है, यही बहुत खुशी की बात है। ८२ की उम्र में भी उनकी मेधा, चिंतन-प्रक्रिया और कवि-कर्म में कोई शैथिल्य नहीं आया है। इस बात की पुष्टि जितना आगे दिया जा रहा यह लेख करता है, उतना ही उनका नवीनतम काव्य-संग्रह 'हाशिए का गवाह' भी। कविता-संग्रह पर एक पढ़त और कुछ कविताएं यहाँ जल्द सामने होगी।)

साहित्य और आज का समाज

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक अब लगभग समाप्ति पर है। पिछले दस वर्षों में हुए परिवर्तनों पर एक उड़ती नज़र डालें तो कुछ ख़ास बातें सामने आती हैं जिनका समाज और साहित्य दोनों के लिए परिवर्तनकारी महत्वा रहा है। जैसे, आर्थिक, राजनीतिक और भाषाई दृष्टियों से एशियाई देशों - ख़ासकर भारत और चीन - का विश्व-शक्तियों के रूप में उभारना। हिन्दी साहित्य और समाज से सम्बंधित ऐसे कुछ सवालों की ओर ध्यान जाता है जो उपरोक्त तीनों विषयों से अलग रख कर नहीं सोचे जा सकते।

यह तथ्य कि हिन्दी इस समय संसार की प्रमुख भाषाओँ में से है, देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों से अनिवार्यतः जुड़ा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे मुख्यतः व्यावसायिक और राजनीतिक कारण हैं, तथा मीडिया और प्रचार-प्रसार की टेक्नोलॉजी में विकास ने हिन्दी भाषा को नई तरह की ज़रूरतों से जोड़ा है। भाषा की क्षमता बढ़ी है। वह एक ज़्यादा बड़े हिन्दी-भाषी समुदाय तक पंहुच रही है। उसके द्वारा जनमानस तक क्या संदेसा पंहुच रहा है- इसके गहरे अध्ययन से समाज के लिए आज साहित्य की उपयोगिता का प्रश्न जुड़ा है। इस संदेशे के पीछे किस तरह के अंदेशे और उद्देश्य काम कर रहे हैं इस पर ही, बहुत कुछ, समाज में साहित्य जैसी चेष्टाओं का महत्व निर्भर है।

शुरू में ही 'सामजिक यथार्थ' और सामजिक चेतना' के बीच एक बारीक, किंतु आवश्यक, फ़र्क करते हुए अपनी बात कहना चाहता हूँ।

भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यन्त जटिल, बहुस्तरीय और रूढिबद्ध है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेज़ी से नहीं कि वह 'सामाजिक चेतना' को बदल दे। इससे पहले, और इससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से, वे शक्तियां सामाजिक चेतना को बदल रही हैं जिन्हें आज साफ़-साफ़ बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पहचाना जा सकता है। उनका अपना तिजारती तंत्र है जो अच्छी तरह जानता है कि नई-नई चीजों के लिए आदमी की भूख को कैसे बढ़ाया जाए। वह तंत्र अत्यन्त विक्सित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों से भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति हमारी स्वाभाविक आसक्ति को पुष्ट करता रहता है।

मेरी बात से यह नकारात्मक निष्कर्ष निकलने की जल्दी न की जाए कि मैं औधोगिक प्रगति को एक सिरे से खारिज कर रहा हूँ। उसके लाभ भी सब तक पंहुच रहे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता- लाभ जो हमें एक बेहतर ज़िन्दगी दे रहे हैं। मेरी कोशिश सिर्फ़ उस असंतुलन की ओर ध्यान खींचना है जो आज के समाज में, सारी प्रगति के बावजूद, एक गहरा असंतोष, विसंगति और विषमता भी पैदा कर रहा है।

साहित्य एक शाब्दिक-कला है, भाषा से अनिवार्यतः जुड़ी हुई। वह सामजिक-चेतना को सीधे संबोधित करती है, किसी अन्य विषय की भाषा और व्याख्या के मार्फ़तनहीं। वह जीवन की भाषा है- सच्ची और बेबाक़। अपनी तरह विभिन्न विषयों से संपर्क रखते हुए भी वह अपनी बात कहती है। उसका यह अधिकार आज भी सुरक्षित है, लेकिन उसकी आवाज़ जिन कानों तक पहुंचनी चाहिए उन्हें एक ऐसे शोरगुल ने घेर रखा है कि साहित्य, ख़ासकर कविता, जैसी कोशिशों की उपस्थिति ही महसूस नहीं होती। संक्षेप में, सामजिक-चेतना से साहित्यिक-चेतना का सीधा संवाद सम्भव नहीं हो पता रहा। क्या यह सिर्फ़ साहित्य के लिए एक चुनौती है ? या एक शिक्षित समाज के लिए भी कि वह, जाने-अनजाने, मानव-समाज की एक अत्यन्त समृद्ध सांस्कृतिक चेष्टा से वंचित होता न चला जाए ?

थोड़ा आत्मचिंतन साहित्य, विशेषतः कविता, की ओर से भी ज़रूरी है। बीसवीं सदी की काव्यचेतना ने जिन कुछ बीज-शब्दों और सन्दर्भ-पदों के आधार पर अपनी एक अलग 'पहचान' बनाई उन पर भी थोड़ा गौर अब ज़्यादा प्रासंगिक जान पड़ता है। या शायद, अब अधिक प्रासंगिक हो गया है। ध्यान देन कि अधिकांश शब्द उन विषयों से लिए हुए शब्द थे जो साहित्य से बहार के विषय थे। 'आधुनिकता' शब्द इतना आधुनिक भी नहीं था जितना हम समझ रहे थे- लगभग ५०० वर्ष पुराना इतिहास है उसका। बोद्लेअर जैसे फ्रेंच कवि ने बहुत पहले ही उसके छिछले आशयों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी। 'क्रांति' राजनीति का शब्द था : फ्रेंच और रूसी क्रांतियों से निकला शब्द, जिसके बरक्स 'औद्योगिक क्रांतियों' और गाँधी की 'नैतिक क्रांति' के भी उदाहरण थे। हम सब चाहते थे कि दुनिया बदले : वह बदलती रही, और अब भी बदल रही है- लेकिन उस तरह नहीं जैसे हम चाहते थे : वह कुछ इस तरह बदली कि उसने हमें बदल दिया।

'परिवर्तन' का जूनून चढ़ता उतरता रहा। 'प्रगति' शब्द, ख़ासतौर पर उद्योग-धंधों की दुनिया का शब्द, मानव-समाज में मानो एक नई मशीन की तरह आया, कुछ दिन तेज़ी से चला, फ़िर बराबर मरम्मत मांगता रहा। 'प्रयोग', सीधे किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला से उठाया हुआ शब्द। आकर्षक, लेकिन ज़ल्दी ही किसी 'नए' प्रयोग की ज़रूरत के सामने खारिज हो गया ! इस भीड़ में 'नया' शब्द सबसे निरीह लगता है जिसे देखते-देखते बाज़ारवाद ने और उपभोक्तावाद ने समूचा हड़प लिया ! मानो अब उसका कोई मतलब साहित्य के काम का न हो, सिर्फ़ बाज़ार के मतलब का हो।

कविता में 'तकनीक' और 'शिल्प' वगैरह की पदावली आज की हर क्षेत्र में विकसित टेक्नोलॉजी के सामने फ़ुटनोट की तरह लगती है। नए का मतलब नई-नई चीजें ! 'नई' का 'कविता' के साथ कोई योग नहीं बैठता ! नया कुछ चाहिए तो हम बाज़ार की तरफ़ देखते हैं, नई कविता की तरफ़ नहीं।

तो फिर ऐसी कविता, जिसके सारे संदर्भ-साधन छिन चुके, क्या दे सकती है समाज को ? या अभी ऐसा कुछ बचा है, कविता और समाज के बीच, जो दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है ? हम नई कोई चीज़ चाहते हैं तो बाज़ार की ओर दौड़ते हैं, लेकिन आत्मिक कुछ चाहते हैं तो कविता की ओर देखते हैं। प्रेम में, दुःख में, उदासी में, अकेलेपन में, मुश्किलों में, बेबसी में, भावुक क्षणों में क्यों हमें अनायास याद आती हैं कविताएं ? वह अजीब-सा, रहस्यमय 'कुछ' जो हमें मिलता है सिर्फ़ कविता से, क्या वह हमें मिल सकता है बाज़ार से ?

मैं उस कविता-बराबर ज़रा-से 'कुछ' को परिभाषित नहीं करना चाहता- चाहूँ भी तो नहीं कर सकूँगा। पर इतना जानता हूँ कि वह हमारी प्राणवायु की तरह सूक्ष्म है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। वह एक सीमारहित, अपरिभाषित दुनिया है। उसकी अपनी शर्तें हैं। हम उसमें जाते हैं हमेशा ही कुछ पाने के लिए नहीं ; कभी-कभी अनायास उसमें खो जाने के लिए - कहीं भी, किसी भी समय में। भाषा में संभव इस अद्भुत कला को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहूँगा। जिगर साहब के इस शेर को अक्सर याद करता हूँ :

ज़रा-सा दिल है लेकिन कम नहीं है
इसी में कौन-सा आलम नहीं है

आज के समाज में मैं कविता की ज़रूरत और उसकी उपस्थिति को कुछ इस तरह सोचता हूँ कि वह मुख्यतः एक 'सूचनापरक' विधा नहीं है। इस माने में वह साहित्य की अन्य विधाओं से बहुत भिन्न है। वह मूलतः अत्यन्त उदार और उदात्त अर्थों में, 'आत्मचिंतन' की भाषा है। आत्मचिंतन को संकुचित करके 'आत्म-केंद्रित' के अर्थों में न लें : निहायत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक भाषा भी बिल्कुल स्वार्थी अर्थों में आत्म-केंद्रित हो सकती है। कविता जितना कुछ जीवन के बारे में कहती है, उससे कहीं अधिक उस भाषा को ही एक सार्थक रचनात्मक अनुभव बना कर कहती है जिस भाषा में वह काव्य-रचना करती है। इसीलिए कविता हमेशा ही अपने को परिसीमित करनेवाले सन्दर्भ-पदों और शब्दावली का उल्लंघन और अतिक्रमण करने के लिए बाध्य है।

रचनात्मक ऊर्जा विस्फोटक होती है। अस्तित्व में आने के बाद ही उसकी 'पहचान' और 'नियम' बन पाते हैं। इसीलिए उसकी पारिभाषिक शब्दावली कभी भी उसके स्वरुप-निर्धारण में पर्याप्त नहीं ठहरती। जिस तरह भाषा, व्याकरण के नियमों को तोड़ते हुए, जीवन के साथ-साथ चलते हुए बदलती और विकसित होती है, उसी तरह भाषा में बसी कविता भी, जीवन के 'साथ' चलती है। इस 'साथ-चलने' के अर्थ को विस्तृत करके इस तरह समझें कि वह अपने समय के जीवन के साथ लगातार एक अत्यन्त संवेदनशील संवाद है जिसमें केवल सहमतियाँ ही नहीं प्रतिरोधों की भी पूरी गुंजाइश है।

इस अंतरंग संवाद से छन कर जो काव्यविवेक निकलता है उसके पीछे केवल 'तात्कालिक' और 'स्थानिक' सन्दर्भ नहीं होते, एक व्यापक और सर्वकालिक जीवनानुभव से निकली हुई वे ध्वनियाँ और अंतर्ध्वनियां भी होती हैं जिनसे एक सुसभ्य और न्यायप्रिय मानव-समाज की चेतना बनती है। इसे जीवित रखना ज़रूरी है। कविता इसे जीवित रखने की एक विनम्र कोशिश है।

( रचना तिथि : ५ नवम्बर, २००९ )
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