सबद
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सबद विशेष : 17 : नोबेल भाषण - पैट्रिक मोदियानो

12:39 p.m.



अनुवाद : गीत चतुर्वेदी


सबसे पहले तो मैं यह साफ़-साफ़ कहूंगा कि आप सबके सामने यहां आकर मैं बेहद प्रसन्न हूं और इस बात ने मुझे गहरे छुआ है कि आप लोगों ने मुझे साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना।

यह पहला मौक़ा है, जब मैं श्रोताओं की इतनी बड़ी संख्या के सामने बोलने खड़ा हूं, और इसी नाते मैं बेहद सशंकित भी हूं। यह कल्पना करना आसान है कि लेखक ऐसी स्थितियों का सामना आसानी से कर लेते हैं, लेकिन लेखक- ख़ासकर उपन्यासकार- का वाणी या वक्तत्व के साथ बेहद असहज रिश्ता होता है। मुझे याद पड़ता है कि स्कूलों में दो कि़स्म की परीक्षाएं होती हैं, लिखित और मौखिक; उपन्यासकार के भीतर लिखित परीक्षा के लिए ज़्यादा लियाक़त होती है बजाय मौखिक अभ्यासों के। वह चुप रहने का आदी होता है, और जब उसे वातावरण को आत्मसात करने की आवश्यकता होती है, तब उसे भीड़ के भीतर घुल जाना चाहिए। वह बिना प्रकट हुए वार्तालापों को सुनता है, और अगर वह उन वार्तालापों में शामिल होता है, तो महज़ इसलिए कि वह अपने विशेष प्रश्नों से अपने आसपास मौजूद स्त्री-पुरुषों के बारे में अपनी समझ को सुधार सके। उसकी वाणी सकुचाई हुई होती है क्योंकि उसे अपने शब्दों को काट देने की आदत होती है। यह सच है कि कई-कई बार ड्राफ्ट बनाने के बाद उसकी शैली अचूक दिखने लगती है, लेकिन जब वह बोलने खड़ा होता है, तब उसके पास अपनी लडख़ड़ाती-हकलाती हुई वाणी को सही करने का कोई ज़रिया नहीं होता।

मैं उस पीढ़ी का हूं, जिसमें बच्चों को देखा जाता था, सुना नहीं जाता था। सुना भी ख़ास मौक़ों पर ही जाता था, वह भी पहले से अनुमति मिले होने पर। लेकिन उन्हें कोई नही सुनता था और लोग उनके बोलने पर भी, ख़ुद भी बोलते ही रहते थे। शायद इसीलिए बोलने में हमें कठिनाई होती है। हम कभी संकोच में बोलते हैं, तो कभी इतनी तेज़ी से बोलते हैं मानो एक भय हो कि किसी भी समय हमारी बात को काट कुछ और बोला जाने लगेगा। शायद यही कारण है कि बचपन समाप्त होते-होते मुझमें लिखने की इच्छा जाग गई। इस उम्मीद में कि आप जो लिख रहे हैं, उसे बड़े लोग पढ़ेंगे। तब वे बिना बीच में काटे आपकी बात पूरी तरह सुनेंगे और तब उन्हें पता चलेगा कि आपके सीने के भीतर भी कुछ चलता है।

जब इस पुरस्कार की घोषणा हुई, तो मुझे लगा कि यह कोई झूठ है। आश्चर्यचकित, मैं यह जानना चाहता था कि आप लोगों ने मुझे क्यों चुना। उस दिन मुझे यह लगा- कि आज से पहले मुझे यह अहसास भी नहीं था कि कोई उपन्यासकार अपनी ही किताबों के बारे में कितना अंधा हो सकता है, और उसके मुक़ाबले उसके पाठक उसके लिखे हुए को कहीं ज़्यादा बेहतर जान सकते हैं। उपन्यासकार कभी अपना पाठक ख़ुद नहीं हो सकता है, सिवाय उन मौक़ों के, जब वह अपनी पांडुलिपियों की ग़लतियों को सुधारने, दोहरावों को मिटाने या फ़ालतू पैराग्राफ्स को काटने बैठता हो। अपनी किताबों के बारे में उसके मन में एक आंशिक व भ्रामक छवि होती है, जैसे कोई पेंटर किसी मचान पर लेटकर भीतरी छत पर बहुत बारीकी से कोई भित्तिचित्र बना रहा हो- वह अपने चित्र के इतना क़रीब होता है कि उसे उसकी संपूर्णता में नहीं देख पाता।

लेखन एक अजीब और एकांतिक क्रिया है। जब आप अपने उपन्यास के शुरुआती कुछ पन्ने लिखने बैठते हैं, तब निराश कर देने वाले कई मौक़े आते हैं। हर रोज़, आपको बारहा यह लगता है कि आप ग़लत राह पर बढ़ चले हैं। इसके कारण आपके भीतर एक अदम्य इच्छा जन्मती है कि आप इसी बिंदु पर लौट चलें और कोई दूसरा रास्ता पकड़ लें। सबसे ज़रूरी यही है कि आप अपनी इस इच्छा के आगे घुटने न टेकें, बल्कि आगे बढ़ते जाएं। यह उसी तरह है, जैसे सर्दी की रात बर्फ़ के ऊपर ज़ीरो विजि़बिलिटी या दृश्यता में कार चलाना। आपके सामने कोई चारा नहीं, आप रिवर्स लेकर वापस नहीं जा सकते, आपको आगे ही बढऩा है और बार-बार ख़ुद को यह भरोसा भी दिलाना है कि सब ठीक हो जाएगा, जल्द ही कोहरा छंट जाएगा, रास्ता एकदम साफ़ हो जाएगा।

जब आपकी किताब पूरी होने वाली होती है, तब आपको महसूस होता है कि उसने ख़ुद को आपसे दूर करना शुरू कर दिया है, और अब वह खुली हवा में आज़ाद सांस लेने लगी है, जैसे कि गरमी की छुट्टियों के ठीक पहले कक्षा में बैठे बच्चे। मैं तो यहां तक कहना चाहूंगा कि जब आप अंतिम पैराग्राफ्स लिख रहे होते हैं, तब तक किताब आपसे एक ख़ास कि़स्म का बैर कर लेती है और आपसे रिश्ता तोड़ लेने की जल्दबाज़ी मचा लेती है। और वह आपको छोड़कर चली भी जाती है, बमुश्किल आपके पास इतना वक़्त बचता है कि आप आखि़री कुछ शब्द लिख सकें। ख़त्म हो गया भाई- अब किताब को आपकी कोई ज़रूरत नहीं है। वह आपको भूल चुकी है। इस क्षण के बाद से वह ख़ुद को अपने पाठकों के ज़रिए खोजेगी। जब ऐसा होता है, आप ख़ालीपन की एक अनुभूति से भर जाते हैं, ऐसा लगता है, जैसे आप परित्यक्त हों, आप छोड़े जा चुके हैं। एक ख़ास तरह की निराशा भी होती है, क्योंकि आपने बहुत धीरे-धीरे किताब के साथ रिश्ता बनाया था और वह एक झटके में उसे तोड़ गई। 'कुछ तो छूट गया है' की अनुभूति और असंतोष आपको अगली किताब लिखने के लिए संचालित करते हैं, आप चाहते हैं कि अगला लिखकर आप इस स्थिति के साथ संतुलन बना लेंगे, पर वैसा कभी नहीं हो पाता। साल-दर-साल गुज़रते हैं, एक के बाद दूसरी किताब बनती है और पाठक आपके 'बॉडी ऑफ़ वर्क' या संपूर्ण कृतित्च की बात करने लग जाता है। लेकिन ख़ुद आपको लगता है कि यह सब कुछ था ही नहीं, बस, वह सब तो आगे से आगे पहुंच जाने की एक जल्दबाज़ी थी।

तो सही है, पाठक किसी किताब के बारे में लेखक से ज़्यादा जानता है। पाठक और किताब के बीच कुछ वैसा ही घटित होता है, जैसा फोटोग्राफ को डेवलप करते समय होता था, डिजिटल युग से पहले। फोटो को डार्करूम में बनाया जाता था और वह बेहद धीरे-धीरे काग़ज़ पर प्रकट होना शुरू होता था। जब आप किसी किताब को पढऩा शुरू करते हैं, तब ठीक वैसी ही रासयानिक प्रक्रिया घटित होती है। लेकिन लेखक और उसके पाठक के बीच ऐसा मधुर सामंजस्य विकसित हो सके, इसके लिए ज़रूरी है कि पाठक पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर न दिया जाए- जिस तरह अच्छे गायक अपनी आवाज़ पर ज़्यादा ज़ोर नहीं देते। पाठक को अनायास ही अपनी तरफ़ करने के लिए ज़रूरी है कि किताब के भीतर इतनी जगह छोड़ी जाए, जिसमें वह रफ़्ता-रफ़्ता पैठ सके और इस जगह छोडऩे में कलात्मकता हो, कुछ वैसी ही, जैसी एक्यूपंक्चर में होती है- सुई को बस सही जगह पर चुभोना होता है और पूरा स्नायु तंत्र सही तरह काम करने लगता है।

मेरा मानना है कि उपन्यासकार और उसके पाठक के बीच जिस तरह का अंतरंग और परस्पर पूरक संबंध होता है, उसका पर्यायवाची संगीत की दुनिया में है। मैं हमेशा मानता रहा हूं कि लेखन, संगीत कला के बेहद क़रीब है, बस, उसके मुक़ाबले ज़रा-सा अशुद्ध है, और मैंने हमेशा मन ही मन संगीतकारों से ईर्ष्‍या की है, क्योंकि वे ऐसी कला की रचना करते हैं, जो उपन्यासों से बेहतर है। कवि तो उपन्यासकारों के मुक़ाबले संगीतज्ञों के और ज़्यादा क़रीब होते हैं। मैंने बचपन में कविता से शुरुआत की थी और इसीलिए बड़े होने पर जब मैंने कहीं यह पढ़ा कि ख़राब कवि ही गद्यकार बन जाते हैं, तो यह बात मेरे ज़हन से चिपककर रह गई। संगीत की भाषा में कहूं, तो उपन्यासकार को उन सारे लोगों, भूदृश्यों, गलियों को अपने संगीत में लुभाकर ले आना होता है, और एक किताब से लेकर दूसरी किताब तक उसे जारी रखना होता है। पर ऐसा करने के प्रयास में उसे महसूस होता है कि वह ख़ुद 'इम्परफेक्ट' है। उस अफ़सोस होता है कि वह शुद्ध संगीतकार नहीं है और शोपां के नॉक्टर्न्‍स की रचना वह ख़ुद नहीं कर पाया।

उपन्यासकारों में अपने कृतित्व के प्रति अज्ञानता होती है, और उसके प्रति आलोचकीय दृष्टि का अभाव भी होता है, जिसका एक प्रमुख कारण है, यह मैंने ख़ुद अपने व कई दूसरों के भीतर देखा है : मैं जैसे ही किताब लिख कर पूरी करता हूं, पाता हूं कि इस नई किताब ने पुरानी किताब की स्मृतियों को मिटा दिया है। मुझे लगता है कि मैं बार-बार विस्मृत होकर भी एक के बाद एक अलग किताब लिख रहा हूं, लेकिन अक्सर वही चेहरे, वही नाम, वही जगहें, वही मुहावरे किताब-दर-किताब मेरे पास लौटकर आते हैं, जैसे कि आधी नींद में किसी यवनिका में चित्रों का पैटर्न बनाया जा रहा हो। या तो आधी नींद में या तो दिवास्वप्न देखते हुए। उपन्यासकार अक्सर नींद में चलनेवाला व्यक्ति होता है, वह जो लिख रहा है, उसमें बेहद घुसा हुआ होता है, इसीलिए जब वह सड़क पार करे, तो उसे देखकर चिंतित होना स्वाभाविक है कि कहीं यह कुचला न जाए। लेकिन कृपया यह याद रखें कि नींद में चलने वाले लोग बेहद अचूक चलते हैं, इतना अचूक कि नींद के दौरान वे छतों पर भी चलने लगते हैं और कभी गिरते भी नहीं।
सात दिसंबर, 2014 को स्‍टॉकहोम में नोबेल भाषण देते मोदियानो. 

नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद मेरे बारे में जो शब्द कहे गए थे, उनमें से मुझे कुछ विशिष्ट तौर पर दिखते हैं, जो कि दूसरे विश्व-युद्ध के बारे में थे : 'उन्होंने ऑक्यूपेशन के दौरान जीवन-विश्व को प्रकाशित किया।' (दूसरे विश्व-युद्ध के दौरान नात्जि़यों ने कुछ समय के लिए फ्रांस के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था, उस दौर को ऑक्यूपेशन कहते हैं।) 1945 में पैदा हुए अन्य सभी बच्चों की तरह मैं भी युद्ध की संतान था, और चूंकि, मेरा जन्म पेरिस में पैदा हुआ था, इसलिए मेरे पैदा होने का रिश्ता ऑक्यूपेशन के पेरिस से है। जो लोग उस पेरिस में रहते थे, वे जल्द से जल्द उन सारी स्मृतियों को भूल जाना चाहते थे या कुछ नहीं, तो सिर्फ़ रोज़मर्रा की चीज़ों को ही याद रखना चाहते थे, कम से कम ऐसा करके वे ख़ुद को यह यक़ीन दिलाने की कोशिश करते कि रोज़मर्रा का जीवन, आमतौर पर उनके साधारण जीवन से कुछ अलग नहीं था। वह सब एक बुरा सपना था, जिसमें बचे रह जाने का एक धुंधला-सा पछतावा भी था। बाद के बरसों में जब उनके बच्चों ने उस दौर व उस पेरिस के बारे में सवाल पूछे, तो उनके जवाब गोलमोल थे। या उन्होंने चुप लगा ली जैसे कि अपने भीतर से उन सियाह बरसों की स्मृति को खुरच देना चाहते हों और हम सबसे छिपा ले जाना चाहते हों। लेकिन अपने माता-पिता की चुप्पियों का सामना करते हुए हमने ख़ुद-ब-ख़ुद उन स्थितियों का अंदाज़ा लगा लिया, जैसे कि हम अच्‍छी तरह उन्हें जीकर आ रहे।

ऑक्यूपेशन के दौरान पेरिस एक अजीब कि़स्म की जगह था। ऊपरी धरातल पर देखा जाए, तो जीवन 'पहले-सा' ही था- थिएटर, सिनेमा, संगीत-सभागृह और रेस्तरां पहले की ही तरह खुले हुए थे। रेडियो पर गाने बजते थे। थिएटरों और सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा थी, जैसे कि लोग इन जगहों पर एक-दूसरे के साथ की आश्वस्ति पाने, शरण लेने आते हों। लेकिन ऐसी कई विचित्र तफ़्सीलें भी थीं, जो संकेत देती थीं कि पेरिस अब पहले जैसा नहीं रहा। कारों की अनुपस्थित उसे एक मौन शहर बना देती थी- एक ऐसा सन्नाटा, जो पेड़ों की सरसराहट की आवाज़ को और उभार देता, घोड़ों की टापों की आवाज़ को, लोगों के पैरों की आवाज़ को और उनकी ख़ुद की आवाज़ की भिनभिनाहट को। सर्दियों की शाम पांच बजे ही 'ब्लैक आउट' हो जाता था, उस दौरान खिड़की से रोशनी की एक किरण के भी बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। सड़कों पर पसरे सन्नाटे के बीच वह शहर अपने आप से अनुपस्थित जान पड़ता था- जैसा कि नात्जी क़ब्ज़ेदार कहते भी थे कि इस 'शहर के पास आंखें नहीं' हैं। बच्चे हों या बड़े, पल-भर में ही कोई इस क़दर लापता हो सकता था कि दुबारा फिर उसका कभी पता तक न चले, और दोस्तों के बीच इन बातों का कोई जि़क्र तक न होता था और बातें कभी भी बेलाग-बेफि़क्र न होतीं, क्योंकि हवा में ही बुरे असरों का अहसास हमेशा बना रहता था।

बुरे सपनों जैसे इस पेरिस में, जहां कभी भी किसी पर भी कोई भी अभियोग लग सकता था या मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही किसी को भी उठा लिया जा सकता था, लोगों के अचानक मिल जाने के इत्तेफ़ाक़ भी हो ही जाते थे, उन लोगों के, जिनके शांति के दिनों में मिलने की कोई उम्मीद भी न हो, कर्फ्यू के उस अंधियारे में भी नाज़ुक प्रेम-संबंध पनप जाते थे, भले आने वाले दिनों में दुबारा मिल पाने की कोई उम्मीद तक न हो। बाद के दिनों में इन्हीं अल्पजीवी और बहुधा जर्जर संबंधों के कारण बच्चे पैदा हुए। इसीलिए ऑक्यूपेशन के दौर का पेरिस मेरे लिए एक आदिम अंधेरे की तरह है। अगर वह नहीं होता, तो मैं कभी पैदा न होता। वह पेरिस मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ता और इसीलिए मेरी किताबें कई बार उसी की पोशीदा रोशनी में नहाई होती हैं।


और यह इस बात का सबूत है कि लेखक हमेशा अपनी जन्मतिथि और जन्मसमय से स्थायी रूप से बंधा होता है, भले वह सीधे तौर पर किसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल न रहा हो, भले ही वह बार-बार ऐसे अंदाज़े देता हो कि वह तो अपनी ही 'हाथीदांत मीनार' में बंद कोई संन्यासी हो। अगर वह कविताएं लिखता है, तो उनमें उसका जिया हुआ समय ज़रूर परावर्तित होगा, उन कविताओं को किसी दूसरे युग में लिखा ही नहीं जा सकता था।

महान आयरिश कवि येट्स की एक कविता में तो यह बात ख़ासतौर पर सच जान पड़ती है, और वह कविता मुझे बेहद संवेदित करती है : 'द वाइल्ड स्वान्स एट कूल'19वीं सदी की कविता में हंस अक्सर ही प्रकट हो जाते हैं- बॉदलेयर से लेकर मलार्मे तक में। पर 19वीं सदी में येट्स इस कविता को नहीं लिख सकते थे। इस कविता के भीतर एक विशेष लय और अवसाद है, जो इसे अनिवार्य तौर पर 20वीं सदी में ले आते हैं, और ख़ास उसी वर्ष में, जिसमें यह लिखी गई थी।

20वीं सदी का कोई लेखक अक्सर ख़ुद को समय में क़ैद पा सकता है और 19वीं सदी के महान उपन्यासकारों- बाल्ज़ाक, डिकेन्स, टोल्स्टोय, दोस्तोएव्स्की- को पढऩा एक निश्चित स्मृतिमोह के क़रीब जाना है। उस ज़माने में समय अपेक्षाकृत धीमे कटता था, और यह धीमापन उस उपन्यासकार को 'सूट' भी करता था, क्योंकि इससे उसे अपनी ऊर्जा व ध्यान को व्यवस्थित करने में मदद भी मिलती थी। अब समय की रफ़्तार बढ़ गई है, इस रफ़्तार ने अतीत की भव्य संरचनाओं वाली अतीत की ऊंची साहित्यिक अट्टालिकाओं व वर्तमान की टूटी-फूटी, पुरजा-पुरजा संरचनाओं के बीच अंतर को और स्पष्ट कर दिया है। इस निगाह से देखें, तो मेरी पीढ़ी संक्रमण के दौर की है। मैं यह जानने को बेहद उत्सुक हूं कि नई पीढ़ी जो कि इंटरनेट, मोबाइल फोन, ईमेल और ट्वीट्स के बीच पैदा हुई है, वह साहित्य के ज़रिए इस दुनिया को कैसे अभिव्यक्त करेगी जहां हर कोई स्थायी रूप से 'जुड़ा' हुआ है और जहां सोशल नेटवर्क उस निजता और अंतरंगता को निरंतर खाए जा रहा है, जो अभी कुछ ही समय पहले तक ऐन हमारी अपनी ही थीं।  वह निजता, जो किसी व्यक्ति को एक ख़ास गहराई देती थी और जिसे किसी उपन्यास की थीम बनाया जा सकता था। किंतु मैं साहित्य के भविष्य के प्रति आशावान बना रहूंगा और मुझे यह यक़ीन है कि अगली पीढ़ी इस परंपरा को सुरक्षित बनाए रखेगी, जैसा कि होमर के बाद से हर पीढ़ी ने किया है।

इसके अलावा, भले ही लेखक अपने युग से अकाट्य रूप से जुड़ा हुआ हो, वह अपनी रचना में कुछ ऐसा अभिव्यक्त करना चाहता है, जो समयातीत हो, कालजयी हो। अपनी युगचेतना में वह इसी इच्छा को सांस की तरह लेता है। रासीन या शेक्सपियर का मंचन करते समय इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि निर्देशक ने उनके चरित्रों को उनके ज़माने की पोशाक पहनाई है या जीन्स और लेदर जैकेट। ये सब बेहद अप्रांसगिक चीज़ें हैं। जब हम टोल्स्टोय को पढ़ते हैं, तब डेढ़ सौ साल बाद भी आना कैरेनिना को हम अपने इतना क़रीब महसूस करते हैं कि हमें यह ख़्याल ही नहीं रहता कि वह 1870 के ज़माने की पोशाक पहनती है। एडगर एलन पो, मेलविल या स्तांधाल जैसे कई लेखक तो ऐसे हैं, जिन्हें उनकी मौत के दो सौ साल बाद ज़्यादा गहराई से समझा जा सकता है बनिस्बत उनके जीवनकाल में।

अंतत: कोई उपन्यासकार कितनी दूर रह सकता है? जीवन का वर्णन करने के लिए उसे जीवन के हाशिए पर रहना होता है, क्योंकि अगर वह जीवन में धंस गया, तो वहां से उसे जीवन का दृश्य बड़ा ही मिला-जुला-सा दिखेगा। लेकिन दूरी के इस हल्के-से फेर से, अपने चरित्रों तथा असल जीवन में प्रभावित करने वाले लोगों से आत्मसात करने की लेखक की क्षमता पर असर नहीं पड़ता। फ्लाबेयर कहता था कि मैं ख़ुद ही मदाम बॉवेरी हूं। और टोल्स्टोय ख़ुद को उस औरत की तरह देखते थे, जो रूस की एक अंधेरी रात अपने को रेल के सामने झोंक देती है। आत्मसात करने की यह प्रतिभा इतनी गहरी हो जाती है कि टोल्स्टोय आसमान व भूदृश्य को आना कैरेनिना की पलकों के साथ जोड़ देते हैं। यह आत्ममोह के विपरीत स्थिति है, क्योंकि इसमें आत्म-विस्मृति शामिल है, साथ ही उस चरम एकाग्रता का बोध भी कि छोटी से छोटी तफ़्सील को छूटने नहीं देना है। इसमें एक ख़ास कि़स्म का एकाकीपन भी समाहित है। इसका अर्थ यह नहीं कि आप अंतर्मुखी हो जाएं, बल्कि जब आप उस बाहरी दुनिया को देखते हैं जिसे उपन्यास में लाया जा सकता हो, तो इसी के कारण आपमें उसके प्रति एक सुस्पष्टता आ जाती है।

मैं हमेशा से यह मानता रहा हूं कि जो व्यक्ति रोज़मर्रा के जीवन में खप रहे होते हैं, कवि व लेखक उनमें भी रहस्य का पुट समाविष्ट कर देने की योग्यता रखते हैं। वे ऐसा इसलिए कर पाते हैं कि उन्होंने ऐसे व्यक्तियों को निरंतर ध्यान-मग्नता के साथ बार-बार देखा है, लगभग सम्मोहन की अवस्था में प्रविष्ट होकर देखा है। उनकी दृष्टि के तले रोज़मर्रा का जीवन भी रहस्य ओढ़ लेता है।  इसी दृष्टि के कारण उस जीवन में भी प्रकाश की किरणें चमकती हैं जो कि पहली निगाह में तो नहीं दिखतीं, लेकिन उन्हीं के अंधेरों के नीचे जिनका वजूद होता है। कवि और उपन्यासकार, यहां तक कि चित्रकार की भी, यही भूमिका होती है कि वे व्यक्ति-विशेष की गहराइयों तले अंधकार में छिपी उस चमक व उसके रहस्य का उद्घाटन कर सकें। मुझे अपने दूर के एक रिश्तेदार और चित्रकार अमेदियो मोदीग्लियानी की याद आ रही है। अपने अत्यंत भावोत्तेजक चित्रों में उन्होंने मॉडल्स के रूप में बच्चों, गलियों में भटक रही लड़कियों, नौकरानियों, छोटे किसानों, नौजवान नौसिखियों जैसे अज्ञात व्यक्तियों का प्रयोग किया था। उन्होंने गहरे ब्रश स्ट्रोक्स के साथ उन लोगों के चित्र बनाए थे, ठीक टस्कन परंपरा में खड़े होकर, बोत्तिचेली और सिएनीस घराने के दूसरे चित्रकारों की तरह। उन्होंने उन व्यक्तियों में वह सारी लावण्यता और गरिमा भरी- या ऐसा कहूं कि उद्घाटित कीं, जो कि उन्हीं लोगों के बीच कहीं छिपी हुई थीं। किसी उपन्यासकार का कृतित्व भी इसी दिशा में बढऩा चाहिए। विकृत यथार्थ से भी परे, उसकी कल्पनाशीलता इतनी तेज़ हो कि वह उस यथार्थ के भी नीचे पहुंच जाए, उसे पूरा उद्घाटित कर दे, व्यक्तियों के बाहरी हुलियों के भीतर जो कुछ छिपा है, उसे पकड़कर प्रकाशित कर देने के लिए इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेट, हर कि़स्म की शक्ति का प्रयोग कर ले। अपने सर्वोत्तम रूप में उपन्यासकार स्वप्नदर्शी या सूक्ष्मदर्शी होता है, यह मैं लगभग मानता आया हूं। वह भूकंप का पता लगानेवाले उस यंत्र की तरह होता है, जो ऐसी बारीक से बारीक तरंगों को पढ़ लेता हो, जिनके बारे में अमूमन पता ही न चलता हो।

मैं जिस लेखक को पसंद करता हूं, उसकी जीवनी पढऩे से पहले हमेशा दो बार सोचता हूं। जीवनीकार अक्सर बेहद मामूली और निरर्थक चीज़ों को घिस-घिसकर लिखते हैं, ग़ैर-भरोसे लायक़ चश्मदीद गवाहों को खोजकर उनसे बातें उगलवाते हैं, लेखक के उन चारित्रिक गुणों को उभारने की कोशिश करते हैं जो या तो निराशाजनक होते हैं या फिर पहेलीनुमा। यह सब मुझे रेडियो की सरसराहट की तरह लगता है, जिसके कारण असल संगीत और आवाज़ ठीक से सुनाई नहीं पड़ते। किसी भी लेखक से अंतरंग होने का एक ही रास्ता है, उसकी किताबें पढऩा। वही वह जगह होती है जहां वह अपने सर्वोत्तम रूप में होता है, और हमसे अपनी निचली मद्धम आवाज़ में अबाध बात करता है।

फिर भी जीवनियां पढ़ते समय संयोग से आपको उस लेखक के बचपन की कुछ ऐसी घटनाओं के बारे में पता चल जाता है, जिन्होंने उसके भीतर भविष्य की कृतियों के बीज बो दिए हों और जिनके बारे में ख़ुद उस लेखक को कभी ठीक-ठीक पता न चल पाया हो, वह महत्वपूर्ण घटना बार-बार उसकी रचनाओं में आती हो। इससे मुझे अल्फ्रेड हिचकॉक की याद आ गई, जो ख़ुद तो लेखक नहीं थे, लेकिन जिनकी फिल्में अपनी शक्ति और संसक्ति में किसी उपन्यास से कम नहीं। जब वह पांच साल के थे, उनके पिता ने उन्हें एक ख़त, किसी पुलिस अधिकारी को पहुंचाने के लिए, दिया। उन्होंने वह ख़त जाकर पुलिस अधिकारी को दे दिया, तो पुलिसवाले ने उन्हें हवालात में डाल दिया। डरे हुए हिचकॉक वहां घंटे-भर रहे, उसके बाद पुलिसवाले ने यह कहते हुए उन्हें छोड़ा कि 'अब तुम अच्छे से समझ गए होगे कि अगर तुम जीवन में ठीक से नहीं रहोगे, तो तुम्हारे साथ क्या हो सकता है'। हिचकॉक की सारी फिल्मों में रहस्य और बेचैनी का जो आवरण होता है, उसके पीछे वह पुलिसवाला ज़रूर रहा होगा।


मैं आपको अपनी निजी कहानियों से परेशान नहीं करूंगा, फिर भी कुछ घटनाओं के बारे में ज़रूर बताना चाहूंगा जिन्होंने मेरी भविष्य की किताबों के बीज बो दिए थे। मैं अक्सर अलग-अलग जगहों पर, अपने मां-पिता से दूर, अपने दोस्तों के साथ रहता था, उन दोस्तों के साथ जिनके बारे में अमूमन मैं कुछ नहीं जानता था। ऐसे में यह होता है कि बच्चा कई बार बड़ी से बड़ी चीज़ों से भी चकित नहीं होता और विचित्र से विचित्र स्थितियां भी उसे बेहद मामूली और साधारण लगने लगती हैं। बहुत बाद में मुझे अपने बचपन की इस पहेलीनुमा विचित्रता का भान हुआ और मैं उन लोगों व जगहों के बारे में और जानने की कोशिश करने लगा, जहां व जिनके पास मेरे मां-पिता मुझे छोड़ देते थे। लेकिन मैं ज़्यादातर लोगों को पहचान नहीं पाया, ज़्यादातर जगहों को ठीक उनकी भौगोलिक उपस्थिति में जान-समझ नहीं पाया। बिना किसी सफलता के पहेलियों और रहस्यों को सुलझाने की इसी कोशिश ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया, जैसे कि लेखन व कल्पना से मैं उन घटनाओं के छूटे हुए सिरों को फिर से पकड़ लूंगा।

चूंकि हम 'रहस्य' के बारे में बात कर रहे हैं, मुझे 19वीं सदी के एक फ्रेंच उपन्यास का शीर्षक याद आ गया : ले मिस्तेर द पारी (पेरिस के रहस्य)। शहर जो कि पेरिस है, मेरे जन्म का शहर, मेरे बचपन की शुरुआती छवियों से जुड़ा हुआ है, और वे छवियां इतनी सघन हैं कि उस बचपन के बाद से ही मैं 'पेरिस के रहस्यों' को सुलझाने की कोशिश कर रहा हूं। जब मैं नौ या दस साल का था, अकेला ही पैदल चला जा रहा था, बिना इस बात से घबराए कि मैं खो भी सकता हूं, मैं सिएना नदी के दाहिने किनारे अनजान इलाक़ों में अकेला ही पैदल चले जा रहा था। दिन का समय था, जिसके कारण मैं आश्वस्त था। किशोरावस्था के शुरुआती दिनों में मैंने अपने भय पर थोड़ा क़ाबू पाया और मेट्रो के ज़रिए रात के समय मैं और आगे तक गया। आप किसी शहर को इसी तरह जान सकते हैं, और मैं तो उन उपन्यासकारों की राह पर चल रहा था, जिन्हें मैं पसंद करता था, और वे 19वीं सदी से ही अपने शहर- उसे आप पेरिस, लंदन, सेंट पीटर्सबर्ग या स्टॉकहोम, जो मन, कह लें- को अपनी किताबों की पृष्ठभूमि या मुख्य थीम बनाते आ रहे थे।

एडगर एलन पो संभवत: पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी कहानी 'द मैन ऑफ द क्राउड' में कैफ़े की खिड़की से बाहर की दुनिया को देखते हुए मानवता की तरंगों का आवाह्न किया था, वह भी फुटपाथ पर इसी तरह पैदल चलते हुए। वह अजीबोग़रीब हुलिए वाले एक बूढ़े के पीछे चल पड़े, लंदन की तमाम गलियों में रात-भर उसका पीछा किया ताकि उसके बारे में और जान सकें। लेकिन वह अनजान बूढ़ा तो मैन ऑफ़ द क्राउड या भीड़ का आदमी है और उसका पीछा करना निरर्थक है, क्योंकि वह तो हमेशा ही अज्ञात-अनजाना रहेगा, तमाम कोशिश के बाद भी उसके बारे में कुछ भी पता लगाना असंभव ही है। उसकी अपनी कोई निजी पहचान नहीं है, वह तो बस गली से गुज़र रहे लोगों की भीड़ का एक हिस्सा है, जो भीड़ में ख़ुद को खो देता है।

यहां मुझे कवि थॉमस दे क्विन्सी के शुरुआती जीवन का भी एक कि़स्सा याद आता है। लंदन के भीड़भाड़ वाले इलाक़े ऑक्सफर्ड स्ट्रीट में उनकी दोस्ती एक लड़की से होती है। बड़े शहरों में ऐसी मुठभेेड़ें हो ही जाती हैं। वह उस लड़की के साथ कुछ दिन बिताते हैं, फिर उन्हें लंदन से बाहर जाना है। वे दोनों इस बात पर राज़ी होते हैं कि एक हफ़्ते बाद वह लड़की रोज़ शाम ग्रेट टिचफील्ड स्ट्रीट के किनारे उनकी प्रतीक्षा करेगी। लेकिन एक बार अलग होने के बाद उन दोनों की मुलाक़ात कभी नहीं हुई। 'अगर वह जि़ंदा रही होगी, बेशक लंदन जैसी भीषण भूलभुलैया कुछ समय तक हमने एक-दूसरे को खोजा होगा, एक ही साथ खोजा होगा, हो सकता है कि हम एक-दूसरे से कुछ फीट की दूरी से ही निकल गए हों, हमारे बीच लंदन की किसी संकरी गली जितनी दूरी रही हो, जो कि अनंत विरह व अलगाव की दूरी में तब्दील हो गई।'

जैसे-जैसे बरस गुज़रते हैं, हर मुहल्ला, हर गली, किसी एक ख़ास स्मृति को ताज़ा कर देता है, कोई मुलाक़ात, कोई अफ़सोस, ख़ुशी का कोई मौक़ा याद आ जाता है, ख़ासकर, अगर आप उसी शहर में पैदा हुए हों, पले-बढ़े हों, तो। कई बार एक ही गली कई सारी अलग-अलग कि़स्म की स्मृतियों से जुड़ी हुई होती है। इस गहराई से जुड़ी होती है कि शहर का भूगोल ही आपका पूरा जीवन बन जाता है, आपके मन का आवाह्न करता हुआ कि स्मृति की उन निरंतर परतों को पढ़ के दिखाएं, जैसे किसी भोजपत्र पर पहले से लिखी पंक्तियां मिटाए बिना, उन्हीं पर, और पंक्तियां लिख दी जाएं, और आपसे उम्मीद की जाए कि दोनों ही लिखावटों को आप सही-सही पढ़ लें। अपनी ही नहीं, हज़ारों हज़ार दूसरे लोगों की भी जि़ंदगियां पढ़ लें, जो शहर में, मेट्रो में या गलियों में चल रहे हों।

इसीलिए अपने शुरुआती दिनों में, लेखन में मदद के लिए, मैं पेरिस की पुरानी टेलीफोन डायरेक्टरियों को खोजा करता था, ख़ासकर उन्हें, जिनमें नामों के साथ गली और इमारत के नंबर भी दर्ज हों। मुझे लगता था कि जैसे-जैसे मैं उसके पन्ने पलट रहा, मैं किसी शहर का एक्स-रे देख रहा हूं- अटलांटिस जैसे डूब चुके किसी शहर का- और समय की सुगंध को अपनी सांस में भर रहा हूं। क्योंकि इन बीते हुए बरसों में उन हज़ारों हज़ार व्यक्तियों का कोई नामोनिशां नहीं बचता, सिवाय उन टेलीफोन डायरेक्टरी के, जिनमें उनके नाम, पते और नंबर हमेशा बचे रह जाते। कुछेक बार ऐसा होता कि किसी का नाम अगले साल वाली डायरेक्टरी से ग़ायब हो जाता। कई बार उन पुरानी पोथियों से गुज़रने पर चक्कर-सा आ जाता, यह सोचकर भी कि उन नंबरों पर फोन किया जाए, तो अब कोई नहीं उठाएगा। बाद के बरसों में ओसिप मान्देलस्ताम की एक कविता मेरे पुरक़रीब हो गई:

मैं आंसुओं से परिचित अपने शहर लौटा
बचपन के बरसों की कश्तियों में लौटा

पीटर्सबर्ग ....
तुमने मेरे टेलीफोन नंबर को अब भी जि़ंदा रखा है

पीटर्सबर्ग, मेरे हाथों में अब भी पते की पुर्जी है
मैं उनका प्रयोग मुर्दों की आवाज़ खोजने में करूंगा

सो, ऐसा लगता है कि उन्हीं प्राचीन फोन-पोथियों को देखते हुए मेरे भीतर अपनी शुरुआती किताबों को लिखने की इच्छा प्रवृत्त हुई होगी। उसके भीतर हज़ारों हज़ार नामों में से मैं कुछ नामों को चुनता, उन्हें पेंसिल से रेखांकित करता और यह कल्पना करने लगता कि उनका जीवन कैसा रहा होगा।

एक बड़े शहर में आप ख़ुद को खो सकते हैं, ग़ायब हो सकते हैं। आप अपनी पहचान बदलकर बिल्कुल एक नया जीवन भी जी सकते हैं। एक या दो जगहों का पता अपने साथ लेकर आप किसी अनहोनी घटना की जासूसी तलाश भी शुरू कर सकते हैं। गुमशुदा लोगों के रिकॉर्ड पर जो लिखा होता है: 'इन्हें आखि़री बार इस जगह देखा गया'- यह पंक्ति मुझे हमेशा बांध लेती है। गुमशुदगी, पहचान व समय का बीत जाना- ऐसी थीम्स हैं, जो किसी भी शहर के भूगोल के साथ हमेशा जुड़ी रहती हैं। इसी कारण 19वीं सदी से ही शहर, उपन्यासकारों का इलाक़ा रहे हैं और कुछ महान उपन्यासकारों का तो किसी एक शहर से जुड़ाव भी महान ही है : बाल्ज़ाक और पेरिस, डिकेन्स और लंदन, दोस्तोएव्स्की और सेंट पीटर्सबर्ग, तोक्यो और नागाई काफू, स्टॉकहोम और ह्यालमार सोडेलबर्ग।

मैं उस पीढ़ी का हूं जो इन उपन्यासकारों से प्रभावित रही है और जो उसी चीज़ का अन्वेषण करना चाहती थी, जिसे बॉदलेयर ने 'पुराने बड़े शहरों की घुमावदार तहें' कहा है। ज़ाहिर है, पचास साल पहले- या ऐसे कहूं कि जब मेरी उम्र के किशोर अपने शहरों की खोज करते हुए सशक्त संवेदनाओं का अनुभव कर रहे थे- शहर भी बदल रहे थे। उनमें से कुछ, अमेरिका में या जिसे तीसरी दुनिया कहते हैं उनमें, महा-महानगर बन चुके हैं, उनका विकास व्यथित व स्तब्ध कर देने वाला है। उनमें रहने वाले उपेक्षित उपनगरों में बंट गए हैं। वे एक सामाजिक युद्ध की छाया में जी रहे हैं। झुग्गियों की तादाद बढ़ गई है और लगातार बढ़ती जा रही है। बीसवीं सदी तक के उपन्यासकारों के भीतर अपने शहरों को लेकर एक रूमानी कि़स्म का लगाव था, डिकेन्स या बॉदलेयर की तरह। इसी लिए यह जानने में मेरी रुचि है कि भविष्य के उपन्यासकार कैसे इन दैत्याकार नागरी बदलावों को अपने गल्प में समाहित कर पाएंगे।

जहां तक मेरी किताबों की बात है, उनके बारे में आपके इस कथन का मैं शुक्रगुज़ार हूं कि 'इनमें स्मृति की वह कला है जिसके सहारे लेखक अपरिभाषेय मानवीय प्रारब्ध का आवाह्न कर लेता है'। यह शस्ति सिर्फ़ मेरे लिए नहीं है, बल्कि उस विलक्षण कि़स्म की स्मृति के लिए भी है, जो अतीत के पुर्जों, टुकड़ों को जमा करती है और अनजान-अज्ञात लोगों के निशान भी इस धरती पर बचाए रखती है। इसके अलावा, यह मेरे जन्म के वर्ष से भी जुड़ी हुई है : 1945। जब तमाम शहर बर्बाद कर दिए गए थे और पूरी आबादी की आबादी ही ग़ायब कर दी गई थी, 1945 में मेरे पैदा होने का अर्थ है, कई दूसरों की तरह, स्मृति और विस्मृति के विषयों के प्रति मेरा अतिरिक्त संवेदनशील हो जाना।

दुर्भाग्य से मैं नहीं मानता कि अतीत को अब भी मार्सेल प्रूस्त जैसी ताक़त और खरेपन के साथ याद किया जा सकता है। वह जिस समाज का चित्रण कर रहे थे, 19वीं सदी का समाज, वह उस चित्रण के समय भी एक स्थिर समाज था। प्रूस्त की स्मृति, अतीत को अपनी हर तफ़्सील के साथ पुनर्प्रकट कर देती थी। आज, मुझे यह अहसास होता है कि स्मृति भी स्वयं को लेकर इतनी आश्वस्त नहीं है, वह स्मृतिलोप व विस्मृति के साथ एक स्थायी संघर्ष में है। विस्मृति की यह परत सबकुछ को इस तरह ढांप ले रही है कि हम अतीत का महज़ एक ही टुकड़ा उठा पाते हैं, उसके असंबद्ध टुकड़े। क्षणभंगुर और लगभग अपरिभाषेय मानवीय प्रारब्ध के अतीत से।

इसके बावजूद यह उपन्यासकार का ही उद्यम होगा कि जब भी उसके सामने विस्मृति का कोरा काग़ज़ आए, वह उस पर कुछ शब्दों को एकदम-से प्रकट कर दे, जैसे खोए हुए हिमशैल अचानक ही कभी, समुद्र के भीतर कहीं दूर, प्रकट हो जाते हैं।




(मूल फ्रेंच में दिए गए मोदियानो के इस भाषण को जेम्‍स हार्डिकर ने अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, जिस पर यह हिंदी अनुवाद आधारित है। इसमें येट्स के एक काव्‍यांश को छोड़ दिया गया है. चीनी लेखक मो यान का नोबेल भाषण यहां पढ़ सकते हैं. )
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