Friday, January 12, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 7 : आप किसके लिए लिखते हैं?





1996-97 का समय। 19-20 साल का एक युवक (यानी मैं), मुंबई में नरीमन पॉइंट पर बैठ, दूसरे युवक (यानी एक प्यारा कवि-मित्र) से पूछता है, “तू किसके लिए लिखता है?”

वह जवाब देता है, “मैं समाज के शोषित-पीड़ित-दमित वर्ग के लिए लिखता हूँ। मैं राशन की दुकान व रोज़गार कार्यालय की क़तार में खड़े तमाम व्यक्तियों के लिए लिखता हूँ, और ख़ासकर उस आख़िरी व्यक्ति के लिए, जिसका नंबर कभी नहीं आएगा। मैं हारे हुए आदमी के लिए कविता लिखता हूँ।”

मैंने कहा, “बड़ा प्रभावित करने वाला जवाब है, रे! लेकिन इनमें से कोई भी तेरी कविताएँ नहीं पढ़ता।”

वह: “भले न पढ़ें, लेकिन मैं उन्हीं को ध्यान में रखकर लिखता हूँ।”

मैं: “यानी ऐसा कह सकते हैं कि तू जिन लोगों को ध्यान में रखकर लिखता है, वे तुझे नहीं पढ़ते। और जो लोग तुझे पढ़ते हैं, तूने उनके लिए लिखा ही नहीं, नाहक़ वे तुझे पढ़ते हैं।”

फँसा हुआ महसूस कर, उसने अपना गोल चश्मा ठीक करते हुए मेरी ओर देखा और मेरी बात में छिपी शरारत को ताड़कर हँस पड़ा, बोला, “बहुत मारूँगा।”

हम दोनों हँसने लगे और सवाल आया-गया हो गया। लेकिन उसके जवाब से यह ज़ाहिर हो गया था कि मुंबई की गोष्ठियों में वह, उन वरिष्ठ रचनाकारों के वक्तव्यों को बहुत ग़ौर से सुनता है, जो दुनिया के किसी भी लेखक पर बात करते समय यह बताना नहीं भूलते थे कि एक लेखक को किनके लिए लिखना चाहिए।

हम कई मित्र आपस में इस तरह के सवाल पूछकर एक-दूसरे को क़िस्म-क़िस्म के बौद्धिक संकटों में डालते रहते थे। मैंने सवाल पूछकर उसे संकट में डाला था। कुछ दिनों तक सोचते रहने के बाद (शायद बदला लेने के लिए) यही सवाल उसने मुझसे किया।

मैंने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता। बस लिखता हूँ, यह नहीं जानता कि किसके लिए लिखता हूँ। मेरी लिखाई अबूझ से संवाद का एक उपक्रम है। अपने लिखे में मैं उससे बात करता हूँ, जो अदृश्य है।”

मेरा संकट बनाए रखने के लिए उसने कुछ और सवाल किए। एक-दो का जवाब देने के बाद जब मैं भी फँसने लगा, तो उसी की तरह मैंने भी जवाब दिया, “बहुत मारूँगा।” हा हा हा करते हुए हमने फिर बात वहीं ख़त्म कर दी।

कुछ दिनों बाद, उसने पूरा क़िस्सा एक तीसरे मित्र को सुनाया, तो उसने निर्णायक जैसी भूमिका अख़्तियार करते हुए मेरे मित्र को पॉलिटिकली करेक्ट और मुझे इनकरेक्ट बताया। उस निर्णायक मित्र को मेरा जवाब कलावादी लगा था। ‘भारत एक कृषि-प्रधान देश है’ व ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ जैसी पंक्तियों ने हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक चेतना के साथ जितनी जोड़मतोड़ की है, लगभग उतनी ही जनवाद-कलावाद की ‘कालजयी नूराकुश्ती’ ने।

आज वह पूरी घटना याद आ रही है। मुझे चार दिन पुरानी बात ठीक से याद नहीं रहती, बीस साल पुरानी बात कैसे याद है? क्योंकि यह, उस समय की एक डायरी में बहुत विस्तार से लिख रखी है। आज, यह सारी घटना याद करते हुए कह सकता हूँ कि हम दोनों हमउम्र थे और हम दोनों के ही जवाब अपनी आयु-उचित रूमानियत से भरे हुए थे। बावजूद इसके, हम दोनों ही जानते थे कि हमारा पाठक कौन है, हमें किसके लिए लिखना है। वह एक मूर्त पाठक की कल्पना में था, मैं एक अमूर्त पाठक की।

आप किसके लिए लिखते हैं? यह ऐसा सवाल है, जो लेखक के जीवन में बार-बार आता है. इस सवाल में कई अर्थ व मंशाएँ छिपी होती हैं। कई बार पूछने वाला बेहद मासूम लगता है, तो कई बार अव्वल दर्जे का बदमाश। पूछने वाले की नीयत का अंदाज़ा लगाकर या तो इसका जवाब दिया जाता है या नहीं दिया जाता। अपने शुरुआती बरसों में मैंने कई लोगों से यह सवाल पूछा है और एक बात कॉमन पाई है कि इसका जवाब देते समय ज़्यादातर लोग पॉलिटिकली करेक्ट बने रहना चाहते हैं। आप किसके लिए लिखते हैं- साधारण-सी गूँज वाला यह सवाल अचानक एक राजनीतिक सवाल बन जाता है।

मुझे पॉलिटिकली इनकरेक्ट लोग ज़्यादा अच्छे लगते हैं। उनके भीतर का विरोधाभास मुझे आकर्षित करता है। महाभारत में दो पक्ष थे- एक पांडव, दूसरे कौरव। दोनों अपनी-अपनी पॉलिटिक्स पर टिके हुए थे। अगर दोनों में से एक भी पक्ष, एक पॉलिटिकली इनकरेक्ट निर्णय ले लेता, तो उतना बड़ा युद्ध टल जाता। मसलन, ‘पांडवों को सुई की नोंक बराबर जगह नहीं दूँगा’ की ज़िद करने वाला दुर्योधन अगर दूत बनकर आए कृष्ण के सामने कह देता, “ठीक है। यह लो, मैंने पांडवों को खांडवप्रस्थ लौटा दिया,” तो कहानी कुछ और होती। भले कौरवों के दल में इस पर अचरज प्रकट किया जाता, दुर्योधन की मति फिर गई है जैसी बातें कही जातीं। पॉलिटिकली इनकरेक्टनेस निजी होती है, आपका दल या पार्टी इसे मान्य नहीं करती।

इसी तरह त्याग को धर्म का प्रमुख गुण मानने वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने एक बार कह दिया होता, “ठीक है। सारी ज़मीन तुम रख लो, हम किसी और देश जाकर अपने पुरुषार्थ से और ज़मीन खड़ी कर लेंगे,” तो भी कहानी अलग हो जाती। भले द्रौपदी एक बार फिर धर्मराज पर चिंचिया उठती, भीम मुक्के से चट्‌टानें फोड़-फोड़कर अपना ग़ुस्सा निकालता, पर सर्वमान्य मुखिया अगर पॉलिटिकली इनकरेक्ट निर्णय ले ही ले, तो आप चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते।

हर समय पॉलिटिकली करेक्ट होने का हठ भी महान विपदाएँ ले आता है। तुम करेक्ट हो या इनकरेक्ट, ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ जानने के बाद ही तय हो पाता है। इसी तरह, लेखक किसके लिए लिखता है यह जानना लेखक की पॉलिटिक्स जानने जैसा मान लिया जाता है। इसीलिए इसके जवाब में लोग इतने सचेत हो जाते हैं। इनकरेक्ट होने का जोखिम नहीं उठा पाते। इसीलिए उनके भीतर का सच मालूम नहीं पड़ता।

लेखक किसके लिए लिखता है- का जवाब खोजते समय हमें यह भी सोचना होगा कि साहित्य किसके लिए है? आज के संदर्भ में देखें, तो लगता है- साहित्य सबके लिए खुला एक पार्क है, इसमें हर किसी को नि:शुल्क प्रवेश की अनुमति है कि वह आए और बैठकर साहित्य पढ़े, फिर भी इसमें सब लोग नहीं आते। इस पार्क के सामने से गुज़र जाते हैं, लेकिन इसमें प्रवेश नहीं करते। कई तो इस दिशा में देखते तक नहीं हैं। यानी जो चीज़ सबके लिए है, उसमें भी सब लोग नहीं आते। लेखक सबके लिए लिखता है, लेकिन सब लोग उसे नहीं पढ़ते। देश की बहुसंख्य जनता की चिंता लेखक करता है, लेकिन जनता का बहुसंख्य उसे पढ़ता ही नहीं। चलिए, यह भी मान लेते हैं, पढ़े-न पढ़े लेकिन चिंता का होना ज़रूरी है। जैसे एक उदाहरण लेते हैं : एक कवि ने भैंस पर कविता लिखी, पर कोई ज़रूरी नहीं कि भैंस उसे पढ़े ही पढ़े, वह तो खड़ी-खड़ी पगुरा रही। फिर उसे कौन पढ़ेगा? गड़रिया? पता नहीं, वह पढ़ता भी है कि नहीं। लेकिन कविता लिखी जाती है, और तमाम बुरे हालात के बाद थोड़ी-सी पढ़ी भी जाती है, तो कौन है वह, जो उसे पढ़ता है?

1- जिसे भैंस में दिलचस्पी हो
2- जिसे कविता या साहित्य में दिलचस्पी हो

3- जिसे उस कवि-विशेष में दिलचस्पी हो

तो दरअसल भैंस पर लिखने वाला कवि इन तीन लोगों के लिए लिखता है, लेकिन इन तीनों की पहचान करना बड़ा मुश्किल है, क्योंकि ये तीनों भाँति-भाँति के लोग होंगे। सबकी इच्छा, आकांक्षा व माँग अलग-अलग होंगी। हो सकता है कि पॉइंट नंबर एक के अंतर्गत आने वाला व्यक्ति पहले से तय करके बैठा हो कि भैंस में मेरी दिलचस्पी तो है, लेकिन कलावादी भैंस में, जनवादी भैंस में नहीं। इसी तरह की और श्रेणियों की कल्पना की जा सकती है। तो सवाल वही कि आख़िर इन तीनों का मिला-जुला रूप कैसे सोचा जाए, जिसे उक्त भैंस-कवि अपना आदर्श पाठक मानकर लिख सके?

बात आदर्श पाठक की खोज पर जाकर रुकती है। आदर्श पाठक जैसी कोई चीज़ नहीं होती, जैसे आदर्श कविता नहीं हो सकती, आदर्श साहित्य नहीं हो सकता, आदर्श मनुष्य नहीं हो सकता। उसके बाद भी कई लेखक अपनी ज़रूरत के हिसाब से आदर्श पाठक की एक परिकल्पना करते हैं, उसके मन में उतरने की कोशिश करते हैं, और उस हिसाब से अपनी रचना करते हैं।

कई बार इस आदर्श पाठक के रूप में मैं अपनी ख़ुद की कल्पना करता हूँ। मैं जैसी चीज़ें पढ़ना चाहता हूँ, वैसी चीज़ें लिखने की कोशिश करता हूँ। कई बार मैं कहता हूँ कि मैं बुनियादी तौर पर अपने लिए लिखता हूँ, मेरे अलावा कोई और उसे पढ़ ले, तो यह एक बोनस की तरह है। पर मैं जानता हूँ कि यह भी कोई सही जवाब नहीं है, महज़ आदर्श क़िस्म का एक जवाब है। दरअसल, इस सवाल का कोई एक सही जवाब नहीं हो सकता। हर लेखक अपने-अपने तरीक़े से इस संकट का सामना करता है। साहित्य का यह पूरा पक्ष पूरी तरह कल्पनाओं पर आधारित है। यह अवचेतन में इस तरह चलता है कि जिस समय रचना की कल्पना की जाती है, उसी समय उसे पढ़ने वाले ‘प्रतिनिधि पाठक’ की कल्पना भी कर ली जाती है और यदि दोनों में साम्य बन गया, तो रचना कामयाब मान ली जाती है। साहित्य स्वभावत: द्विपक्षीय है- लेखक मौजूद है तो पाठक को भी मौजूद होना होगा। एक की अनुपस्थिति हुई, तो ‘साहित्य’ नहीं बनेगा। जिस रचना को किसी ने नहीं पढ़ा, उसका अस्तित्व ही नहीं बचेगा, साहित्य में उसका प्रवेश तो दूर की बात। गुणाढ्य की वृहत्कथा को कोई पढ़ने-सुनने को राज़ी न था, जंगल जाकर अपनी कहानी उसने ख़ुद ही को सुनानी शुरू की, फिर रोते हुए एक-एक पन्ना जलाने लगा। वे हिस्से नष्ट हो गए। थोड़ा-सा हिस्सा वह बचा, जिसे बाद में दूसरों ने पढ़ा-सुना। साहित्य का एक अर्थ दो चीज़ों के ‘सहित’ होने में है।

लेखक हो और पाठक हो, और कोई कहानी न हो, तो भी कहानी की रचना हो जाती है। उत्तर-आधुनिक उपन्यासों में ऐसे या मिलते-जुलते कई प्रसंग आते हैं कि लेखक और पाठक (या संपादक) बैठकर एक कहानी या किताब की चर्चा (या खोज) कर रहे हैं, उनकी चर्चा ही कहानी बन जाती है, लेकिन मूल कहानी या किताब क्या थी जिसकी चर्चा की जा रही थी, लेखक इसके बारे में कहीं नहीं बताता।

भारत में प्रचलित सत्यनारायण की कथा कुछ ऐसी ही है। उसे साहित्य नहीं माना जा सकता, लेकिन वह लोक में इस क़दर व्याप्त है कि इस तकनीक को समझने के लिए उसकी मदद ली जा सकती है। उस कथा में सबकुछ है, बस सत्यनारायण की कथा नहीं है। लकड़हारा समृद्ध हो जाता है, फिर दरिद्र हो जाता है, और सारे पाप सत्यनारायण की कथा सुनने से कट जाते हैं- यह सब वर्णन मिलता है, लेकिन वह सत्यनारायण की कौन-सी कथा सुनता है, इसका कहीं पता नहीं चलता। जिस कथा का माहात्म्य बताने के लिए पूरी कथा रची गई है, वह कहीं है ही नहीं। यह रचना कैसे हुई? क्योंकि लेखक और पाठक दोनों साथ आ गए, उनका आपसी व्यवहार ही कथा बन गया।

लेखक जब एक पाठक के मॉडल की कल्पना कर लेता है, और जब वह फिट बैठ जाती है, तो रचना अपने आप खड़ी होने लगती है, उस पाठक के दिल में प्रवेश करने लगती है। अधिकांश लेखक अपने इस काल्पनिक मॉडल पाठक के प्रति जागरूक नहीं होते, कइयों को इसकी ज़रूरत भी नहीं महसूस होती, लेकिन यह दूसरा पक्ष चेतन-अवचेतन मन में रहता ज़रूर है, क्योंकि साहित्य एक संवाद भी है, आत्म से भी व अनात्म से भी।

तुलसी ने अपनी रचना को स्वांत: सुखाय कहा था- रघुनाथ की यह गाथा मैं अपने सुख के लिए लिख रहा हूँ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने पाठक या श्रोता को उपेक्षित कर दिया, बल्कि बार-बार उसे न्यौता दिया है, उसकी एक परिकल्पना अपने भीतर व रचना के भीतर छिपाए रखी है। आप किसके लिए लिखते हैं, यह सवाल भी पश्चिम से आया है और यह साहित्य का सवाल कम, बाज़ार का सवाल अधिक है। यदि लेखक को अपनी रचनाओं के लिए बड़े पाठकवर्ग की इच्छा होगी, तो भले वह चाहे न चाहे, बाज़ार उसके सामने यह सवाल ज़रूर फेंकेगा, क्योंकि तब साहित्य का बाज़ार आपके लिखे को उन लोगों के बीच ले जाना चाहेगा। पुराने युगों में भले उस तरह न रहा हो, लेकिन आज के युग में यह सवाल बार-बार आता है, क्योंकि अब साहित्य बहुत सारे विभिन्न वर्गों में बँट गया है। सौ साल पहले प्रेमचंद ही सबसे गुणवान लेखक थे, और सबसे लोकप्रिय भी। प्रसाद की कला की हर जगह सराहना होती थी और उन्हें लोकप्रियता भी उतनी ही मिली थी। बंगाली में रवींद्रनाथ टैगोर ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वप्रिय एक साथ थे। अपने ज़माने में डिकेन्स और दोस्तोएव्स्की में भी दोनों गुण एक साथ थे। क्योंकि उस ज़माने में साहित्य की मुख्यतया एक ही धारा होती थी। अब बहुत कुछ बदल गया है। आधुनिकता ने हर भाषा के साहित्य को अभूतपूर्व तरीक़े से विखंडित किया है। उसने एक ख़ास क़िस्म के साहित्यिक लेखन को उच्च-कला व दूसरे ख़ास क़िस्म के लेखन को निम्न-कला में वर्गीकृत कर दिया है। इस तथाकथित उच्च-कला व निम्न-कला के बीच लगातार संघर्ष चल रहा है। अगर साहित्य में आधुनिकता-बोध न आया होता, तो इस तरह का बँटवारा होना मुश्किल था। नया ज्ञान व नया बोध अनगिनत लाभ देता है, तो कुछ ख़ास तरह के नुक़सान भी करवाता है। ऐसा नहीं है कि बुरा साहित्य तब न रचा जाता हो। राजशेखर, भामह, मम्मट ने बुरे कवियों व काव्य के कई उदाहरण दिए हैं। एक ख़ास तरह के काव्य को अधम काव्य भी कहा है। बावजूद इसके, तब साहित्य आज की तरह खाँचों में बँटा हुआ न रहा होगा। श्रेणियाँ तब भी रही होंगी, लेकिन आज की तरह उनकी सांस्थानिक स्थापना न हुई होगी। काव्यशास्त्र के ग्रंथों में काव्य के अनेक उद्देश्य बताए गए हैं, कवि उनका अनुसरण भी करते थे। कोई कविता धन के लिए लिखी जाती थी, कोई यश के लिए, कोई सिर पर पड़ी मुसीबत टालने के लिए यानी अनिष्ट-निवारण, कोई मोक्ष प्राप्त करने के लिए। कविता की इतनी श्रेणियाँ प्रचलित व ग्रंथित हैं, तो यक़ीनन कवि को यह भी पता होगा कि टारगेट ऑडिएन्स क्या है। एक ही कविता के कारण कवि को विद्वानों के बीच मान भी मिलता था, राजा या अमीरों की ओर से धन भी मिलता था और जनता की ओर से यश व कीर्ति भी मिलती थी। आज अगर आपको ये तीनों चीज़ें पानी हैं, तो तीन अलग-अलग तरह की कविताएँ लिखनी होंगी।

उच्च-कला धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है, जबकि निम्न-कला उतनी ही फैल रही है। उच्च-कला के अभ्यासक को दस तरह के भ्रम होते हैं, चूंकि उसे उच्च-कला के ज्ञाताओं के बीच मान्यता प्राप्त करनी होती है, उसकी परीक्षा ज़्यादा कठिन होती है। जबकि निम्न-कला के लक्ष्य बहुत स्पष्ट होते हैं, उसे कलात्मक वैशिष्ट्य व नयेपन की परवाह नहीं होती, उसका एकमात्र लक्ष्य अधिक से अधिक लोकप्रिय होना होता है। साहित्यिक कविता व मंचीय कविता जैसी दो श्रेणियाँ हमें हिंदी में साफ़ दिखाई देती हैं।

साहित्यिक कविता के अभ्यासक अक्सर भ्रमों में रहते हैं। उन्हें समझ में नहीं आता कि कौन-सा रास्ता पकड़ा जाय।

1- ऐसी कविता लिखें जो बहुत लोकप्रिय हो जाए
2- लेकिन उच्च कलात्मक मूल्यों पर समकालीन मुहावरे में वैसी कविता लिखना बहुत मुश्किल है

3- मानो वैसी लिख भी दी तो जात-बाहर हो जाएँगे कि मंचीय हो गया
4- गुणवत्ता व लोकप्रियता में से क्या चुना जाए

5- लोकप्रियता के लिए तो भावुकतावादी होना होगा, एक तरह का बॉलीवुडी-पना, बुद्धिवाद के भी भावुक पक्षों को ही छूना होगा
6- उसे बार-बार यह अहसास होता है कि कोई उसे पढ़ता ही नहीं। जिस पाठक की कल्पना करके वह लिख रहा है, वह कहीं अस्तित्व में ही नहीं

7- जो अस्तित्व में है, उसकी कल्पनाशक्ति या तो उस पाठक को पकड़ नहीं पा रही या फिर उस स्तर तक नीचे उतर नहीं पा रही

इन भ्रमों में पड़कर अक्सर कलात्मक व बौद्धिकता के स्तर पर ग़लत निर्णय ले लिए जाते हैं, जिससे रचना मार खाती है। दूसरी तरफ़ मंचीय कवि को देखें। उसका फंडा एकदम क्लीयर है। वह ग़लती से भी ऐसी कोई गूढ़ या कलात्मक बात नहीं कहता, जो उसके श्रोता के सिर के ऊपर से निकल जाए। वह हर चीज़ को आसान, सरल व सुपाच्य बनाकर प्रस्तुत करता है। क्योंकि उसकी प्रतिबद्धता भ्रमहीन है। उसे कला नहीं देनी, कला का आभास देना है। कला का आभास देने के लिए भी एक ख़ास कला चाहिए होती है, उतनी उसमें है। यदि नहीं है, तो वह मंच पर असफल हो जाता है। कला में जो कुछ भी सुपाच्य होगा, वह सत्य से उतना ही दूर होगा। वह महज़ सत्याभास होगा। निम्न-कलाएँ सत्याभास से अपना आहार ग्रहण करती हैं। इन विभाजनों व इनसे पैदा हुई व्यावसायिकता ने कला के मूल्यों को तेज़ी से बदला है। एक तरफ़ ‘साहित्यिक रचना’ का दायरा तेज़ी से सिकुड़ रहा है, तो दूसरी तरफ़ यह कोशिशें भी चल रही हैं कि क्यों न उन चीज़ों को भी साहित्यिक माना जाए? यह स्थिति, परिदृश्य को औसत की विलक्षण उत्सवधर्मिता से भर देती है।  

साहित्य के आस्वादकों के बीच यह बँटवारा कैसे हो गया? आधुनिकता-बोध ने तो कला के मूल्यों को बदला, पाठक व श्रोताओं को किसने बदला व बाँटा? इसका जवाब सोचते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आधुनिकता-बोध से सिर्फ़ कला ही नहीं, बल्कि बाज़ार भी विकसित हुआ। एक ही उपभोक्ता समूह को बाज़ार सब कुछ, देर तक, नहीं बेच सकता। पहले एक ही शैंपू सबके लिए आता था, फिर पुरुषों व स्त्रियों के लिए अलग-अलग हो गया। इस तरह रोज़मर्रा के जीवन में उपभोक्ताओं के विभाजन के कई सारे उदाहरण हम देख सकते हैं। साहित्य के आस्वादकों के बीच इस बँटवारे को भी वह बहुत तेज़ी से बढ़ा रहा है। मुनाफ़े के नियम से संचालित होने वाले बाज़ार का ऊँट उसी करवट बैठेगा, जहाँ भीड़ ज़्यादा होगी।

इस माहौल में लेखक से बराबर यह उम्मीद की जाती है कि उसे पता हो, वह किसके लिए लिख रहा है। वह जिसके लिए लिख रहा है, क्या वह उसे जानता है? यदि वह ख़ुद के लिए लिख रहा है, तो क्या ख़ुद को जानता है? कई बार ख़ुद को जानना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, बजाय पाठक को जानने के। यहाँ मुझे इमरे कर्तेश की एक बात याद आती है। वह हंगरी के लेखक थे और उन्हें 2002 का नोबेल पुरस्कार मिला था। पुरस्कार से पहले व बाद भी, वह कभी लोकप्रिय लेखक नहीं रहे, लेकिन उनका सम्मान बहुत है। यूरोपीय साहित्य में दोस्तोएव्स्की, काफ़्का, सैम्युअल बेकेट व थॉमस बर्नहार्ड की एक परंपरा बनती है, वह उसमें एक अंग हैं। उन्होंने कहा था, “मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी किताबें छपेंगी। सो, मैं हमेशा स्वतंत्र रहा और जैसा चाहा, वैसा लिखता रहा। मेरे पास पाठक थे ही नहीं, इसलिए मैंने सिर्फ़ भाषा, रूप और विषय के प्रति निष्ठा बरती।” क्या काफ़्का भी यही नहीं सोचता होगा? उसने तो अपनी किताबें जला देने को कहा था। पाठक नाम के इस काल्पनिक दबाव से जैसे कर्तेश ख़ुद को बचा ले गये, काफ़्का भी तो उसी तरह बचा ले गया था।

टारगेट पूरा करने व टारगेट ऑडिएन्स को संतुष्ट करने के इस उन्मादी दबाव-भरे दौर में कर्तेश की यह बात कितनी राहत देती है। इस समय दुनिया के सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक लेखकों में से एक हैं नॉर्वे के कार्ल ऊवे केनॉसगोर्द। जब उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखनी शुरू की थी, तो कुछ ऐसी ही मानसिकता में थे। वह कहते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि उनकी किताब कौन पढ़ेगा, बस एक ज़िद थी कि ख़ुद के प्रति सच्चा रहना है। आत्मनिष्ठ होकर की गई रचना अपने आप कला में तब्दील हो जाती है, बशर्ते आत्म से उतना गहरा परिचय हो।

भले कितने भी सुझाव दिए जाएँ कि लेखक को अपने पाठक के बारे में पता होना चाहिए, मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि तमाम कल्पनाओं के बाद भी उसे नहीं पता होता कि उसका पाठक कौन होगा। अनजान इलाक़ों से, कोई एक अनजान व्यक्ति आता है, आपकी कल्पनाओं से एकदम ही अलग, और आपका सबसे निष्ठावान पाठक बन जाता है। लेखक को लगता है कि वह पाठक के दिल के भीतर उतरकर सारा हाल-चाल लिख देगा, तो पाठक उससे कनेक्ट होगा, जुड़ जाएगा। ऐसे में लेखक यह भूल जाता है कि सारे पाठक एक जैसे नहीं होते। हर पाठक अपने दिल के भीतर नहीं झाँकना चाहता। अपने भीतर प्रवेश करना हर किसी को नहीं रुचता। हम साहित्य इसलिए भी पढ़ते हैं कि हम दूसरे मनुष्यों को जान सकें। यह बिलकुल वैसी बात है, जैसे कोई अपनी खिड़की पर खड़ा हो पड़ोसी के घर में ताक-झाँक करे, उसके घर के सारे झगड़ों को सुने और इस तरह अपने घर के झगड़ों को भूल जाए।

दूसरों के घरों में कान लगाकर सुनने वाले पाठक/श्रोता, कहानी को बहुत दूर तक ले जाते हैं। गुणाढ्य की वृहत्कथा की रचना से संबंधित एक क़िस्सा याद आता है। लोक में इसके कई संस्करण हैं।

एक बार देवी पार्वती ने ज़िद पकड़ ली कि हे महादेव, मुझे ऐसी कहानी सुनाओ, जो एकदम नई हो, जिसे आज से पहले किसी ने न सुनी हो। ख़ूब सोच-विचारकर महादेव ने ऐसी कहानी सुनाई, जो पार्वती से पहले किसी ने नहीं सुनी थी। दीवार के पार से शिव का एक गण कान लगाए वह कहानी सुन रहा था। रात को वह अपने घर गया, जाकर उसने, शिव का ज़िक्र किए बिना, अपनी पत्नी को वही कहानी सुना दी। उसकी पत्नी, देवी पार्वती के लिए काम करती थी। कुछ दिन बाद वह देवी के कक्ष में गई और उत्साह में भरकर उसने वही कहानी उन्हें सुना दी। अब तो महादेवी आगबबूला। महादेव पर ख़ूब क्रोधित हुईं कि आपने वादा किया था, यह कहानी मेरे अलावा किसी को नहीं पता, पर मेरी तो नौकरानी भी यह कहानी जानती है। कैसे हुई यह नई? महादेव ने नंदी से कहकर जाँच बिठा दी, तो सारी सचाई पता चली। देवी ने उस गण को शाप दे दिया कि जा, अब से धरती पर रह।  धरती पर जाकर उस गण ने बरसों बाद वह कहानी एक पिशाच को सुना दी। पिशाच ने गुणाढ्य को सुना दी और गुणाढ्य ने उस कहानी को वृहत्कथा नाम से लिख दिया।

मान लें, इस क़िस्से में महादेव एक लेखक हैं, और पार्वती उनकी पाठक (श्रोता)। महादेव को लग रहा कि पाठक एक ही है- कहानी का टारगेट ऑडिएन्स यानी पार्वती, लेकिन हक़ीक़त में पाठक दो हैं, वह अदृश्य गण भी शामिल है। कहानी लिखते समय महादेव ने उसकी कल्पना तक नहीं की थी, लेकिन वह भी उतना ही आनंद पा रहा। थोड़ा और फैलाकर देखें, तो पाठक तीन हैं, गण की बीवी भी शामिल, महादेव ने उसकी भी कल्पना नहीं की थी। थोड़ा और फैलाकर देखें, तो पाठक चार हैं, पाँच हैं, फिर लाखों लोग है, क्योंकि गुणाढ्य ने धरती पर पूरी कहानी लिखके प्रसारित कर दी थी। महादेव ने पाठक के रूप में उनमें से किसी की कल्पना नहीं की थी। उनके सामने आदर्श पाठक के रूप में महज़ देवी थीं और देवी अपने स्वभाव व व्यवहार में विशिष्ट हैं, अद्वितीय हैं, यानी बाद में जो लाखों पाठक बने, देवी पार्वती उस पाठक-समूह की प्रतिनिधि नहीं कही जा सकतीं।

हिंदू मिथॉलजी में महादेव से बड़ा कथाकार किसी को नहीं माना जाता।  यानी सबसे बड़े कथाकार को भी नहीं पता था कि उसका असली पाठक कौन है, तो धरती के साधारण लेखक-कथाकारों की क्या बिसात। संभव है कि रचना करते समय जिस वर्ग को लेखक ने अपने ध्यान तक में न रखा था, वही वर्ग उस रचना का सबसे बड़ा पाठक-समूह बन जाए।

इस क़िस्से को एक और कोण से देखते हैं: सभी जानते हैं कि महादेव, अर्ध-नर-नारीश्वर हैं। यानी उनका दायाँ हिस्सा शिव का है, बायाँ हिस्सा पार्वती का है। यानी शिव और पार्वती दोनों अलग-अलग नहीं हैं। यानी जो लेखक है, वही पाठक है। जो वाचक है, वही श्रोता है। इस तरह शिव ने वह कहानी किसी दूसरे को नहीं, बल्कि अपने आप को सुनाई थी, क्योंकि पार्वती तो उन्हीं के अंदर हैं। शिव ने कल्पना भी न की थी, उस गण ने कहानी सुन ली और वह प्रसारित भी हो गई। काफ़्का व कर्तेश वाली बात इससे जुड़ती है कि शिव के पास पाठक ही नहीं था, फिर भी एक पाठक था।

हम चाहे जिसके लिए लिखें, आँख बंद करके लिखें, एक आदर्श पाठक की कल्पना करके लिखें या अपने आप के लिए लिखें, यह संभावना हमेशा रहती है कि दीवार के पीछे से एक ऐसा पाठक उसे सुन रहा होगा, जिसकी आदतों, पसंद व स्वभाव के बारे में हमें कोई अंदाज़ा ही न हो और वही हमारी कहानी को आगे तक ले जाए।