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अनागरिक : अजंता देव की पाँच नई कविताएँ

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अनागरिक

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मैं ख़ुद को छुपा नहीं सकी किसी प्रागैतिहासिक चट्टान के पीछे 
मेरेफ्लैटकीसबसेनिचलीमंज़िलसेभीनीचे
लगादिएगएहैंवेसारेपत्थर जिनपरसींगरगड़ताथाबारहसिंगा मेरेपासनहींहैं 1957 केसिक्के मेरेपिताकामैट्रिकपासहोनातकप्रमाणितनहीं कहाँहैकहाँहैमाता-पिताकाविवाहसर्टिफिकेट कहकरघरउठाचुकीहूँसिरपर एकपीली-सीतस्वीरपरधुंधलेमोहरकोघूररहीहूँ

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 20 : मैं कालिदास का मेघ हूँ

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एक बार मैं अपने रास्ते जा रहा था कि मैंने देखा, रामगिरि पर एक पुरुष आकाश की ओर मुँह किये खड़ा था। एकबारगी तो मैंने ध्यान नहीं दिया, क्योंकि कई आकाशमुखी साधुओं को मैं इस तरह खड़ा देख चुका था। उस ज़माने में शैव संप्रदाय के साधुओं का एक समूह ख़ुद को ‘आकाशमुखी’ कहता था। वे आसमान की ओर मुँह उठाकर शिव का नाम लिया करते थे। इस उम्मीद में कि ख़ुद शिव उन्हें दर्शन देंगे। वे गरदन पीछे झुकाकर अपनी दृष्टि को आकाश में तब तक केंद्रित रखते थे, जब तक शिव दिख न जाएँ या उनकी माँसपेशियाँ सूख न जाएँ। मुझे नहीं पता, किसी को शिव दिखे या नहीं, लेकिन आसमान को घूरती अकड़ी हुई कई लाशों को मैंने देख रखा था। 
जब उस पुरुष ने आवाज़ देकर मुझे पुकारा, तब मुझे लगा कि यह आकाशमुखी नहीं, बल्कि कोई और है। और जैसे ही उसने मुझसे बातचीत शुरू की, मुझे समझ में आ गया कि यह कोई प्रेम-विदग्ध है। विरह का मारा है। अपनी प्रिया की याद में तड़प रहा है। मेरे पूछने पर पता चला कि यह कवि है, लोग उसे कालिदास नाम से जानते हैं। वह मुझे अपनी कविता का एक पात्र बनाना चाहता था। मैं हँस पड़ा। मुझ जैसे अज्ञात बादल को कोई हँसी का पात्र न बनाना चाहे,…

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 19 : लैला की उँगलियाँ

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