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अजंता देव की लंबी कविता


सोनमाछरी जैसी कौंधती रेत पर
आना चुपचाप
मेरे पाजेब खो दूंगी एक दिन पहले
पानी लेने जाऊँगी तब
किवाड़ों  की जोड़ पे चुपड़ दूंगी कड़वा तेल
माचे की तनी कस दूंगी आज
जूती और लाठी कब से डूबे हैं तेल में
आज धूप में छोड़ना है
बंशीधर पंचांग में अगली अमावस को घेर दिया है काजल की तीली से
तुमने भी वो ही घेरा है ना ,जाँच लो
ऊँट के खुर बाँध के आना
वो खोजेंगे पार देस
अपन निकल जायेंगे लखपत की ओर
वैसे भी किसे पड़ी है मेरी
सोने की बिस्कुट तो ना है
कि कोई इतनी मेहनत करेगा तस्करी पे
सोचेंगे बापू और हाथ से रेत झाड़ के छाछ पी लेंगे दो गिलास।

(चिट्ठी,जो लड़की ने प्रेमी के लिए सहेली को लिखवाई।) 


अगर फूल सा ही हो मेरा जीवन
जैसा आशीर्वाद मिलता रहा बरसों
फिर होगा ज़रूर ही बबूल का
छोटा, पीला और काँटो भरा।

(जैसा युवती ने बूढ़ी स्त्री का पाँव छूकर सोचा, फिर सहेली को बताया।)


रेत पर ऊँट की तरह दौड़ गया मेरा प्रेमी
छल  छल पानी की ओर
मेरा बादला अभी आधा भरा था
मैंने उसे ढुलका दिया फोग की जड़ों में।

(त्याग दी गई स्त्री की सहेली ने प्रेमी को  जो संदेश दिया।)


इस गाँव के अलावा
दूर दूर तक पानी पड़ा है
हुसनसर की बावड़ी लबालब है
ठंड…
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