सबद
vatsanurag.blogspot.com

सबद विशेष : 18 : एडम ज़गायेव्स्की - गीत चतुर्वेदी

10:10 p.m.





(इस समय विश्व के चुनिंदा, श्रेष्ठतम कवियों में से एक एडम ज़गायेव्स्की को बार-बार नेरूदा और मीवोश के समकक्ष देखा जाता है। नए बिंबों, बेहद शांत मनोभाव वाली संरचना और एक साथ निजी व ऐतिहासिक दोनों परिप्रेक्ष्य में आख्यान, उनकी कविताओं की ख़ासियत हैं। ये 12 कविताएं क्लेअर कैवेना द्वारा पोलिश से अंग्रेज़ी में किए अनुवादों पर आधारित हैं। इससे पहले 2011 में सबद गीत चतुर्वेदी के ही अनुवाद में ज़गायेव्‍स्‍की की 27 कविताओं और चुनिंदा गद्य की ई-बुक प्रस्‍तुत कर चुका है। ‘सेल्‍फ पोर्ट्रेट’ शीर्षक उस ई-बुक को यहां से नि:शुल्‍क डाउनलोड किया जा सकता है। )




असंभव दोस्तियां

मसलन, किसी ऐसे से जो अब जीवित नहीं
जो अब सिर्फ़ पुराने पीले पड़ गए ख़तों में रहता है

या उस नदी के किनारे लंबी चहलक़दमी
जिसकी गहराइयां अपने भीतर छिपाए हुए हैं

चीनी मिट्टी से बने प्याले - या दर्शन के बारे में की गई चर्चाएं
किसी बेहद संकोची छात्र के साथ या डाकिए के साथ.

सड़क से गुज़रते उस व्यक्ति के साथ
जिसकी आंखें गरबीली हैं और जिसे तुम कभी जान नहीं पाओगे.

दोस्ती इस दुनिया से, जो पहले से कहीं सुंदर, पूर्ण व निर्दोष हो
(कम से कम ख़ून की नमकीन गंध के लिए नहीं).

सेंट लाज़ा में बैठ कॉफ़ी पी रहे उस बूढ़े से
जिसे देख तुम्हें किसी की याद आ जाती है.

लोकल ट्रेनों में चमकते हुए
चेहरों से-

यात्रियों के ख़ुश चेहरे जो शायद किसी शानदार
जश्न के लिए निकले हैं या शायद सिर कटा देने के लिए.

और दोस्ती ख़ुद से भी
- क्योंकि आखि़र तुम ख़ुद भी तो नहीं जानते, तुम हो कौन.


कविताएं लिखना

कविताएं लिखना एक द्वंद्व युद्ध की तरह
जिसमें कोई नहीं जीतता- एक तरफ़
उठती हैं परछाइयां, किसी पर्वत शृंखला की तरह
जिन्हें देखती है एक तितली, दूसरी तरफ़
रोशनी की कुछ संक्षिप्त झलकियां
माचिस की तीली की लौ की तरह छवि और विचार
यह सब उस रात जब सर्दियों ने लिया हो पीड़ाधारी जन्म.
यह घात लगाकर किया गया युद्ध है, कूट में लिखा टेलीग्राम है,
लंबे समय तक महज़ देखते रहना है, सब्र,

डूबता हुआ एक जहाज़ जो सिग्नल भेजता है
और अपने डूबने को रोक देता है, जीत की चीख़ है,
पुराने, ख़ामोश उस्तादों के प्रति वफ़ादारी है
एक क्रूर दुनिया का शांत मनन है
विस्फोटक आनंद है, उन्मादी, अतृप्त,
पछतावा, हर चीज़ बीत जाती है, उम्मीद, कुछ भी कभी खोता नहीं,
बिना किसी अंतिम निर्णायक शब्द के हो रहा संवाद है,
जब बच्चे चले गए हों, तब स्कूल में हुआ लंबा अवकाश है,
एक कमज़ोरी का पराभव है

और दूसरी कमज़ोरी की शुरुआत, अनंत प्रतीक्षा
है अगली कविता की, कोई प्रार्थना, मातम
मां के लिए किया गया, शांति की क्षणिक संधि,
झुलसकर काली हो गई स्वीकारोक्तियों, विद्रोह और
महाउदार क्षमाभाव के बीच शिकायतों और फुसफुसाहटों का ढेर है,
पूरी रियासत ही ख़र्च करके फूंक देने-सा है, ग्लानि है, प्रसन्नता,
थोड़ी-सी दूरी में बेहद तेज़ दौडऩा है, मंथर गति से की गई चहलक़दमी है,
विडंबना है, एक ठंडी निगाह है,
आस्था का व्यवसाय है, शब्दों का, उतावली का,
उस बच्चे का रुदन है जिसने अपना सबसे क़ीमती ख़ज़ाना खो दिया हो.


सितारा

बरसों बाद लौटा हूं तुम तक
मटमैले और प्यारे शहर,
कभी न बदलने वाले शहर
अतीत के जल के नीचे दफ़न

मैं पहले की तरह अब
दर्शन, कविता और जिज्ञासा का विद्यार्थी नहीं रहा,
मैं अब वह युवा कवि नहीं रहा
जो लिखता था बहुत सारी पंक्तियां

और संकरी गलियों व भरम की भूलभुलैया में
भटकता था.
घडिय़ों और परछाइयों के राजा ने
मेरे ललाट को अपने हाथों से स्पर्श किया है,

लेकिन अब भी रोशनी का एक सितारा
मेरा मार्गदर्शन करता है
और रोशनी ही है
जो मुझे कर सकती है नष्ट या बचा सकती है.


हमारी दुनिया
(डब्ल्यू. जी. ज़ेबाल्ड की स्मृति में)

मैं उनसे कभी मिला नहीं, मैं सिर्फ़
उनकी किताबें जानता था और कुछ अदद तस्वीरें, जैसे कि
वे सेकंडहैंड दुकानों से ख़रीदी गई हों,
और इंसानों का नसीब जो कि सेकंडहैंड ही पाया गया हो,
और बेहद शांति से आख्यान रचती एक आवाज़,
एक ऐसी निगाह जिसने बहुत कुछ देख लिया हो,
ऐसी निगाह जो देखकर मुड़ गई
न भय से बचते हुए
न उमंग से;
                            और उनके गद्य में हमारी दुनिया,
हमारी दुनिया, कितनी शांत- लेकिन
उन अपराधों से भरी हुई जिन्हें बेहद अच्छी तरह भुला दिया गया,
इस या उस समुद्र के किनारे बसे
किसी प्यारे-से शहर में भी,
हमारी दुनिया ख़ाली चर्चों से भरी हुई,
रेल की पटरियों-सी गड्ढेदार, पुरानी खंदकों
के निशान, राजमार्ग,
अनिश्चय की दरारों से पटी हुई, हमारी अंधी दुनिया
जो कि तुम्हारे न होने से थोड़ा और छोटी हो गई.


छोटी चीज़ें

मेरे समकालीनों को पसंद हैं छोटी चीज़ें
सूखी हुई मछली, तारामीन, जो कि भूल चुकी है समुद्र को
अवसाद से रुकी हुई घडिय़ां,
लुप्त हो चुके नगरों से भेजे गए पोस्टकार्ड
पढ़ी न जा सकने वाली लिपि में जिनकी स्याही फैल चुकी है
जिसमें बमुश्किल देख पाते हैं वे
उत्कंठा, बीमारी या अंत जैसा कोई शब्द.
वे सुषुप्त ज्वालामुखियों पर अचंभा करते हैं.
वे रोशनी की इच्छा नहीं करते.


कैफ़े
बर्लिन

अजनबी शहर में उस कैफ़े ने फ्रेंच नाम धारण कर रखा था.
मैं वहां बैठा था ‘अंडर द वोल्कैनो’ पढ़ता हुआ, ज़रा कम उत्साह के साथ.
मैंने सोचा, यह स्वस्थ होने का समय है.
मैं थोड़ा सामान्य अशिक्षित-सा बन जाऊं.
मेक्सिको बहुत दूर था और उसके प्रचुर सितारे कभी मेरे लिए नहीं चमके.
मुर्दों का दिन देर तक जारी रहा.
बिंबों और प्रकाश का त्यौहार. मृत्यु मुख्य भूमिका में थी.
पड़ोस की मेज़ों पर थोड़े लोग थे, अलग-अलग प्रारब्ध वाले.
चालाकी, पीड़ा, सहज बुद्धि, सलाहकार, इवोन*.
बारिश हो रही थी. मुझे थोड़ी-सी ख़ुशी महसूस हुई. कोई आ रहा था
कोई जा रहा था. आखि़र किसी ने तो खोज ही लिया अविराम गति का सिद्धांत.
मैं एक आज़ाद देश में था. एक अकेले देश में.
कुछ भी घटित नहीं हो रहा था, तोपें सो रही थीं.
संगीत किसी पर भी इनायत नहीं कर रहा था, रिस रहा था
स्पीकरों से पॉप, आलस में दुहरा रहा था : अभी कई आयोजन होने थे.
किसी को नहीं पता था कि करना क्या है, जाना कहां है और क्यों.
मैंने तुम्हारे बारे में सोचा, हमारी क़ुरबत के बारे में, उस सुगंध के बारे में
जो शरद ऋतु की शुरुआत में तुम्हारे बालों से फूटती है.
हवाई अड्डे से उठता है एक जहाज़
किसी जोशीले विद्यार्थी की तरह
जो अब भी उन बातों में भरोसा रखता है
जो पुराने उस्तादों ने उसे सिखाई हों.
सोवियत अंतरिक्ष यात्रियों ने दावा किया था कि
उन्हें अंतरिक्ष में कोई ईश्वर नहीं मिला
पर क्या सच में उन्होंने खोजा भी था?

* इवोन - किसी भी फ्रेंच महिला का नाम.

बादल

कवि हमारे लिए घर बनाते हैं, लेकिन वे ख़ुद
उसमें कभी नहीं रह पाते
(नॉर्विड एक अनाथालय में रहता था, होल्डरलिन किसी मीनार में).

भोरे-भोर जंगल के ऊपर कुहासा है
एक यात्रा, खुरच से भरी मुर्गे़ की पुकार,
अस्पताल बंद हैं, सिग्नल्स एकदम अनिश्चित.

दोपहर हम चौराहे के पास एक कैफ़े में बैठते हैं
हम निर्मेघ नीले आसमान को देखते हैं
और लैपटॉप की नीली स्क्रीन को;

एक हवाई जहाज़ पायलट का घोषणापत्र लिखता है
स्पष्ट, सफ़ेद लिपि में,
दूरदर्शी जिसे आसानी से पढ़ लें

नीला वह रंग है जो
बड़ी-बड़ी घटनाओं का वादा करता है
फिर बैठ जाता है, बैठकर प्रतीक्षा करता है.

सीसे से बना बादल क़रीब आता है
हदसे हुए कबूतर उड़ जाते हैं
बेहयाई से

अंधड़ और ओले जमा होते हैं
अंधेरी गलियों और चौराहों पर,
फिर भी रोशनी अभी तक मरी नहीं.

बड़े कल-पुर्जों के भीतर छिपे हुए
खदान मज़दूरों की तरह अदृश्य, कवि
हमारे लिए एक घर बनाते हैं :

खड़े हो जाते हैं बुलंद कमरे
जिनमें वेनिस की शैली में बनी खिड़कियां हैं
शानदार महल,

पर वे ख़ुद उनके भीतर
कभी रह नहीं पाते.

नॉर्विड एक अनाथालय में रहता था, होल्डरलिन किसी मीनार में;
जेट का अकेला पायलट
गुनगुनाता है कोई लोरी; जागो ओ पृथ्वी.


चेहरे

शाम बाज़ार के चौराहे पर मैंने कई चमकते हुए चेहरे देखे
उन लोगों के जिन्हें मैं नहीं जानता. मैंने लालच में भरकर देखा
लोगों के चेहरों को : हर चेहरा अलग था, कुछ न कुछ कहता हुआ,
आश्वस्त, हंसता हुआ, अपनी जगह टिका हुआ.

मुझे लगा, शहर मकानों से नहीं बना
चौराहों, गलियों, उद्यानों, सड़कों से नहीं
बल्कि दियों की तरह जगमगाते चेहरों से बना है,
वेल्डिंग करने वाले मज़दूरों की ज्वाला से, जो रात के समय
चिंगारियों के बादल के बीच जोड़ा करते हैं इस्पात.


कवियों की तस्वीरें

कवियों की तस्वीरें खींची गईं
पर तब नहीं
जब वे सच में देखा करते थे,
कवियों की तस्वीरें खींची गईं
किताबों से भरी पृष्ठभूमि के साथ,
पर अंधेरे में कभी नहीं,
सन्नाटे में भी कभी नहीं,
रात और अनिश्चय में भी नहीं,
जब वे संकोच से हिचके,
जब आनंद में दमके
जैसे माचिस से टकराकर फॉस्फोरस.
मुस्कराते कवि
सुपठित, निर्मल.
कवियों की तस्वीरें खींची गईं
जिस समय वे कवि नहीं थे.
काश, हम जान पाते
कि संगीत होता क्या है.
काश, कि हम समझ पाते.


कवाफ़ी के एक संग्रह को पढ़ते हुए सो जाने के दौरान

एक भरा-पूरा कठिन मेहनतकश दिन गुज़ारने के बाद शाम
अपनी आरामकुर्सी में
कवाफ़ी के एक संग्रह को पढ़ते हुए सो जाने के दौरान
अपनी ख़ामियों से बेतहाशा वाकि़फ़ मैंने
(ख़ामियां- जिनमें मेरी प्रेरणाओं के कुछ बड़े प्रासंगिक पल भी होते हैं),
कुछ लोगों को देखा, बूढ़े और जवान,
जो हारकर भी तने हुए थे बेहद शानदार, गरिमा से भरे,
जिन्होंने स्वीकार कर लिया था अपने देशों, अपने नगरों की तबाही को
(बड़े क़रीने से रोम ने उन्हें अपने वश में कर लिया था)
आसानी से नहीं, बल्कि अतुलनीय चमक के साथ -
उनकी सांत्वनाएं उनकी वाणी से फूट रही थीं,
इलियड या सोफोक्लीज़ की अद्वितीय लचकदार वाणी
कोई भी विजेता उनसे इस वाणी को नहीं छीन सकता था, उस जैसी कुछ और चीज़ों को भी
जैसे यूनानी भाषा की दुनिया में उनकी जगह को.
(कम से कम वे ख़ुद तो ऐसा ही सोचते थे).
जैसे माइरिस, ऐमीलियानोज़, कवि फेर्नाज़ीस,
पश्चिमी लीबिया का एक राजकुमार
मशहूर एंटनी को भला क्यों भूला जाए
जिसने अलेक्ज़ांद्रिया को बेहद बहादुर विदाई दी थी,
या हंसोड़, उद्दंड जूलियन को
(जो आज होता तो यक़ीनन एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता होता).
इन सबको कौन छीन सकता है.
बेतहज़ीब जूलियन को छोड़ बाक़ी सबको
पूरी तैयारी के साथ एक शाश्वत विश्राम के लिए ले जाया गया, एक सजी-धजी पराजय,
और ये सारे ही लगभग हमारी सहानुभूतियों को जगा ले जाते हैं,
इनमें से कुछ तो महानायक हैं
(वे अपने गौरव से नहीं, अपनी धूर्तताओं से संचालित होते हैं).
हमारी झपकियां महज़ एक तुच्छ रेखांकन हैं
एक वृहद संपूर्णता का पूर्वानुभव
(जैसा कि साहित्यिक परिशिष्टों के संपादक कहा करते हैं).
हमारे पराभव अभी भी ऊंघते हैं
(या कम से कम वैसा प्रतीत होता है)
इस बीच सड़क से गुज़रनेवाले आखि़री लोग
लौटते हैं अपने घरों की ओर
रात के समय, जब हृदय अपेक्षाकृत धीरे धड़कता है
और रोज़मर्रा के कामों का काला, गाढ़ा धुआं
किसी भूत की तरह चिमनियों में भरता जाता है
(हमारा जीवन जल रहा है).


मामूली जीवन
(क्लेअर कैवेना के लिए)

बेंच पर लावारिस पड़े
एक मुड़े-तुड़े काग़ज़ में पढ़ता हूं मैं
हमारा जीवन मामूली है.
दार्शनिकों ने बताया मुझे
हमारा जीवन मामूली है.

मामूली जीवन, मामूली दिन, मामूली चिंताएं,
मामूली-सा संगीत समारोह, मामूली-से वार्तालाप
शहर की सीमा पर तफ़रीह करते हुए,
अच्छी ख़बरें, बुरी भी-

लेकिन चीज़ें और विचार
अपने रफ़ ड्राफ़्ट में अब भी अधूरे पड़े हुए थे
जाने कैसे

मकानों और पेड़ों में थी
थोड़ा और की उम्मीद
और गर्मियों में एक हरे चारागाह ने
इस ज्वालामुखीय धरती को ऐसे ढांप रखा था
जैसे समंदर को किसी ने ओवरकोट पहना दिया हो

अंधकार मे डूबे सिनेमाघरों को रोशनियों की तलब लगी थी.
जंगल ऐसे सांस ले रहे थे जैसे उन्हें बुख़ार हो गया हो,
बादल बड़ी नज़ाकत से गा रहे थे,
एक सुनहरा पक्षी बारिश के लिए प्रार्थना कर रहा था.
मामूली जीवन में उमग रही थी एक इच्छा.


कविता, आदि के बचाव में

हां, कविता, उच्च कलाएं, आदि-आदि के बचाव में,
लेकिन साथ ही एक छोटे-से क़स्बे की गरमी की शामों के भी बचाव में हूं ,
जहां बग़ीचे झकोलते हुए लहराते हैं और दरवाज़ों की दहलीज़ पर उसी तरह
बैठी रहती हैं बिल्लियां, जैसे बैठा करते थे चीनी दार्शनिक.

हिंदी अनुवाद © 2015 गीत चतुर्वेदी
Read On 8 comments

सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ट / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी