सबद

सबद विशेष : 16 : वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का का गद्य

12:51 am





1996 के बाद वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का का परिचय जितनी बार भी लिखा जाता है, उन्हें दुनिया-भर में मशहूर कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता कहा जाता है। कोई ग़लत भी नहीं, क्योंकि दोनों ही तथ्य हैं। लेकिन 1996 से पहले ये दोनों बातें तथ्य नहीं थीं। नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले अंतर्राष्ट्रीय पटल पर शिम्बोर्स्‍का की प्रसिद्धि नाममात्र की ही थी। यह अल्पकीर्ति भी एक तथ्य ही है, अत: इसका उल्लेख भी कोई अनुचित बात नहीं। किंतु 2014 में इसका उल्लेख क्यों करना? इसलिए कि यह उल्लेख भी एक कि़स्म की प्रासंगिकता है। इस साल भी साहित्य का नोबेल पुरस्कार एक ऐसे लेखक (फ्रेंच भाषा के पैट्रिक मोदियानो) को दिया गया है, जिसके पास अल्पकीर्ति है। अल्पकीर्ति को कुछ लोग रोग या एक कि़स्म का डिसएडवांटेज/डिसमेरिट मान लेते हैं। कोई लेखक यदि अल्पकीर्त है, तो उसकी श्रेष्ठता को संदेह से देखा जाता है। यशाकांक्षी तो पहले से था, इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में हमारा साहित्यिक समाज पहले की अपेक्षा कहीं ज़्यादा यशाक्रांत भी हो गया है।

एक छोटा-सा कि़स्सा याद आता है। हैरल्ड पिंटर अपने जीते-जी महान मान लिए गए थे। नोबेल मिलने से बरसों पहले भी जब वह ऑस्ट्रेलिया या अन्य देशों की यात्रा पर जाते थे, वहां के लेखकों-बुद्धिजीवियों में उनसे मिलने के लिए उत्साह का माहौल रहता था। (इसकी तफ़सीलों में जिनकी दिलचस्पी हो, ऐसे पाठक ब्रूस चैटविन के संस्मरण पढ़ सकते हैं।) लेकिन इस कीर्ति के बाद भी जब 2005 में उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो इंग्लैंड में ही कई लोगों को आश्चर्य हुआ। एक सज्जन ने किसी समारोह में ही उनसे कह दिया, 'मिस्टर पिंटर, मैं आपको नहीं जानता।' मुस्कराते हुए अल्पभाषी पिंटर ने जवाब दिया, 'इसमें मेरा कोई दोष नहीं।'

इंग्लैंड के समाज को साहित्यिक-सांस्कृतिक तौर पर जागरूक माना जाता है। वहां के लोगों ने भले अपने सारे लेखकों की किताबें न पढ़ रखी हों, पर कम से कम उनमें से अधिकांश को नाम से तो जानते ही हैं। और यदि किसी ने पिंटर की तरह जीवन के पांच दशक लिखने-पढऩे, नाटक करने में बिताए हों, उनका नाम आए दिन अख़बारों में छपता रहा हो, तो पाठक उन ख़बरों के ज़रिए भी उस लेखक को जानने लगता है। ऐसे माहौल में यदि कोई व्यक्ति आकर कहता है, 'मिस्टर पिंटर, मैं आपको नहीं जानता', तो मिस्टर पिंटर भला और क्या जवाब दे सकते हैं? किसी लेखक का कम प्रसिद्ध होना, कम से कम लेखक का दोष तो क़तई नहीं होता। हालांकि प्रसिद्धि और कीर्ति के आधार पर किसी लेखक की श्रेष्ठता जांचने वालों को इससे धक्का अवश्य लगता है। हत्यारों, भ्रष्टाचारियों, धनपशुओं व उनकी आलसी-चरित्रहीन संतानों, बलात्कारियों, फूहड़ नचनियों, अश्लील गायकों, लुगदी-लेखकों, चुटकुलेबाज़ों की ख्याति-कुख्याति, साहित्य रचने वालों से कहीं ज़्यादा होती है। इसमें भी साहित्य-लेखकों का कोई दोष नहीं। (ना ही उन हत्यारों आदि का।) फिर किसका दोष है? यह उन सभी लोगों के सोचने का विषय है, जो 'लोग' के दायरे में आते हों।

ख़ैर। बात शिम्बोर्स्‍का की। चूंकि मोदियानो को नोबेल पुरस्कार मिलने के प्रसंग में हम शिम्बोर्स्‍का को देख रहे हैं, इसलिए मैं 1996 से पहले की शिम्बोर्स्‍का को थोड़ा-सा देखने की अनुमति चाहूंगा। 1996 में शिम्बोर्स्‍का को नोबेल की घोषणा के बाद बहुत सारे देशों के लोग चौंक गए थे, ख़ासकर अमेरिका के साहित्यकार व पाठक, क्योंकि उनमें से अधिकांश ने इस कवि का नाम नहीं सुना था। ख़ुद उनके देश पोलैंड में इस पुरस्कार से लोग हैरान रह गए थे, क्योंकि ज़्यादातर को उम्मीद थी कि जब भी नोबेल पोलैंड लौटेगा, ज़्बीग्न्यू हर्बर्ट या तादेउष रूज़ेविच को मिलेगा। लेकिन दुर्भाग्य से दोनों को नोबेल पुरस्कार कभी नहीं मिल पाया। शिम्बोर्स्‍का 1950 के आसपास से पोलिश में कविताएं लिख रही थीं। 1981 में उनकी सत्तर कविताएं पहली बार अंग्रेज़ी अनुवाद में पुस्तकाकार आईं। उसका कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा। अंग्रेज़ी सहित दूसरी भाषाओं में उनकी कविताएं पहुंचती रहीं। मीवोश लंबे समय तक अमेरिका में रहे थे और शिम्बोर्स्‍का की कविताओं के प्रशंसक थे, उन्होंने अपनी बातचीतों में भी कई बार शिम्बोर्स्‍का को उद्धृत किया था। किंतु शिम्बोर्स्‍का को लेकर अंग्रेज़ी-भाषी साहित्य समाज में विशेष सराहना का कोई आम माहौल कभी बन नहीं पाया। 1995 में शिम्बोर्स्‍का की कविताएं नये सिरे से अंग्रेज़ी में अनुवाद होकर छपीं, 'व्यू विद अ ग्रेन ऑफ सैंड' शीर्षक से। इस अनुवाद का कोई तात्कालिक पाठकीय प्रभाव नहीं दिखाई पड़ा, लेकिन अगले साल जब उन्हें नोबेल की घोषणा हुई, तो स्वीडिश, जर्मन, स्पैनिश अनुवादों के साथ निर्णायकों ने इसका जि़क्र भी किया। जिस तरह इस बार मोदियानो को लेकर एकदम-से अनभिज्ञता से भरे सवाल पूछे गए, लगभग वैसे ही या उससे थोड़ा कम, शिम्बोर्स्‍का के लिए भी पूछे गए थे। पुरस्‍कार की घोषणा के बाद लोग उनकी कविताएं खोजने लगे और 'व्यू विद अ ग्रेन ऑफ सैंड' शीर्षक वह किताब लोगों की मददगार बनी। उस किताब ने अंग्रेज़ी-भाषी दुनिया को शिम्बोर्स्‍का की कविताओं की ताक़त से परिचित कराया। वह किताब अब भी अमेरिका में सबसे ज़्यादा बिकने वाली कविता-किताबों में शामिल है। जिस कवि के प्रति विदेशी पाठकों ने अनभिज्ञता जताई थी, उसे बीसवीं सदी की महान कवि मानने में ज़्यादा समय नहीं लगा।

लेकिन क्या पोलिश साहित्य में भी शिम्बोर्स्‍का उतना ही अजनबी नाम थीं? मीवोश, हर्बर्ट और रूज़ेविच को पोलिश कविता का महाकवि माना जाता है, शिम्बोर्स्‍का उनमें चौथा नाम हैं। वह पोलैंड में तीनों से ज़्यादा पसंद की जाती थीं। ये तीनों कवि उनके प्रति अपना सम्मान समय-समय पर जताते रहे। पाठकों में उनका बेहद मान रहा। आंद्रेई मुन्कोव्स्की ने 1965 में ही शिम्बोर्स्‍का की एक कविता को संगीतबद्ध किया था, जिससे पूरे पोलैंड में उनकी कविता पहचानी गई। क्रिस्तोफ़ किस्लोव्स्की की महान फिल्म 'थ्री कलर्स : रेड' 1994 में ही प्रदर्शित हो चुकी थी। किस्लोव्स्की ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी यह फिल्म शिम्बोर्स्‍का की एक कविता से प्रभावित है। यह फिल्म पूरी दुनिया में देखी गई थी। कहने का अर्थ यह कि भले विदेशी पाठक नोबेल के समय शिम्बोर्स्‍का को कम जानते थे, उनकी भाषा ने उन्हें बेहतरीन कवि का दर्जा पहले ही दे दिया था।

कई सारी किताबें अंग्रेज़ी या दूसरी भाषाओं में अनूदित होती हैं, पर जहां हर साल करोड़ों किताबें छपती हों, उनमें कितनी किताबों पर लोगों का ध्यान जाएगा? अगर शिम्बोर्स्‍का को नोबेल न मिला होता, तो क्या उनकी कविता की किताब, उपन्यासों जैसी लोकप्रियता के साथ बिकती? क्या उनकी गुणवत्ता के प्रति लोगों का ध्यान उस तरह जाता, जिस तरह नोबेल मिलने के बाद के बरसों में गया? किसे पता। ये ऐसे सवाल थे, जो कभी उठे ही नहीं, न अब उठेंगे, तो इनके जवाब भी अवधारणात्मक ही होंगे। तथ्य तो अब इतने बरसों में हम सब ही जान चुके। नोबेल ने कई बार श्रेष्‍ठ किंतु अल्‍पज्ञात लेखकों को वृहत्‍प्रकाश दिया। जैसा सवाल हम शिम्बोर्स्‍का के बारे में पूछ रहे, वैसा ही इमरे कर्तेश, हेर्ता म्‍यूएलर और ले क्‍लेजियो के बारे में भी कर सकते हैं। तब अल्‍पज्ञात होकर भी कर्तेश, म्‍यूएलर या उनके जैसे अन्‍य, कितने ऊंचे पाये के लेखक हैं, अब, इन बरसों में हम जान ही चुके हैं।

शिम्बोर्स्‍का का गद्य भी उनकी कविताओं की तरह ताक़तवर है। उनके गद्य का बेहतरीन नमूना उनके द्वारा दिया गया नोबेल भाषण है, जो संभवत: सर्वश्रेष्ठ में से एक है। नीचे उनके गद्य से एक चयनिका दी जा रही है। ये छोटे-छोटे टुकड़े हैं, जो पोलैंड के एक अख़बार में कॉलम की तरह छपते थे। कॉलम का शीर्षक था : 'नॉन-रिक्वायर्ड रीडिंग' या 'ग़ैर-ज़रूरी वाचन'। आठ सौ से हज़ार शब्दों के ये टुकड़े किसी किताब पर आधारित होते थे। शिम्बोर्स्‍का इन्हें पुस्तक-समीक्षाओं की तरह नहीं लिखना चाहती थीं, इसीलिए उन्होंने इन्हें महज़ पाठकीय प्रतिक्रियाएं ही कहा है। वह इस कॉलम के लिए उन किताबों को चुनती थीं, जिन्हें समीक्षक अक्सर उपेक्षित छोड़ देते थे। मीवोश पर लिखे आखि़री टुकड़े में शिम्बोर्स्‍का की सरलता मन मोह लेती है। ये सात टुकड़े क्लेअर कैवेना द्वारा पोलिश से अंग्रेज़ी में किए गए अनुवादों पर आधारित हैं। पाठक ख़ुद देखें, 'कविता की मोत्ज़ार्ट' कहलाने वाली शिम्बोर्स्‍का का गद्य में वैभव।






दोस्तोएव्स्की

1876 के बसंत में, शादी के कुछ महीनों बाद ही, 46 साल के दोस्तोएव्स्की ने अपनी बीस साल की पत्नी के साथ रूस छोड़ दिया और जर्मनी चले गए। इसे उनका हनीमून नहीं कहा जा सकता। यह लेखक अपने क़र्ज़दारों के बार-बार के तग़ादों से परेशान होकर भागा था और चाहता था कि जर्मनी के जुआघरों में जुआ खेलकर अपना भविष्य सुधार सके। यही वह समय था, जब उनकी पत्नी आना ने डायरी लिखनी शुरू की। मुझे नहीं पता कि उन नोट्स और डायरी का शीर्षक 'मेरा बेचारा फेद्या' किसने रख दिया। इस शीर्षक से ऐसा लगता है कि वह नवयुवती अपने अशक्त, ख़ब्ती और अति-विलक्षण पति पर बेहद तरस खाती थी। जबकि हक़ीक़त यह है कि आना अपने अनोखे पति की बेहद सराहना करती थी, उससे बेहद जुड़ी हुई थी और आंख मूंदकर उससे प्रेम करती थी। 'मेरा शानदार फेद्या', 'मेरा निराला फेद्या', 'चतुर फेद्या'- इस तरह का कोई भी शीर्षक कहीं ज़्यादा न्यायसंगत होता। तथ्य है कि अपने फेद्या के साथ उसका जीवन नरक जैसा था, डर, बेचैनी और अपमान से भरा हुआ। जबकि भाव यह है कि इन सबके बाद भी वह अपने पति के साथ बहुत ख़ुश थी। एक मुस्कान या प्यार-भरा एक शब्द उसके आंसुओं को सुखाने के लिए काफ़ी था। वह ख़ुशी-ख़ुशी अपनी शादी के गहने, अपने कानों की बालियां, अपनी महंगी शॉल उतारकर फेद्या को दे देती, ताकि वह उसे गिरवी रख सके, उससे मिले पैसों से जुआ खेल सके और एक बार फिर सब कुछ हार जाए। ऐसी कोई भी चीज़ जो फेद्या को उल्लास से भर दे या क्षण-भर के लिए ही ख़ुश कर दे, हर वह चीज़ उस नई दुल्हन को भी ख़ुश कर देती थी। वह दुनिया को अपने पति की आंखों से देखती थी, उसके नज़रिये को अपना मानती थी, उसकी जटिलताओं का प्रतिबिंब थी। जिस तरह उसका पति सारी ग़ैर-रूसी चीज़ों से खीझता था, वह भी उसी तरह खीझी रहती। जब पति को मिर्ग़ी के दौरे पड़ते, वह डूबते हुए दिल से उसकी तीमारदारी करती। उन बरसों में दोस्तोएव्स्की को बहुत ज़्यादा दौरे पड़ते थे। सिर्फ़ यही नहीं, पति को चिड़चिड़ेपन की मरोड़ भी उठती थी। कहीं भी, कभी भी। रेस्तराओं, दुकानों और जुआघरों में वह अचानक किसी से लड़ पड़ता, ख़ासा माजरा बन जाता। उस समय आना गर्भवती थी। यक़ीनन, वह बेहद मुश्किल समय रहा होगा। इन हालात में उसके स्नायु हमेशा तनाव में रहते। पर जैसा कि मैंने कहा, वह ख़ुश थी, वह ख़ुश रहना चाहती थी, उसने ख़ुश बने रहने का कौशल सीख लिया था और उससे बड़ी ख़ुशियों की वह कल्पना भी नहीं कर पाती थी। हम इसमें एक महान प्रेम के तत्व का दर्शन कर रहे हैं। ऐसे मामलों में दूर बैठे लोग बहुत आसानी से पूछ लेते हैं, तो आखि़र उसने अपने पति में ऐसा क्या देखा कि इतना प्रेम कर बैठी? ऐसे सवालों की आत्मा की शांति मिले : प्यार का औचित्य किसी को कैसे समझाया जा सकता है? खड़ी चट्टानों की कगार पर कई बार पेड़ उग आते हैं, एकदम अबूझ तरह से झुके हुए : इसकी जड़ें कहां हैं, चट्टान में मिट्टी नहीं तो आखि़र पेड़ को ख़ुराक कहां से मिलती होगी, किस चमत्कार के कारण इस पेड़ के पत्ते इतने हरे हैं-- बहुत स्पष्ट है कि पेड़ हरा-भरा है यानी कहीं न कहीं से तो उसे जि़ंदा रहने लायक़ ख़ुराक मिल ही रही है। रूज़यार्ड प्रिबिल्स्की, थोड़ा मज़ाक़ में ही सही, अपनी भूमिका में लिखते हैं (और वह बेहद मानीख़ेज़ है) कि आना दोस्तोएव्स्की की डायरी बीवियों के लिए एक मार्गदर्शिका है- एक कठिन किंतु अच्छी नीयत वाले पति के साथ किस तरह निबाहा जाए। दुर्भाग्य है कि उसके अनुभव किसी दूसरे के लिए किसी काम के नहीं। आना वह सब योजना बनाकर नहीं कर रही थी। प्यार और सहिष्णुता उसके स्वभाव का हिस्सा ही थे।

(आना दोस्तोएव्स्की की डायरी 'माय पुअर फेद्या' के पोलिश अनुवाद पर।)



हिचकॉक

हिचकॉक किसी भी डायटीशियन के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं। पूरा जीवन उन्होंने अपने बदन पर पचासों किलो अतिरिक्त मांस चढ़ाए रखा और उसके बाद भी लंबी आयु पाई। वह जीवन-भर प्रचुर मात्रा में मांस खाते रहे, मिठाइयां खाते रहे। ज़ाहिर है, इनसे कितनी चर्बी बढ़ती होगी। सुबह उठने से लेकर देर रात शराब उनकी साथीदार होती। यही काफ़ी नहीं था, वह लगातार मानसिक तनाव में भी रहते थे। वह निर्माताओं, पटकथा-लेखकों और अभिनेताओं से बराबर झगड़े करते रहते। अगर आप लंबी उम्र तक स्वस्थ और रचनात्मक रहना चाहते हैं, तो किस तरह का जीवन नहीं जीना चाहिए- हिचकॉक इससे सटीक उदाहरण थे। लेकिन वह तो काम पर काम किए जाते थे, बहुत कम ही ने उनके बराबर काम किया होगा। उन्होंने 53 फिल्में बनाईं, जिनमें से कई फिल्म इतिहास की महान फिल्में हैं। यही नहीं, वे अब भी दर्शक की सांस रोक देने में समर्थ फिल्में हैं। हमें इस सूची में उनके बेशुमार टीवी कार्यक्रमों को भी जोडऩा चाहिए। और उन फिल्मों को क्यों भूला जाए, जिन पर उन्होंने महीनों काम किया, लेकिन जो कभी पूरी नहीं हो पाईं। अंत में वह मर गए, लेकिन अगर मेरी याददाश्त सही है, तो यही हश्र उन सबका भी होता है, जो अपनी ख़ूब देखभाल करते हैं। वे भी अंत में मर ही जाते हैं। अब कोई व्यक्ति इस तरह का हो, तो उस पर कोई पतली-सी किताब लिखना मुश्किल काम है, इसीलिए डोनाल्ड स्पोटो ने एक 'मोटी-सी' किताब लिखी। हर फिल्म पर हिचकॉक ने जिस तरह काम किया, उसे पूरी तफ़सील के साथ वर्णित किया गया है। हमें विभिन्न आलोचकों के मत भी पता चलते हैं और उन लोगों के संस्मरण भी, जिन्होंने हिचकॉक के मूडी रवैये को झेला, कभी आतंक से तो कभी आनंद से। साथ ही हमें इस मास्टर के कुछ अपने शब्द भी मिलते हैं। मुझे वह हिस्सा ज़्यादा पसंद आया, क्योंकि वही हिस्सा किताब के सबसे उत्तेजक क्षणों को जन्म देता है। उनके ऑडिटर्स कभी उनका व्यवहार समझ नहीं पाए। कभी उन्हें संजीदा नहीं कर पाए। वस्तुत: वे कभी समझ ही नहीं पाए कि हिचकॉक किस समय गंभीर हैं और किस समय मज़ाक़ कर रहे। स्पोटो को उन्हें उनकी जीवनी में इसी तरह छोड़ देना चाहिए था। पर लेखक हिचकॉक को पूरी तरह समझ लेना चाहता है, या समझा देना चाहता है, इसीलिए वह उनके कठोर खोल को तोड़ता है और अंदर की मुलायम गिरी दिखाता है। उनकी पीड़ाएं, भय, वर्जनाएं और ग्रंथियां क्या थीं? ज़ाहिर है, लेखक पता भी लगा लेता है, लेकिन इनसे होना क्या था? मसलन सभी जानते हैं कि अनियंत्रित भूख का संबंध कहीं न कहीं प्रेम-जीवन में मिली असफलता से होता है। यह भी जगजाना है कि बेतहाशा सुंदर स्त्रियों के प्रेम में पड़े रहने वाले पेटुओं से यह दुनिया भरी पड़ी है। तो फिर उनमें से सिर्फ़ एक पेटू ही 'रियर विंडो' या 'द बर्ड' क्यों बना पाता है? प्रतिभा का रहस्य हमेशा रहस्य ही बना रहता है। अब यह बात छोड़ते हैं कि हर फिल्म बनाने से पहले उन्होंने कितने केकड़े खाए थे, अब ज़रा हिचकॉक के काम पर बात करते हैं। एक तरफ़ तो वह बेहद ख़ुशकि़स्मत थे कि जीवन के शुरुआती दौर में ही उन्हें समकालीन निर्देशकों के बीच मास्टर मान लिया गया था। दूसरी तरफ़ उन्हें बमुश्किल कलाकार माना जाता, जो मानते भी, तो बेहद ख़ुन्नस के साथ। अगर यूरोपीय फिल्मकारों ने जिज्ञासा भाव से भरकर उनकी फिल्मों के बारे में बात न की होती, तो उन्हें वह दर्जा न मिल पाता। अक्सर उनकी फिल्में ऑस्कर के लिए नामित होतीं, पर जीत नहीं पाती थीं। वह बेहद शालीनता से अपने बारे में मज़ाक़ करते, 'मैं हमेशा दूल्हे के दोस्त जैसा रहता हूं, ख़ुद दूल्हा कभी नहीं बन पाता।' उनकी कुछ और बातें कोट करने से मैं ख़ुद को रोक नहीं पा रही। उन्होंने अपना समाधिलेख लिख रखा था : 'बदमाश छोटे लड़कों के साथ यही होता है।' या किसी गंभीर भाषण के अंत में जैसे वह कहते, 'मुझे बताया गया है कि दुनिया में हर मिनट एक हत्या होती है। तो मैं आप लोगों का क़ीमती समय और नहीं लूंगा, आप लोग अपने काम पर लग सकते हैं। धन्यवाद।'

(डोनाल्ड स्पोटो द्वारा लिखित 'द डार्क साइड ऑफ़ जीनियस: अ लाइफ़ ऑफ़ अल्फ्रेड हिचकॉक' के पोलिश अनुवाद पर।)



बटन

लूविश में एक बटन संग्रहालय स्थापित किया गया है। उसने अपना एक निजी लेटरहेड बनवाया है और साहित्य में बटनों की मौजूदगी पर एक किताब भी छपवाई है। यह सुनकर कोई भी अपनी आंखें नचाते हुए पूछ सकता है कि क्या इस शहर में कोई दूसरी समस्या नहीं है? क्या छोटे शहरों का काम हस्तकला के सामान बेचने वाली दुकानों से नहीं चल जाता, जो ऐसा संग्रहालय? या सीधे यही कह सकता है कि ऐसा नहीं करना चाहिए था। हो सकता है कि मेरी कि़स्मत ही कुछ ऐसी हो कि जब भी मैं यात्रा पर होती हूं और किसी शहर का संग्रहालय देखने वहां पहुंचती हूं, वहां अक्सर ताला लटका मिलता है (चाभी हमेशा बड़े साहब के पास होती है) या जो कोई भी लड़की उस समय ड्यूटी पर होती है, वह बताती है कि पिछले चार महीनों में मैं इस संग्रहालय की पहली विजि़टर हूं। कारण समझना बेहद आसान है। जितने भी सुंदर या ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण सामान हैं, उन्हें पहले ही बड़े शहरों के संग्रहालयों में रखवा दिया गया है। इन छोटे शहरों के संग्रहालयों में जो भी कुछ बचा है, वह दर्शकों को खींचने के लिए पर्याप्त नहीं है। अगर छोटे शहरों के संग्रहालय किसी ख़ास विषय पर अपनी विशेषज्ञता बना लें, किसी एकदम ही हट के विषय पर, तो स्थिति बदल सकती है। बटन संग्रहालय का साइनबोर्ड देखने के बाद दर्शक दो पल को ठिठकेगा, चौंक जाएगा, उसे यह विचार अच्छा लग सकता है और वह भीतर जा सकता है। या यह भी सोच सकता है कि यह क़स्बा, जहां वह या उसके पुरखे पैदा हुए थे, कोई बेहतर संग्रहालय डिज़र्व करता है। शायद पुराने पोस्टकार्ड्स का? शायद प्राचीन प्रार्थना पुस्तकों का? खिलौनों का? ताश का? शतरंज के मोहरों का? अगर संग्रहालय से लगा हुआ एक रेस्तरां भी हो, जहां के रसोइए सूप में फटे हुए मोज़े न डुबोते हों, तो जगह की कीर्ति और भी फैल जाएगी। एक और फ़ायदा है। पोलैंड में कई संग्राहक हैं। इनमें मैं उन्हें नहीं गिन रही जो किसी भी पुरानी चीज़ को किसी भी तरह संग्रह कर रखते हों। मैं उन संग्राहकों के बारे में सोच रही हूं जो किसी ख़ास वस्तु के संग्रह के विशेषज्ञ हों और जिन्होंने सच में कई सारी बेहद ख़ास चीज़ें अब तक संभाले रखी हो। अपने संग्रह का वारिस तलाशने में उन्हें इफ़रात मुश्किलात आती हैं। अगर किसी झक्की बूढ़े ने बहुत अजीबोग़रीब चीज़ें संग्रह कर रखी हों, तो उसके जाने के बाद उसका परिवार शायद ही कभी उन चीज़ों को संभालता हो। अगर कोई बड़ा संग्रहालय उन चीज़ों को ले भी लेगा, तो ज़्यादा संभावना है कि वह उन्हें अपने तहख़ाने में ही बंद रखे। सबसे अच्छा हल यही छोटे संग्रहालय हैं, जो पूरे देश में फैले हुए हैं और इस भू-दृश्य को सुंदर बना रहे हैं।

लेकिन अभी हम बटनों पर लौटते हैं। साहित्य में बटनों की मौजूदगी पर किताब निकालने के बजाय उन्हें बटनों के इतिहास पर काम करना चाहिए। इस इतिहास के बारे में मैं कौड़ी-भर भी नहीं जानती। सिर्फ़ इतना अंदाज़ा है कि बटन किसी पेड़ पर नहीं उगे होंगे- किसी क़बीले ने उनके बारे में सोचा होगा, बनाया होगा और इस्तेमाल शुरू किया होगा। यह शायद मध्य युग से पहले किसी समय हुआ होगा। यह तो तय है कि बेहद प्राचीन काल के लोग अपने कपड़ों में बटन का प्रयोग नहीं करते थे। अपने शरीर से कपड़े बांधे रखने के लिए वे अलग कि़स्म की डोरियां या बक्कल प्रयोग करते थे। वरना तेज़ हवाएं, जिन्हें यूनानियों ने बोरिया और अकीलो जैसे नाम दे रखे थे, उनके कपड़े एक पल में उड़ा ले जातीं। और पुराने इजिप्त की सफ़ेद पोशाकें? वे तो इतनी तंग होती थीं कि शायद ही कोई अपने सिर से उन्हें पहन सके। उनकी पीठ पर गुप्त डोरियां बंधी होती होंगी, जिन्हें खींचकर टाइट किया जाता होगा। अब इस बिंदु पर पहुंचकर वही आंख-नचाऊ महाराज मुझसे फिर पूछ सकते हैं : 'नील नदी के दर्जियों की दुविधा के बजाय हमारे पास ज़्यादा बड़ी समस्याएं भी हैं, जिन पर बात की जा सकती है।' बिल्कुल, कई बड़ी समस्याएं हैं। पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि हमारे पास छोटी समस्याएं हों ही ना।

(जि़बीग्न्यिू कोस्त्रेवा की 'द बटन्स इन लिटरेचर' पर।)



फैशन की अवस्था

पोशाक-कला के छात्रों को यूरोपीय पोशाकों का इतिहास पढ़ाया जाता है। यह सही भी है। चौथे वर्ष के छात्रों के लिए बनी एक पाठ्यपुस्तक ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने उसकी अनुक्रमणिका देखी। फैशन के इतिहास को पांच विशाल अध्यायों में बांटा गया था : आदिम समाज, ग़ुलाम काल, सामंतवाद, पूंजीवाद और समाजवाद। मैंने किताब पढऩे का फ़ैसला किया, क्योंकि सरकार या शासन के आधार पर फैशन का वर्गीकरण कैसे किया जा सकता है, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था। दुर्भाग्य से, किताब के लेखक भी ऐसा संबंध स्थापित करने में नाकाम दिखे, हालांकि उन्होंने कोशिश बहुत की। कारण महज़ इतना है कि दर्जी की दराज़ को आप उसी चाभी से नहीं खोल सकते, जिससे शहर के मुख्य दरवाज़ों पर लगे तालों को खोला जाता है। वह फिट ही नहीं होगी। मैंने पढ़ा, 'आदिम समाज वर्ग-विहीन समाज था, इसलिए हर कोई एक ही तरह के कपड़े पहनता था।' इस वाक्य में 'इसलिए' शब्द बेहद तर्कसंगत है, लेकिन अगले अध्याय में ही यह संकटग्रस्त हो जाता है। क्योंकि जैसे ही लेखक ग़ुलाम काल के पहनावे की बात करता है, वह प्राचीन यूनान की वर्ग-संरचना के बारे में भी बताता है, यहीं पर छात्र को यह पता चलता है कि इस काल में भी लोग एक जैसे पहनावे ही पहनते थे। मालिक नए कपड़े पहनते होंगे और ग़ुलामों को पुराने, फटे कपड़ों से काम चलाना होता होगा। लेकिन सभी के पास एक जैसे ही चोग़े और झब्बे थे। रोम में ऐसा नहीं था। वहां पूर्ण नागरिकों को उनके तोगा से अलग ही पहचाना जा सकता था, लेकिन रोमन साम्राज्य में इन तोगा को विशेष समारोहों में ही पहना जाता था। सड़क पर लोगों को देखकर मालिक और ग़ुलाम का फ़र्क़ नहीं बताया जा सकता था। संभव था कि किसी ग़ुलाम ने सोने के बहुत सारे आभूषण पहन रखे हों और कोई मालिक एकदम ही सादे-पुराने लिबास में घूम रहा हो। गिबन बताते हैं कि एक बार सीनेट में एक प्रस्ताव आया कि ऐसे माहौल को बदलने के लिए ग़ुलामों के लिए अलग से पोशाक दी जानी चाहिए, यूनिफॉर्म की तरह, ताकि ग़़ुलामों को अलग से पहचाना जा सके और यथोचित व्यवहार किया जा सके। सीनेट ने इस प्रस्ताव को फाड़कर फेंक दिया-- इसलिए नहीं कि वे लोकतंत्र में भरोसा रखते थे, बल्कि बिल्कुल उलट कारण से। अगर ग़ुलामों को यूनिफॉर्म पहना दी गई, तो तुरंत ही उन्हें पता चल जाएगा कि उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है। सड़कों पर तब सिर्फ़ वही दिखेंगे। इससे गड़बड़ हो सकती थी। फैशन पर जो दूसरी बातें प्रभाव डालती हैं, मसलन वातावरण, मौसम, ऐतिहासिक घटनाएं, नैतिक मूल्य या तकनीक- इन पर सीधे बात नहीं की गई है। आज तक कोई भी उन चीज़ों को पता नहीं कर पाया है, जो इन सभी तत्वों को प्रभावित करती हैं। कोई एक चीज़ ज़्यादा असर डालती है, दूसरी चीज़ कम, ऐसा क्यों होता है? आसानी से इस बात को देखा जा सकता है कि सब कुछ समय पर निर्भर है। कपड़ों का फैशन कला के विकास और कपड़े बनाने की मशीन-तकनीकों पर टिका होता है। यह किताब कम से कम यह बताने में तो सक्षम है ही। लेकिन मुझे डर है कि इस किताब की प्रमुख अवधारणाओं के आधार पर परीक्षा में सवाल कैसे पूछे जाएंगे। 'बारोक युग में परिधान-कला' या 'क्षेत्रीय परिधानों में मौजूद प्राचीन परिधान-कला के तत्व' जैसी बातें हमें नए सवालों की ओर ले जाती हैं। परीक्षा में ऐसे सवाल भी पूछे जा सकते हैं - 'लोकतंत्र और महिलाओं के स्कर्ट के विकास को स्पष्ट करें' या 'पूंजीवादी या समाजवादी फैशन में अंतर स्पष्ट करें'...। ज़रा वैचारिक कि़स्म के छात्र संकट में पड़ जाएंगे।

('द हिस्टोरिक डेवलपमेंट ऑफ़ क्लोदिंग' पर।)



पैर और प्रारब्ध

सुदूर पूर्व में, ड्रैगन का सपना देखने का अर्थ है, कि़स्मत खुलने वाली है। और हक़ीक़त में ऐसा हुआ था कि जब एक दरबारी गणिका ने सपने में हरे रंग के ड्रैगन को हल्के नारंगी रंग की झील में घुसते देखा, तो उसके कुछ ही दिनों बाद एक अमीर सामंत उसकी सत्रह साल की बेटी के प्रेम में पड़ गया। इसे किसी दूसरी तरह से न लें। बिना किसी मेकअप के भी उस युवती चुंग-हियांग में वह सुंदरता थी कि जिसके लिए 'देशों को उखाड़ फेंका जाए'। यही नहीं, उसका स्वभाव भी ऐसा ही सुंदर था, तमाम विशेष गुण उसमें भरे पड़े थे और वह कविताएं भी लिखती थी। पर एक दुर्भाग्य था। वह नीच कुल में पैदा हुई थी, इसलिए उसे सामंत की अनधिकृत पत्नी या रखैल बनकर रहना पड़ा। और एक दिन सामंत ने उसे छोड़ दिया, ताकि वह दूर राजधानी में जाकर 'गहरे नीले बादलों पर सवार होकर उन्नत हो सके' या ज़्यादा स्पष्ट कहें, तो वह राजधानी में जाकर राजा के दरबार का हिस्सा बनकर ज़्यादा बड़ा सामंत बन सके। बेचारी चुंग-हियान के आंसू और सिसकारी किसी को सुनाई नहीं पड़े। 'क्या बांस की हज़ार टहनियां मिलकर भी हवा को रोक सकती हैं?' सामंत लौट आएगा, इस धुंधली उम्मीद के साथ रोती हुई लड़की पीछे छूट जाती है, लेकिन उसके भीतर एक दृढ़ संकल्प भी है कि वह अपने सामंत के लिए हमेशा वफ़ादार बनी रहेगी। इसीलिए जब एक ठरकी बूढ़ा उसका बलात्कार करने की कोशिश करता है, उससे बचने की कोशिश में वह जेल जाना पसंद करती है, बेडिय़ों में बंध जाती है और जानवरों की तरह पीटी जाती है। लोहे की ज़ंजीरों से शाहबलूत की लकडिय़ों को उसके पैरों से बांध दिया जाता है। उसके कोमल पैर लहूलुहान हो जाते हैं। लेकिन हरे रंग का ड्रैगन, हल्के नारंगी रंग की उस झील में ऐसे ही थोड़े घुसा था। वह नौजवान सामंत गहरे-नीले बादलों की सवारी करके लौटता है, अब वह बहुत बड़ा आदमी बन चुका है, इतना बड़ा आदमी कि उस ठरकी बूढ़े को सबक़ सिखा सके, उसकी जेल से लड़की को छुड़ा सके और इस बार उसे अपनी अधिकृत पत्नी बना सके। इस परिकथा का पहला लिखित संस्करण 18वीं सदी के अंत या 19वीं सदी के प्रारंभ में मिलता है और यह उचित ही है कि इसे कोरियाई साहित्य के क़ीमती रत्नों में से एक माना जाता है। कुछ पाठक इसकी चपल, जीवंत और सुडौल शैली की प्रशंसा करते हैं। कुछ इसके चमकीले-उत्तेजक प्रेमदृश्यों की सराहना करते हैं। जबकि ज़्यादातर पाठक इसकी शक्तिशाली भावनाओं से द्रवित हो जाते हैं। ऐसे भी हैं, जो इस कथा में आई सामाजिक आलोचनाओं और स्त्री की भूमिका, उसके श्रम को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। कुछ ऐसे पाठक भी हैं, जो इस कहानी की तारीफ़ इसलिए करते हैं कि अंत तक ख़ुद को किसी फंतासी में न्यून हो जाने से बचाए रखती है। अमूमन ऐसी तारीफ़ों का आधार वह मान्यता होती है, जो कहती है कि यथार्थवाद ही साहित्यिक रचना के माथे का मुकुट है, जबकि फंतासी एक कम सम्मानित विधा है, उसमें एक कि़स्म की अपरिपक्वता होती है, उस लार्वा की तरह जिसमें से तितली अभी निकलने वाली हो...। ऐसे लोगों के लिए परिकथा पढऩा किसी यातना से कम नहीं होता। कोई भी चमत्कार उन्हें एक सौंदर्यशास्त्रीय पाप की तरह लगता है। किसी भी कि़स्म की अ-संभावना उनके लिए महज़ बचपना होती है। ऐसे पाठकों के लिए मुझे गहरा अफ़सोस है, क्योंकि चुंग-हियांग की यह कहानी उनके माथे पर कई बार बल ला सकती है। मसलन, इसके बेहद आक्रामक सुखांत को ही ले लीजिए, उसमें कहीं से इस बात का जि़क्र नहीं है कि आखि़र चुंग-हियांग के विक्षत पैरों का क्या हुआ? उसकी टूटी हुई हड्डियां फिर जुड़ गईं? चिंता न कीजिए : वे ठीक हो गईं। सेज़ पर अपने छबीले पति के साथ बैठने पर उसे डर और शर्म के मारे अपने पैरों को किसी कंबल से छुपाने की ज़रूरत न होगी, उस कंबल से, जिस पर मंडारिन शैली की बतखें छपी हुई थीं। क्योंकि परिकथाएं कभी भी जीवन के यथार्थ के सामने आत्मसमर्पण नहीं करतीं। वे ठीक इसका उल्टा करती हैं। वे जीवन के यथार्थ को उखाड़ फेंकने का कोई मौक़ा नहीं चूकतीं। जीवन की मुसीबतों का सामना वे ठीक अपने तरीक़े के समाधानों से करती हैं। उनके समाधान उत्कृष्टतर कोटि के होते हैं।

('द स्टोरी ऑफ़ चुंग-हियांग’ के पोलिश अनुवाद पर।)



पारिवारिक रिश्ते

क्लियोपेट्रा एक यूनानी नाम है। तोलेमी के यूनानी-मकदूनियाई राजवंश, जिसने सिकंदर महान के साम्राज्य के पतन के बाद इजिप्त पर शासन किया था, में यह एक आनुवंशिक नाम है। इस राजवंश में सात क्लियोपेट्रा हुई थीं, लेकिन सिर्फ़ सातवीं व अंतिम क्लियोपेट्रा ही इतिहास में वह महानता हासिल कर पाई, जिसके बारे में ख़ुद उसने नहीं सोचा था। उसकी पूर्वजाएं विस्मृति के इतिहास में दब गईं। कोई कह सकता है कि अपने भाइयों, अन्य राजाओं या दरबारियों के मुक़ाबले उन्होंने बेहद शांत और घटनाविहीन जीवन जिया होगा, इसीलिए इतिहास ने उन्हें दर्ज नहीं किया, लेकिन यह सचाई नहीं है। शांत और घटनाविहीन जीवन एक ऐसा विलास है, जिसकी चाहत उन सभी औरतों में रही होगी। अगर उन्होंने ऐसा जीवन जीने की कोशिश की भी हो, तो भी उन्हें सफलता नहीं मिल पाई होगी। क्योंकि वह समय ही बेहद उपद्रवी था। चारों दिशाओं से ऐसी हवा, ऐसे अंधड़ आते थे कि सिंहासन लगभग हर समय हिला ही रहता था। इस अशांति में उनकी पारिवारिक संरचनाओं को भी जोड़ दीजिए। ऐसी संरचना, जिसे आज के ज़माने में समझना बेहद कठिन कार्य है। तोलेमियों ने फ़राओ की परंपरा का अनुसरण किया था। फ़राओ ने इसिरीज़ और ओसिरीज़ बंधुओं का अनुसरण किया था। इन दोनों पवित्र बंधुओं ने अपनी बहनों से शादी की थी। यह कोई प्रतीकात्मक बात नहीं थी, बल्कि एकदम उलट बात सच था। उनका लक्ष्य था साझा व परस्पर संततियों की उत्पत्ति। यह साझा संतति अपने जैसी कई साझा संततियों को जन्म देती, जिससे अगली पीढिय़ां चलतीं। इस तरह देखा जाए, तो जो मां है, वह अपनी ही संतान की मौसी भी है। जो पिता है, वह अपनी ही संतान का चाचा और मामा भी है। इसी तरह, जो बेटा है, वह अपने पिता का बेटा ही नहीं, बल्कि भतीजा भी है। जो बेटी है, वह अपनी मां की बेटी ही नहीं, भांजी भी है। ये सब आपस में भाई-बहन ही नहीं, बल्कि मां-पिता भी हैं। परिवार की यह जटिल संरचना इसलिए भी थी कि इनके पास पूर्वज कम थे। आज बच्चों के पास चार पितामह-पितामही होते हैं, यानी दादा-दादी, नाना-नानी। जबकि उनके पास सिर्फ़ दो पितामह-मही होते। आठ प्रपितामहों की जगह चार ही प्रपितामह होते। यानी जो दादा है, वही नाना भी है। जो दादी है, वही नानी भी है। हर पीढ़ी में यही होता था। लेकिन इसके बीच भी आश्चर्य की घटनाएं घट जाती हैं। सातवीं क्लियोपेट्रा यानी सबसे प्रसिद्ध क्लियोपेट्रा के भी दो पितामह थे, दो ही प्रपितामह, लेकिन प्र-प्रपितामहों की संख्या चार थी। ऐसा कैसे हो सकता है? क्या कोई बाहरी आदमी उनके बेडरूम में घुस गया था? नहीं, नहीं। उनके रिश्ते ऐसे ही पारिवारिक-बांधव लोगों के बीच ही बनते थे, पर बीच की एक पीढ़ी में ज़रा ज़्यादा ही क्रॉसब्रीडिंग हो गई थी। जिस समय क्लियोपेट्रा द्वितीय का समय था, तब की बात है। उसने पहले अपने बड़े भाई से शादी की, पर वह मर गया। तब उसने अपने छोटे भाई से शादी कर ली। लेकिन छोटा भाई अपनी इस बहन या भाभी से संतुष्ट नहीं हो पाया, उसने उसके मरने की प्रतीक्षा भी नहीं की। उसने अपनी उस बहन या भाभी की बेटी, जो कि पहले पति से हुई थी, से शादी कर ली। वह लड़की दोनों ही तरफ़ से उसकी भतीजी व भांजी थी, और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह उसकी सौतेली बेटी भी थी। अब यह नवयुवती अपनी ही मां की सौतन भी बन गई। अब इस नवयुवती से जो संतानें हुईं, उनके दो प्रपितामह हो गए- जो बाप था, वही दादा भी हुआ। भले सौतेला दादा। यह भी ध्यान दें कि ये सारी संतानें उस विधवा औरत के नाती-पोते भी कहलाए। बस, मेरी हिम्मत जवाब दे रही है। मैं इसके अंदर अब और नहीं जा सकती। (किताब में तो इस वंशावली का इस तरह का जटिल चार्ट भी दिया हुआ है।) पर इससे समझ में आ सकता है कि परिवार की परंपरा के भीतर हुई ज़रा-सी गड़बड़ी ने कैसे सातवीं क्लियोपेट्रा के प्र-प्रपितामहों की संख्या दोगुनी कर दी। यह इतना आसान नहीं है क्योंकि जो उस प्रसिद्ध क्लियोपेट्रा के पिता की ओर से उसके पूर्वज थे, वही उसकी मां की ओर से भी थे। स्त्री और पुरुष की पारिवारिक वंश-बेल का वहां कोई अलगाव ही नहीं था। लेकिन इन सबसे हम एक तार्किक नतीजे पर तो पहुंच ही जाते हैं, भले ही वह प्रासंगिक न हो, कि इनसेस्ट या भाई-बहन के बीच शादी का रिश्ता या कौटुम्बीय व्यभिचार, ऊपर-ऊपर से देखने में कितना भी सरल लगे, नीचता की हद तक जटिल एक विकृति है।

('सेवन क्लियोपेट्रास' पर।)

घबराहट

'ग़ैर-ज़रूरी वाचन' में चेस्वाव मीवोश की कविताएं? सोचने-समझने वालों के लिए तो वे बेहद ज़रूरी वाचन हैं, या कम से कम बेहद ज़रूरी वाचन होना चाहिए। पर मैं यहां उनकी कविताओं के बारे में बात नहीं करूंगी। मेरे पास उससे भी बुरी योजना है : यहां मैं अपने बारे में बात करूंगी, या इस पर, कि इस कवि और इसकी कविताओं की उपस्थिति में मैं किस क़दर घबराई रहती हूं। एकदम शुरुआत से ही इस घबराहट की शुरुआत हो चुकी थी। फ़रवरी 1945 का समय था। मैं क्राकोव गई हुई थी। वहां स्टारी थिएटर में कविता पाठ आयोजित था। इतने बरसों तक चले युद्ध के बाद पहली बार कोई कविता पाठ हो रहा था। आमंत्रित कवियों के नामों का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि मैं किसी को नहीं जानती थी। मैंने अच्छा-ख़ासा गद्य पढ़ रखा था, लेकिन कविताओं के बारे में मेरी जानकारी शून्य थी। इसलिए मैं चुपचाप सुनती रही, देखती रही। ऐसा नहीं कि सभी ने अच्छी तरह पढ़ा हो। कुछ लोग तो नाक़ाबिले-बर्दाश्त बमबारी किए जा रहे थे, तो कुछ की आवाज़ टूट रही थी और उनके हाथों में फंसा काग़ज़ कांप रहा था। इसी बीच उन्होंने मीवोश नाम के किसी कवि को पुकारा। बिना किसी उन्मादी नाटकीयता के उसने बेहद शांति से अपनी कविताएं पढ़ीं। जैसे कि वह कविता नहीं पढ़ रहा था, सस्वर सोच रहा था और हमें भी न्यौत रहा था कि आओ, मेरी सोच में शामिल हो जाओ। मैंने ख़ुद से कहा, 'यह रही। यह है असली कविता। यह है असली कवि।' ज़ाहिर है, मैं थोड़ा पक्षपात कर रही थी। वहां दो-तीन कवि और भी थे, जिन्हें इतने ही ध्यान से सुना जाना चाहिए था। लेकिन असाधारणता का अपना ही तापमान होता है। मेरे दिल ने मुझसे कहा कि अब से इस कवि को हमेशा ग़ौर से देखना, इसकी हर चीज़ खोजना। पर मेरी इस प्रशंसा का कड़ा इम्तिहान जल्द ही मेरे सामने आया। कोई एक ख़ास अवसर था और मैं जीवन में पहली बार किसी एक असली रेस्तरां में खड़ी थी। मैं टुकुर-टुकुर अपने चारों ओर देख रही थी कि क्या पाती हूं- नज़दीक की एक टेबल पर अपने कुछ दोस्तों के साथ चेस्वाव मीवोश बैठे हैं और पोर्क या सूअर का मांस खा रहे हैं। यह मेरे लिए बहुत बड़ा आघात था। सिद्धान्तत: मैं यह जानती थी कि कवियों को भी समय-समय पर खाने की ज़रूरत होती है, लेकिन क्या कवियों को ऐसा अश्लील और फूहड़ व्यंजन खाना चाहिए? ख़ुद को किसी तरह समझाकर ही मैं उस आतंक से बाहर निकल पाई। जीवन में मुझे कुछ और महत्वपूर्ण अनुभव मिले और मैं कविता की बेहद गंभीर पाठक बन गई। तब तक मीवोश का संग्रह 'रेस्क्यू' छप चुका था और अख़बारों में उनकी नई कविताएं पढऩे को मिल जाती थीं। उनकी बेहद गहरी चीज़ों को मैं जब भी पढ़ती, मेरी घबराहट बढ़ती जाती। अगली बार मैंने मीवोश को सीधे पेरिस में देखा, 1950 के दशक के आखि़री बरसों में। वह कॉफ़ी-टेबलों के बीच रास्ता बनाते हुए तेज़ी से बढ़ रहे थे, शायद आखि़री पंक्ति में बैठे किसी व्यक्ति से मिलने। मेरे पास पूरा मौक़ा था कि मैं जाकर उनसे मिलती, बातें करती, उन्हें कुछ ऐसा बताती जिसे सुनकर उन्हें ख़ुशी होती कि- अब भी पोलैंड में उनकी प्रतिबंधित किताबों को बेहद शौक़ से पढ़ा जाता है, उनकी किताबें तस्करी के ज़रिए देश में लाई जाती हैं। अगर कोई दिल से मेहनत करे, तो वह, आज नहीं तो कल, उनकी किताबें पा सकता है। लेकिन मैं उनके पास जा नहीं पाई। उनसे कुछ कह नहीं पाई। घबराहट के मारे मेरा सारा शरीर सुन्न हो गया था। इसके बाद, मीवोश को पोलैंड लौट सकने में कई साल का समय लग गया। (क़रीब तीस साल) क्राकोव की क्रूपनिशा स्ट्रीट में फोटोग्राफ़रों की फ्लैशलाइट से धुआं उठ रहा था, मार तमाम लोगों और तरह-तरह के माइक्रोफोन्स के पीछे मीवोश लगभग छुप-से गए थे। संवाददाताओं से ख़ुद को मुक्त कराने तक वे बेहद थक चुके थे। जैसे ही उससे निकले, ऑटोग्राफ़ लेने वालों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। मैं भी उसी भीड़ में खड़ी थी। मुझमें इतना साहस नहीं था कि उस बेशुमार भीड़ में मैं उन्हें रोकती, अपना परिचय देती और ऑटोग्राफ़ मांगती। जब वे दूसरी बात पोलैंड लौटे, तब उनसे निजी मुलाक़ात करने का अवसर आया। तब से अब तक बहुत सारी चीज़ें बदल गई हैं, पर एक तरह से देखा जाए तो कुछ भी नहीं बदला। यह सही है कि उसके बाद मेरे जीवन में कई मौक़े आए जब मैंने उनसे बातें कीं, साझा दोस्तों के साथ उनसे मिली, एक ही जगह से कविताएं पढ़ीं और ख़राब आयोजकों से एक साथ पीडि़त हुए। पर आज भी मेरी समझ में नहीं आता कि इतने बड़े कवि के सामने कैसे खड़ा हुआ जाए, कैसे पेश आया जाए। जिस तरह बरसों पहले मैं अपने आसपास उन्हें पा घबरा जाती थी, उसी तरह आज भी घबरा जाती हूं। भले हमने कुछेक बार एक-दूसरे को चुटकुले सुनाए हों और ठंडी वोद्का के गिलास टकराए हों। और भले ही एक बार हम दोनों ने एक रेस्तरां में बैठकर पोर्क से बना वैसा ही व्यंजन साथ खाया, जैसा देखकर कभी मैं आतंकित हो गई थी।

(30 जून 2001 को मीवोश के 90 साल का होने के उपलक्ष्य में प्रकाशित अख़बार के विशेषांक में उनका कॉलम इस रूप में छपा था।)

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सबद पुस्तिका : 9

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बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

साखी


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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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