सबद
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अम्बर रंजना पाण्डेय की तीन नई कविताएं

1:33 am



दोपहर

गद्य जैसा खिंचाव लगता गले
और हृदय के बीच। प्यास शब्द 
पूरा नहीं पड़ता। वह दोपहर ऐसी 
कविताएँ थी जिसमें कोई नहीं था।
एकाकी शब्द भी छोटा पड़ जाता 
था, बार बार व्याकरण की किताब 
उठा कर रख देता घर की
सबसे ऊँची अल्मारी पर। 
एक दिन शाम छह बजे, जब 
उसे छोड़कर लौट रहा था- मेघों 
से भरा हुआ था शहर। गाड़ियों 
की लाइट कभी इधर कभी उधर 
चौंधती थी। 
अंधेरे से पहले अँधेरा हो गया था।
बल्बों से भर गया अचानक 
मेरी दोनों कनपटियों के बीच का 
हिस्सा।
ऊब और उत्तेजना से मिलकर 
बनता है सुख जिसके कारण हम 
आत्महत्या नहीं करते। 
*

एकांत  

बीजगणित का कठिनतम प्रश्न 
हल करके जो एकांत
जाता है अंदर- शब्द नहीं 
बना है जिसके लिए अब तक।
ज्यामिति से सधा हुआ- ऐसे 
संतुलन पर टिका है कि दूर 
माने मीलों दूर गरज के 
साथ छींटें पड़ेंगे, कोई 
पक्षी वृक्ष से टेरता उड़ 
जाता और यहाँ एकांत 
जो सधा था भंग होता। उस 
एकांत की जगह पर जहाँ 
भाषा की सुदूर छाया ही 
पड़ती थी। जहाँ देह के सुख 
की केवल व्याख्याएँ ही 
पहुँच पाती वहाँ flea market बन जाता।
देखते ही देखते कविता 
प्रकट होती और दूर चली
जाती जैसे अपने ही घर 
की दीवार पर रातोंरात 
प्रकट हो जाती है ग्राफ़िटी।
**

दोपहर (किंतु पुरानी)

दूर तक जाते थे वह मैदान 
सुनहरी घास वाले 
जहाँ जून की दोपहर पड़ती रहती 
लम्बी और उदास 
कभी कभी बेचैन भी
जहाँ हम भागते थे
तब थे पेड़ पेड़ नहीं 
बल्कि हज़ारों हज़ारों इच्छाएँ 
जब था आसमान आसमान नहीं 
बल्कि माँ के कमरे से लगा 
बहुत ऊँचा काँच 
जिसमें झाँकते थे हम अपने 

मुँह, चाँद और सूरज की तरह
***

(कविताओं के साथ दी गई तस्वीर कवि की रचनात्मक निगाह की देन है। उनकी अन्य कविताएँ यहाँ )
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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